CG: कांकेर में 56 सरपंचों ने दिया सामूहिक इस्तीफा, विकास कार्यों के लिए फंड नहीं मिलने का विरोध
कांकेर में फंड और प्रशासनिक मंजूरी न मिलने से नाराज 56 ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने इस्तीफा दे दिया है। इन पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि बजट के बिना गांवों में विकास कार्य ठप हैं।
कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अंतागढ़ विकासखंड में पंचायत स्तर पर बढ़ते असंतोष ने बड़ा रूप ले लिया है। विकास कार्यों के लिए लंबे समय से फंड और प्रशासनिक मंजूरी नहीं मिलने से नाराज 56 ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। सरपंचों का आरोप है कि पिछले करीब एक साल से उनकी पंचायतों में कोई नया विकास कार्य मंजूर नहीं किया गया है। जिसकी वजह से गांवों में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े काम पूरी तरह प्रभावित हो गए हैं। मामले ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
हालांकि, प्रशासन की ओर से फिलहाल 27 सरपंचों के इस्तीफे की पुष्टि की गई है। अंतागढ़ क्षेत्र के अतिरिक्त कलेक्टर ने बताया कि इन सरपंचों ने अपने इस्तीफे अनुविभागीय दंडाधिकारी (SDM) को सौंप दिए हैं। वहीं, पंचायत सदस्य संघ और जनप्रतिनिधियों का दावा है कि ब्लॉक की सभी 56 ग्राम पंचायतों के सरपंचों के साथ एक जिला पंचायत सदस्य ने भी विरोध स्वरूप इस्तीफा दिया है।
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सरपंच पिछले 18 मई से अंतागढ़ के गोल्डन चौक पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं। उनका कहना है कि बार बार मांग और प्रस्ताव भेजने के बावजूद पंचायतों को विकास कार्यों के लिए राशि जारी नहीं की गई। इसके चलते सड़क निर्माण, नाली, पेयजल व्यवस्था, सामुदायिक भवन और अन्य जरूरी योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई काम शुरू ही नहीं हो सके। जबकि, कुछ योजनाएं बीच में अटक गई हैं।
कांकेर जिला पंचायत सदस्य गुप्तेश उसेंडी ने कहा कि ग्रामीण लगातार सरपंचों और जनप्रतिनिधियों से सवाल कर रहे हैं कि उनके कार्यकाल में क्या विकास हुआ लेकिन संसाधनों और मंजूरी के अभाव में उनके पास जवाब नहीं है। उन्होंने कहा कि बिना बजट और प्रशासनिक स्वीकृति के पंचायत संचालन लगभग असंभव हो गया है। उनके मुताबिक, जब विकास कार्य ही नहीं हो पा रहे तो पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं बचता।
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लमकानहार ग्राम पंचायत की सरपंच मंजू लता गावड़े ने बताया कि सरपंचों ने पिछले साल भी इसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन किया था। उस समय प्रशासन ने 15 दिनों के भीतर कार्यों को मंजूरी देने का आश्वासन दिया था लेकिन कई महीने गुजरने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। उन्होंने कहा कि गांवों के लोग काम नहीं होने के लिए पंचायत प्रतिनिधियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि, उनके पास खर्च करने के लिए फंड ही उपलब्ध नहीं है।
कलगांव ग्राम पंचायत की सरपंच प्रमिला नाग ने ग्रामीण इलाकों की बदहाल स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई गांव अब भी सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बारिश के दौरान आंगनवाड़ी केंद्रों में जलभराव तक की समस्या होती है लेकिन लगातार प्रस्ताव भेजने के बावजूद राशि मंजूर नहीं की गई। ऐसे हालात में सरपंच खुद को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहे हैं।
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सामूहिक इस्तीफे के इस कदम को पंचायत स्तर पर गहराते असंतोष के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो यह मामला राज्य की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। अब जिला प्रशासन और राज्य सरकार के अगले कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि पंचायत प्रतिनिधियों की नाराजगी दूर करने और ग्रामीण विकास कार्यों को फिर से गति देने के लिए जल्द कोई ठोस फैसला लिया जाएगा।




