अल नीनो: भारत के भविष्य पर मंडराता संकट

प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु घटना अल नीनो केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि भारत की कृषि, जल, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डालने वाली वैश्विक जलवायु प्रक्रिया है।

Updated: Jun 29, 2026, 01:20 PM IST

ताजा पूर्वानुमानों के अनुसार, 2026 के आखरी महीनों में एक अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो उभरने की पूरी आशंका है। वैज्ञानिकों ने भारत पर पड़ने वाले इस संभावित अल नीनो के प्रभाव को चार प्रमुख तिमाहियों में विभाजित किया है, जो देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर असर डालेगा। पहला जून से सितंबर 2026 में मॉनसून पर संकट और बुवाई में देरी, दूसरा अक्टूबर से दिसंबर तक खरीफ फसलों को नुकसान और बढ़ती महंगाई और तीसरा जनवरी से मार्च 2027 तक गर्म सर्दियां और रबी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव शामिल है। 

प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु घटना अल नीनो केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि भारत की कृषि, जल, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डालने वाली वैश्विक जलवायु प्रक्रिया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो की तीव्रता और अनिश्चितता दोनों बढ़ रही हैं, जिससे भारत जैसे मानसून-निर्भर देश के लिए इसके खतरे और गंभीर हो गए हैं। ‌सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की व्यापारिक हवाएं (ट्रेड विन्डस) गर्म जल को पश्चिम की ओर एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसी स्थिति को अल नीनो कहा जाता है। 

यह घटना वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को बदल देती है और भारतीय मानसून को कमजोर कर सकती है। भारत की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। देश के जलाशय, भूजल पुनर्भरण, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर हैं। अल नीनो सीधे मानसून को प्रभावित करता है, इसलिए इसका प्रभाव बहुआयामी होता है।

अल नीनो का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय मानसून पर पड़ता है। विगत कई वर्षों के मानसून अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बड़े सूखे अल नीनो आए हैं। मानसून कमजोर होने पर वर्षा की मात्रा घटती है और उसका वितरण भी असमान हो जाता है। देर से मानसून आगमन लंबे “ड्राई स्पेल”हैं और अचानक अत्यधिक वर्षा की घटनाएं, सूखा और बाढ़ दोनों का जोखिम बढाता है, अर्थात जलवायु परिवर्तन के कारण अब “कम बारिश” के साथ “अत्यधिक बारिश” की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। यानी मानसून कमजोर हो सकता है लेकिन कुछ दिनों में अत्यधिक बारिश से विनाशकारी बाढ़ भी आ सकती है।

पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वाले उतराखंड के इशांत अग्रवाल का कहना है कि आमतौर पर मानसून के इस तरह अचानक रूठ जाने या थम जाने का सारा दोष 'ग्लोबल वॉर्मिंग', अल-नीनो या समुद्र के गर्म होने के सिर मढ़ दिया जाता है। लेकिन भारत के बेहतरीन वैज्ञानिकों की लगातार आ रही रिसर्च ने एक ऐसा कड़वा सच सामने रखा है, जिसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम खुद हैं। 

विज्ञान कहता है कि मानसून के इस तरह कमजोर होने की एक बहुत बड़ी वजह हमारे ठीक सामने है। बढ़ते शहरीकरण, वनों की कटाई, आर्द्रभूमियों के विनाश और एकल फसल आधारित कृषि पद्धतियों ने स्थानीय जल चक्र को कमजोर किया है। इससे भूमि की नमी घट रही है और मानसून के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि भूमि उपयोग में परिवर्तन और वनस्पति आवरण में कमी भी मानसून की अनिश्चितता बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारक बनते जा रहे हैं।

भारत को अल नीनो के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। इसमें वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जलग्रहण क्षेत्र विकास, फसल विविधीकरण, सूखा-रोधी बीजों को बढ़ावा, रासायनिक खेती पर निर्भरता कम करना, प्राकृतिक एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को प्रोत्साहित करना, स्थानीय जल निकायों का संरक्षण और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत करना शामिल है। 

