न्यूनतम वेतन के लिए BJP दफ्तर पर श्रमिकों का धरना, उमा भारती की घोषणा याद दिलाई

भोपाल स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पर सोमवार को मध्य प्रदेश के हजारों आउटसोर्स और अस्थायी कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर उपवास आंदोलन किया।

Updated: Sep 28, 2026, 01:31 PM IST

भोपाल। न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर मध्यप्रदेश के अस्थायी, अंशकालीन, आउटसोर्स और ठेका कर्मचारियों ने सोमवार को भोपाल स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में धरना दिया। 3 से 8 हजार रुपए महीने तक वेतन पाने वाले कर्मचारियों ने कार्यालय परिसर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा के सामने बैठकर नारेबाजी की। कर्मचारियों ने इसे न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन नाम दिया है। साथ ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को साल 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती की ओर से की गई न्यूनतम वेतन संबंधी घोषणा की याद भी दिलाई।

आंदोलन की अगुवाई कर रहे अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार ने अलग-अलग श्रेणियों के लिए न्यूनतम मजदूरी 12,425 से 16,769 रुपए प्रतिमाह तक तय की है। इसके बावजूद कई सरकारी विभागों में कर्मचारियों को इससे काफी कम भुगतान किया जा रहा है। उनका दावा है कि कुछ कर्मचारियों से 3 से 5 हजार रुपए महीने में काम लिया जा रहा है।

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शर्मा के मुताबिक, आंदोलन में करीब 11 वर्गों से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। इनमें ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य और सफाईकर्मी, स्कूलों व छात्रावासों के अंशकालीन अस्थायी कर्मचारी, लोकल यूथ सर्वेयर, स्वास्थ्य विभाग के चतुर्थ श्रेणी आउटसोर्स कर्मचारी, पेसा मोबिलाइजर, कोटवार, मध्याह्न भोजन कर्मचारी, मनरेगा मेट, योग सहायक और प्रशिक्षक शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि स्कूलों, छात्रावासों और आयुष विभाग में काम करने वाले अंशकालीन व अस्थायी कर्मचारियों को करीब 4 से 5 हजार रुपए महीने मिल रहे हैं। ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य और सफाईकर्मियों का भुगतान 3 से 4 हजार रुपए बताया गया है। स्वास्थ्य विभाग में चतुर्थ श्रेणी के आउटसोर्स कर्मचारियों को 7 से 8 हजार रुपए तथा राजस्व विभाग के लोक यूथ सर्वेयर को करीब 1 हजार रुपए प्रतिमाह मिलने का दावा किया गया है।

इसी तरह आदिवासी पंचायतों में काम करने वाले पेसा मोबिलाइजर को करीब 4 हजार रुपए, कोटवारों को 2 से 5 हजार रुपए और स्कूलों में मध्याह्न भोजन से जुड़े कर्मचारियों को करीब 4 हजार रुपए महीने मिलने की बात कही गई है। मनरेगा के मेट श्रमिकों को 2 हजार रुपए से भी कम भुगतान का दावा है। योग सहायकों और प्रशिक्षकों को करीब 4,500 रुपए मिलते हैं। जबकि, स्वच्छताग्राहियों को बिना वेतन भुगतान के हटा दिए जाने का आरोप लगाया गया है।

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शर्मा ने कहा कि शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों तथा छात्रावासों में काम करने वाले कर्मचारियों से 10 से 12 घंटे तक काम लिए जाने के बावजूद उन्हें 4 से 5 हजार रुपए ही दिए जा रहे हैं। वहीं, औद्योगिक क्षेत्रों, पावर प्लांट और सीमेंट उद्योगों में काम करने वाले ठेका श्रमिकों को भी निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पूरी नहीं मिलने का दावा किया गया है।

आंदोलनकारियों ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को पहले ही पत्र भेजकर प्रदर्शन की सूचना दी थी। पत्र में कहा गया है कि साल 2003 से प्रदेश की जनता लगातार भाजपा की सरकार चुनती रही है लेकिन पिछले 23 सालों में चपरासी स्तर तक की स्थायी सरकारी नौकरियां नहीं दी गई हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर नियमित भर्ती की व्यवस्था खत्म कर बड़ी संख्या में काम अस्थायी और आउटसोर्स व्यवस्था के जरिए कराया जा रहा है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि ऐसी नौकरियां गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण जरिया थी। आंदोलनकारियों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कर्मचारियों को नौकरी की स्थिरता और सम्मानजनक वेतन दोनों का अभाव है। जबकि, साल 2003 से पहले की सरकारी नौकरियों में सेवा सुरक्षा का प्रावधान था। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी मुख्य मांग घोषित न्यूनतम मजदूरी के अनुरूप भुगतान और रोजगार में स्थायित्व सुनिश्चित करना है। इसी मांग को लेकर उन्होंने भाजपा प्रदेश कार्यालय में धरना देकर सरकार और संगठन का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा है।

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