बंगाल की सियासत: शून्य से शिखर तक भाजपा का सफर
ममता बनर्जी का BJP के साथ मिलकर काम करने का एक लंबा और महत्वपूर्ण इतिहास रहा है। कांग्रेस से अलग होने के बाद, ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को टीएमसी का गठन किया। उसी वर्ष, उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया ताकि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनाया जा सके।
पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चा का शासन रहा, जो 1977 से 2011 तक रहा। लगभग 34 वर्षों तक चले वाम मोर्चा शासन ने राज्य की राजनीतिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। इस दौरान भाजपा का प्रभाव लगभग नगण्य था। 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सत्ता हासिल की और वामपंथी शासन का अंत हुआ। इन पंद्रह वर्षों में टीएमसी ने वाम दलों को लगभग खत्म कर दिया। इससे “एंटी- टीएमसी वोट” के लिए भाजपा एकमात्र विकल्प बन गई। यानी भाजपा का उभार राजनैतिक शून्यता भरने से जुड़ा हुआ है।
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार शुरू किया। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा ने अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाई। 2014 में भाजपा को सीमित सफलता मिली थी। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर बड़ा उछाल दिखाया और 2021 में 77 सीटें जीतकर अपना इरादा दिखा दिया था। भाजपा का वोट शेयर भी तेजी से बढ़ा। टीएमसी से कई नेता भाजपा में शामिल हुए और भाजपा ने बूथ स्तर तक संगठन खड़ा किया।
भाजपा ने टीएमसी पर “मुस्लिम तुष्टीकरण” का आरोप लगाया। इससे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ जिससे भाजपा के लिए यह एक राजनीतिक अवसर बना। साल 2021 में भाजपा ने जोरदार अभियान चलाया, लेकिन टीएमसी ने भारी जीत दर्ज की थी। जिसका मुख्य कारण था कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि मजबूत रही और उन्हें “बंगाल की बेटी” के रूप में पेश किया गया था। भाजपा को “बाहरी पार्टी” के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके कारण “बंगाल बनाम बाहरी” नैरेटिव प्रभावी रहा। कन्याश्री, रूपश्री, स्वास्थ साथी जैसी योजनाओं के कारण महिलाओं का बड़ा समर्थन टीएमसी को मिला था।
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और टीएमसी के बीच कड़ी टक्कर रही, लेकिन टीएमसी ने अपनी पकड़ बनाए रखी। यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या ममता बनर्जी की नीतियों ने भाजपा को पश्चिम बंगाल में जगह बनाने का अवसर दिया? ममता बनर्जी का भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर काम करने का एक लंबा और महत्वपूर्ण इतिहास रहा है। कांग्रेस से अलग होने के बाद, ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को टीएमसी का गठन किया। उसी वर्ष, उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन किया ताकि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनाया जा सके।
1999 के लोकसभा चुनावों के बाद, टीएमसी भी एनडीए का हिस्सा बनी और ममता बनर्जी को केंद्र सरकार में रेल मंत्री बनाया गया। वे इस पद पर 2001 तक रहीं। 2001 में 'तहलका' रक्षा सौदे के खुलासे के बाद, उन्होंने एनडीए से नाता तोड़ लिया और इस्तीफा दे दिया। हालांकि, 2003 में वे फिर से NDA में शामिल हो गईं और 2004 के लोकसभा चुनाव तक वाजपेयी सरकार में कोयला और खान मंत्रालय संभाला।2004 के लोकसभा चुनाव और 2006 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भी टीएमसी और भाजपा ने गठबंधन में मिलकर चुनाव लड़ा था।2006 में विधानसभा चुनावों में हार के बाद, ममता बनर्जी ने धीरे-धीरे भाजपा से दूरी बना ली और बाद में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके 2011 में बंगाल में सत्ता हासिल की, जिसके बाद उनके और भाजपा के रास्ते अलग हो गए।
इस दौर में, ममता बनर्जी को भाजपा के साथ सहयोग करने से बंगाल में खुद को एक बड़ी नेता के रूप में स्थापित करने में मदद मिली। बंगाल की चुनावी राजनीति में लंबे समय से हिंसा और भय का तत्व भी एक निर्णायक कारक रहा है। इस बार भारत का निर्वाचन आयोग ने क़रीब ढाई लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व तैनाती कर मतदान प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित और स्वतंत्र बनाने की कोशिश किया। नतीजा यह हुआ कि कथित “स्थानीय प्रभाव” और भय का वह ढांचा, जो पहले कई क्षेत्रों में निर्णायक माना जाता था, काफी हद तक निष्प्रभावी रहा और असली जनमत अधिक स्पष्ट रूप में सामने आया।
इस चुनाव ने धारना बदल दिया कि सिर्फ पहचान की राजनीति, बंगाली अस्मिता या सड़क पर आक्रामक विरोध ही सत्ता बनाए रखने के लिए काफी नहीं है।अगर जनता को रोजगार, सुरक्षा और पारदर्शी शासन नहीं मिलता, तो वह सरकार बदल देगी। भाजपा ने करीब 8 फिसदी वोटों की बढ़ोतरी की, जबकि टीएमसी का वोट शेयर करीब 7 फिसदी गिरा। जिससे भाजपा 200 से ज्यादा सीटों पर प्रचंड जीत दर्ज कर पश्चिम बंगाल पर काबिज हो गई। यह भी सच्चाई है कि करीब सत्ताइस लाख मतदाता इस वजह से इस चुनाव में मतदान नहीं कर सके कि चुनाव आयोग और फ़िर सुप्रीम कोर्ट मतदान के पहले उनके मतदान के अधिकारी होने के मामले का फैसला नहीं कर सका।
विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा का उभार किसी एक नेता या दल के कारण नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों, संगठनात्मक प्रयासों और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है। पश्चिम बंगाल की राजनीति आज भी परिवर्तनशील है, जहां हर चुनाव नए समीकरण और नई चुनौतियां लेकर आता है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राज्य की राजनीति में संघर्ष अभी जारी है और आने वाले समय में इसके कई नए आयाम देखने को मिलेंगे।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)




