CG: बिलासपुर में म्यूल अकाउंट सिंडिकेट का खुलासा, छात्रों और मजदूरों के खातों से करोड़ों की साइबर ठगी
बिलासपुर में 10 करोड़ के साइबर ठगी नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। ठग छात्रों और मजदूरों को लालच देकर उनके बैंक खातों का इस्तेमाल फर्जीवाड़े में कर रहे थे। पुलिस ने 60 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। वहां अपराधी बेरोजगार युवाओं, कॉलेज छात्रों और गरीब मजदूरों को लालच देकर उनके बैंक खाते और सिम कार्ड हासिल कर रहे हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि ठग इन खातों का इस्तेमाल देशभर में होने वाली ऑनलाइन धोखाधड़ी की रकम को ठिकाने लगाने के लिए कर रहे थे। जिले के विभिन्न थानों में दर्ज 13 मामलों की जांच के दौरान ऐसे 30 से अधिक खाताधारकों की पहचान हुई है जिनके बैंक खातों का उपयोग अवैध लेनदेन में किया गया।
पुलिस और साइबर सेल की संयुक्त कार्रवाई में अब तक 60 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें मुख्य नेटवर्क संचालक, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले और बैंकिंग चैनल उपलब्ध कराने वाले आरोपी शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, 22 आरोपी फिलहाल जेल में हैं और उनकी जमानत याचिकाएं अदालत ने खारिज कर दी हैं। वहीं, कई ऐसे छात्र और मजदूर भी जांच के दायरे में आए हैं जिन्होंने पैसों के लालच या जानकारी के अभाव में अपने खाते दूसरों को सौंप दिए थे। इनमें से करीब 30 लोगों को सशर्त जमानत मिली है।
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जांच एजेंसियों के अनुसार, साइबर अपराधियों ने सबसे ज्यादा निशाना तीन वर्गों को बनाया है। पहला कॉलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र जिन्हें पार्ट टाइम जॉब और आसान कमाई का झांसा दिया गया। मंगला, कोनी और कोचिंग हब क्षेत्रों में रहने वाले कई छात्र इस जाल में फंसे। दूसरा वर्ग मजदूरों और ग्रामीणों का था जिन्हें सरकारी योजनाओं और लोन दिलाने के नाम पर उनके दस्तावेज जमा कराने के लिए कहा गया। तीसरा वर्ग बेरोजगार युवाओं का है जिन्हें वर्क फ्रॉम होम और कमीशन आधारित कमाई का प्रलोभन देकर उनके बैंक खाते इस्तेमाल किए गए।
रिटायर्ड डीएसपी अनिल तिवारी के मुताबिक, इस तरह की ठगी का पूरा नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से संचालित होता है। सबसे पहले जरूरतमंद लोगों को कुछ हजार रुपये मासिक कमाई का भरोसा देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते हैं। इसके बाद पासबुक, एटीएम कार्ड, सिम कार्ड और नेट बैंकिंग की जानकारी अपराधियों के कब्जे में चली जाती है। साइबर ठगी से हासिल रकम इन्हीं खातों में जमा कराई जाती है और तुरंत एटीएम या क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से निकाल ली जाती है। जिसकी वजह से पुलिस के लिए असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
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तारबाहर पुलिस और साइबर थाने की जांच में उत्कर्ष बैंक और एक्सिस बैंक के कुछ संदिग्ध खातों से लगभग 10 करोड़ रुपये से ज्यादा के अवैध लेनदेन का पता चला है। पुलिस का कहना है कि कई मामलों में बैंक कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आई है।
इसी तरह की कार्रवाई में 17 मई 2025 को साइबर रेंज पुलिस ने एक बैंककर्मी समेत 8 लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोप था कि ये लोग 5 से 10 हजार रुपये के बदले अपने बैंक खाते साइबर ठगों को उपलब्ध कराते थे। फरवरी 2025 में भी बिलासपुर पुलिस ने बड़े अभियान के तहत 19 आरोपियों को पकड़ा था। इनमें निजी बैंकों के कर्मचारी शामिल थे। इन पर फर्जी खातों के जरिए करोड़ों रुपये के लेनदेन में मदद करने का आरोप था।
हाल ही में 17 मई 2026 को तारबाहर पुलिस ने अंबिकापुर से नवनीत, ऋषभ और राजा नामक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, ये लोग मास्टरमाइंड दीपेश गुप्ता के साथ मिलकर देशभर में म्यूल अकाउंट नेटवर्क चला रहे थे। जांच में इनके खातों से 71 लाख रुपये के ट्रांजैक्शन और 60 से अधिक शिकायतें जुड़ी मिली हैं।
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पुलिस अब ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के तहत संगठित अपराध मानकर कार्रवाई कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर अपराध में होता है तो खाताधारक भी कानूनी कार्रवाई से बच नहीं सकता। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पंकज कुमार पटेल ने लोगों से अपील की है कि वे एकाउंट ऑन रेंट, घर बैठे कमाई या बैंक अकाउंट से इनकम जैसे ऑफरों से सतर्क रहें। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या सिम कार्ड देना गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है।




