कंगना रनौत तो भारत रत्न की हकदार हैं

वास्तविकता तो यह है कि भारत का दक्षिणपंथी वैचारिक वर्ग कमोवेश ग्लानि भाव से उभर ही नहीं पा रहा है। अगर सत्ताधारी वर्ग में इतनी गंभीर व दुखदायी टिप्पणी पर निंदा प्रस्ताव पारित करने का साहस नहीं हो तो साफ-साफ समझ में आ जाना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य क्या होने जा रहा है।

Updated: Nov 14, 2021, 03:06 PM IST

कंगना रनौत तो भारत रत्न की हकदार हैं

"मनुष्य का सौंदर्य उसके नैतिक आचरण में है। पशु की सुंदरता उससे भीतर से आकी नहीं जाती है। गाय को देखकर हम कहते हैं कि इसकी चमड़ी देखो इसके बाल देखी इसके पैर देखो इसके सींग देखो। लेकिन मनुष्य के बारे में ऐसा नहीं कहा जाता। मनुष्य की सुदरता का आधार तो उसका हृदय है. उसकी धन संपत्ति नहीं।"
- महात्मा गांधी                                                                                                                                                             (पद्मश्री) कंगना रनौत ने भारतीय आजादी को लेकर जो टिप्पणी की है उससे अधिक विचलित होने की आवश्यकता नहीं है और गुस्सा होना तो बेवकूफी ही होगी। दरअसल कंगना रनौत के कहने के पीछे जो कुछ भी रहा हो वह उनकी अपनी सोच है लेकिन उनके इस वक्तव्य की निंदा न करके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने जतला दिया है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को लेकर उनकी मन:स्थिति या मानस क्या है। भारत का सारा राजनीतिक तंत्र जिसमें तमाम राजनीतिक दल शामिल हैं, जो कुछ भाजपा के बारे में सिद्ध नहीं कर पा रहे थे पद्मश्री कंगना रनौत के लिजलिजे वक्तव्य की निंदा और भर्त्ससना न करके इन दोनों संगठनों ने स्वयं को भारत विश्व समुदाय के सामने उघाड़कर रख दिया है। इसलिए भाजपा इन्हें भारत रत्न न भी दे, तो भी भविष्य की नयी सरकारों को उन्हें यह सम्मान देना चाहिए। क्योंकि उन्होंने जो असाधारण कार्य किया है, वह सब लोग मिलकर भी नहीं कर पाए। इन्होंने तो राजनाथ सिंह से भी बाजी मार ली जिन्होंने सावरकर की माफी को उचित ठहराया था।

भारतीय समुदाय के बड़े वर्ग की समस्या यह हो गई है कि वह बिना किसी अध्ययन के अपनी बात को इतने अशालीन एवं अश्लील ढंग से कहने का आदी होता जा रहा है कि उसका जवाब दिया ही नहीं जा सकता। यदि कोई अपने पवित्र व पूज्य पूर्वजों को गाली देता है तो क्या आप उससे नाराज होंगे? नहीं। आपको उसपर तरस आना चाहिए दया आना चाहिए, उसकी उस मानसिक अवस्था पर दुख होना चाहिए तथा उसके उपचार की व्यवस्था करना चाहिए। भारत के पांच अत्यन्त महत्वपूर्ण इतिहासविदों ने एक पुस्तक लिखी है "इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेस इसकी 3.50 लाख से ज्यादा प्रतियां विक चुकी है 600 पृष्ठों की इस पुस्तक की शुरुआती पंक्तियां हैं, "भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन बिना शक आधुनिक समाज द्वारा देखे गए सबसे बड़े आंदोलनों में से एक था। ये एक ऐसा आंदोलन था जिसने सभी वर्गों के लाखों लाख लोगों और विचारधाराओं को राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ा और शक्तिशाली औपनिवेशिक साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश फांसीसी, रूसी, चीनी, क्यूबा और वियतनाम की क्रांतियों की तरह इसकी उन लोगों के लिए जबरदस्त प्रासंगिकता है जो वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को बदलना चाहते हैं।"

याद रखिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम हमें बताता है कि अन्यायकारी कानून को तोड़ते हुए भी आप कैसे अपराधमुक्त बने रहते हैं। इस आंदोलन ने हमें सिखलाया कि दमनकारी कानूनों को कैसे अहिंसक तरीकों से बेदम बनाया जा सकता है। याद रखिए सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 940 लोग मारे गए थे जबकि वास्तव में मारे जाने वालों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा थी।