साथ ही शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाकर और हीट एक्शन प्लान लागू करके गर्मी के प्रभाव को कम किया जा सकता है। लगभग 315 जिलों में वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है और इन जिलों में सिंचाई की व्यवस्था बहुत सीमित है। इनमें से अधिकांश जिले मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के हैं। भारत सरकार ने किसानों के हित और खेती को सुरक्षित रखने के लिए जल प्रबंधन, बीज की उपलब्धता, और वैकल्पिक फसलों पर रणनीति तैयार की गई है। 315 संवेदनशील जिलों को चिन्हित कर विशेष रूप से खरीफ फसलों जैसे धान और मक्का की सुरक्षा पर जोर दिया जा रहा है।

कम बारिश होने की स्थिति में किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों और सूखे के प्रति सहनशील बीजों की आपूर्ति की जा रही है। राज्य स्तर पर मॉनिटरिंग कमेटियां बनाई गई हैं, जो बारिश, जल स्तर और बीज-खाद की आपूर्ति पर लगातार नजर रख रही हैं। जानकार बताते हैं कि मध्य प्रदेश का धार, झाबुआ, बड़वानी, नीमच, रतलाम, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, शिवपुरी, मंडला, सतना, बैतूल, छिंदवाड़ा और खंडवा जिले ज्यादा प्रभावित होने की संभावना है।

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि अभी भी केंद्रीय भूमिका निभाती है। कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ता है। धान, गेहूं, दाल, गन्ना और तिलहन उत्पादन में गिरावट होती है, खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित और सिंचाई लागत में वृद्धि होती है। हाल के वर्षों में सरकार को चीनी निर्यात रोकने जैसे कदम उठाने पड़े क्योंकि कमजोर मानसून से गन्ना उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है। जल संकट और भूजल पर दबाव कम वर्षा का सीधा असर नदियों, बांधों और भूजल स्तर पर पड़ता है।

भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बुंदेलखंड और तेलंगाना पहले से ही भूजल दोहन के गंभीर संकट से जूझ रहा है। अल नीनो इस संकट को और गहरा कर सकता है। अल नीनो वाले वर्षों में वैश्विक तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में बनने वाले अल नीनो वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा सकता है। इस कारण लंबी और तीव्र हीटवेव, शहरी “हीट आइलैंड” प्रभाव, श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, लू से मौतें होगी और गरीब और असंगठित क्षेत्र के मजदूर सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। अल नीनो का प्रभाव सभी वर्गों पर समान नहीं पड़ता। 

छोटे और सीमांत किसान, भूमिहीन मजदूर, महिलाएं, आदिवासी समुदाय, मछुआरे और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इससे ग्रामीणों का पलायन, आय असमानता और सामाजिक असुरक्षा बढ़ने का खतरा पैदा होता है। कम जल उपलब्धता और बढ़ती गर्मी ऊर्जा क्षेत्र को भी प्रभावित करती है। कमजोर मानसून का असर जीडीपी वृद्धि पर भी पड़ सकता है क्योंकि भारत की बड़ी आबादी कृषि आधारित है। 

अल नीनो समुद्री तापमान को बढ़ाकर समुद्री जैव विविधता को प्रभावित करेगा। इस कारण समुद्री खाद्य श्रृंखला बाधित और छोटे मछुआरों की आय प्रभावित होगी। भारत के तटीय राज्यों विशेषकर तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, ओडिशा और केरल पर इसका असर अधिक पड़ सकता है। पहले अल नीनो एक प्राकृतिक चक्र था, लेकिन अब मानवजनित जलवायु परिवर्तन इसकी तीव्रता बढ़ा रहा है। प्रशांत महासागर में पनप रहा अल नीनो भारत के लिए केवल मौसम संबंधी घटना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल संकट, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा राष्ट्रीय खतरा है। जलवायु परिवर्तन ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है। यदि भारत ने समय रहते जल, कृषि और ऊर्जा नीतियों में व्यापक परिवर्तन नहीं किए, तो भविष्य में अल नीनो जैसी घटनाएँ करोड़ों लोगों की आजीविका और जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)