भाषा को लेकर गांधी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहते हैं। भाषा मनुष्य की बुद्धि के सहारे चलती है, इसलिए जब किसी विषय तक बुद्धि नहीं पहुंचती तब भाषा अधूरी रह जाती है। यह साधारण सा नियम है, लोगों के मन में जो विचार होते हैं, उनकी भाषा में वही व्यक्त होते हैं। लोग विवेकशील होंगे तो उनकी बोली विवेकर 2/3 लोग मूढ़ होंगे तो उनकी बोली में भी मूढ़ता वाली ही होगी।" अब पद्मश्री कंगना रनौत को और क्या कहें? वरुण गांधी की प्रतिक्रिया का जिस भाषा में उन्होंने उत्तर दिया है उसके बाद तो कुछ कहने सुनने को बचता ही नहीं। वास्तविकता तो यह है कि भारत का दक्षिणपंथी वैचारिक वर्ग कमोवेश ग्लानि भाव से उभर ही नहीं पा रहा है। अगर सत्ताधारी वर्ग में इतनी गंभीर व दुखदायी टिप्पणी पर निंदा प्रस्ताव पारित करने का साहस नहीं हो तो साफ-साफ समझ में आ जाना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य क्या होने जा रहा है।

राष्ट्रपति ने उसी दिन समारोह में कर्नाटक की 77 वर्षीय तुलसी गाँड़ा को भी पद्मश्री प्रदान किया था। वे कर्नाटक के होनाली गांव में रहती हैं। जीवन में उन्होंने 30000 से ज्यादा पौधे लगाए हैं। वे जब दो साल की थीं तब उनके पिता नहीं रहे। वे जंगल में अपने पिता को ढूंढती रहीं और एक दिन किसी पेड़ को अपना पिता मान लिया। वे हमेशा से नंगे पैर ही जंगल जाती हैं। जंगल उनके लिए एक पूजास्थल है। वे सम्मान लेने भी नंगे पैर और अपनी पारंपरिक पोषाक में ही आयीं। उनके नंगे पैर और खुली पीठ देखकर क्या आपको उनमें नोआखाली में नंगे पैर और उघाड़े बदन घूमते गांधी दिखाई नहीं दिए? पर कंगना और उन जैसी को कभी यह समझ में ही नहीं आएगा कि त्याग और करुणा ही मानवता के सबसे बड़े गुण है। तुलसी गौड़ा शायद एक शब्द भी नहीं बोलीं परंतु सारी दुनिया समझ गई कि वे क्या चाहती हैं। 

क्या भगतसिंह ने मर्सी पिटीशन (दया की भीख) मांगी थी? भारत में 15 अगस्त 1947 को सत्ता का परिवर्तन नहीं युगांतर हुआ था, यानी एक युग का परिवर्तन हुआ था। युगांतर इसलिए क्योंकि भारत ने 150 देशों की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया था। सन् 2014 में महज सत्ता परिवर्तन हुआ है जो आजादी के बाद से 15 बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। सच तो यह है कि जब मनुष्य 'पापलूसी' से भी आगे बढ़ जाता है तो एक तरह के लिजलिजेपन का शिकार हो जाता है। आज भारत में बहुत से लोग इस व्याधि का शिकार हो रहे हैं।

गुरुनानक कहते हैं, दया कपाह संतोख सूत अतु गंडो सतु-पटु एक जनेऊ जी का हईता पांडे धतु।।

अर्थात "हे पांडे, यदि तेरे पास ऐसा जनेऊ है जिसमें कपास दया का हो, सूत संतोष का. गाठ संयम की और जो सच से बटा गया हो तो मुझे पहना दो।" कंगना रनौत ने जो भी कहा, वह उनकी सोच है परंतु मीडिया के जिस अनुषंग ने इसे प्रसारित किया क्या उसने प्रतिकारस्वरूप यह कहा कि वह उनके इस विचार से सहमत नहीं है? सस्ती लोकप्रियता का कोई भविष्य नहीं होता। सूरज की ओर मुँह कर थूकने का परिणाम हम सब जानते हैं। भारत पिछले कुछ वर्षों से अजीब सन्नीपात जैसी स्थिति में है। ज्यादातर को कुछ सूझ नहीं रहा है। कंगना रनौत की गिरफ्तारी या पद्मश्री की वापसी कोई समाधान नहीं है। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि चुनावी राजनीति व्यापक राजनीति का हिस्सा भर है। आजादी के पहले विदेशी हुकूमत के रहते यह देश करीब 33 वर्षों तक गांधी व उनके साथियों के निर्देशों पर चला और लक्ष्य को प्राप्त किया। राजनीति में शार्टकट नहीं होता। सांप्रदायिक और द्वेष की राजनीति शार्टकट है और यह रास्ता लंबा नहीं है। यह दूर तक नहीं ले जा पाएगा। सत्ता कोई स्थायी चीज नहीं है। परंतु देश और जनता हमेशा जीवंत बने रहते हैं और उनकी जीवंतता बनाए रखने में इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम या राष्ट्रीय आंदोलन का पुनर्पाठ आज की अनिवार्यता है। चंद्रकांत देवताले की कविता "खुद पर निगरानी का वक्त" की पक्ति है, तुम्हीं तो पूछ रहे थे न

एक शहीद की प्रस्तर प्रतिमा से

सठिया गई है, क्या स्वतंत्रता ?

शायद नहीं दिखे

पत्थर की आंख में आंसू ॥

इस 14 नवंबर को पं. नेहरू की प्रतिमा के आँसू जरूर पोंछियेगा।