World Environment Day: नहीं संभलें तो और तपेगी धरती, पिघलेंगे ग्‍लेशियर, बढ़ेगा मरुस्‍थल

आज 5 जून को हम ‘विश्व पर्यावरण दिवस' मना रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस 2022 की थीम है, 'ओनली वन अर्थ' य‍ानि हमारे पास 'केवल एक पृथ्वी' है जिसकी सेहत पर सबसे पहले ध्‍यान देने की जरूरत है। 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन में भी यही नारा बुलंद किया गया था। पचास साल बाद नारा वही है लेकिन धरती का पर्यावरण पहले से अधिक बिगड़ गया है। वैज्ञानिक अध्‍ययन और मैदानी रिपोर्ट्स हमें लगातार चेता रही हैं कि अब भी नहीं चेते तो आने वाली पीढि़यों को धरती की सेहत बिगाड़ने वाली हमारी इन कारगुजारियों के परिणाम भोगने होंगे।

Updated: Jun 05, 2022, 03:21 PM IST

World Environment Day:  नहीं संभलें तो और तपेगी धरती, पिघलेंगे ग्‍लेशियर, बढ़ेगा मरुस्‍थल
विश्‍व पर्यावरण दिवस फोटो : मणि मोहन

इस साल मार्च माह की शुरुआत से ही भीषण गर्मी का जो सितम हमने देखा है उसकी कल्‍पना निकट के वर्षों में तो नहीं ही की गई थी। आमतौर पर कई घरों में अप्रैल मध्य के बाद कूलर-एसी का प्रयोग बढ़ता था। लेकिन इस बार तापमान इतना था कि मार्च में ही ठंडक पाने के सारे उपाय कर लिए गए। जून की शुरुआत में भी मौसम विभाग चेता रहा है कि अभी बारिश के धैर्य रखना होगा। अभी मध्‍य भारत को और तपना होगा। यह तापमान बढ़ना तो एक संकेत है। आशंका है कि आने वाले दिनों में तापमान की यह बढ़ोतरी जारी रहेगी। आने वाले दिनों में पृथ्वी और ज्यादा तीव्रता के साथ तपेगी। 

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि स्‍वार्थी हो चुका इंसान इस धरती को रहने लायक ही नहीं छोड़ेगा। वह धरती को न सिर्फ गर्म कर रहा है बल्कि 'जलवायु' को अराजक बना रहा है। पर्यावरण श्रंखला की हर कड़ी को नुकसान पहुंचाने से धरती का भविष्य खतरे में हैं। बाढ़, ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन, अचानक बर्फ के तूफान, जंगल की आग, अचानक एक साथ भारी बारिश, लू जैसी घटनाएं बढ़ गई हैं। पुर्तगाल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्टो में डिपार्टमेंट और फिजिक्स और एस्ट्रोनॉमी के वैज्ञानिकों ने कहा कि अगर हमने बदलते पर्यावरण को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया तो हालात प्रलयकारी होंगे। 

धरती का पर्यावरण जल, ताप, पवन और आकाश से मिल कर बनता है। ये सारे तत्‍व अपने दुषित होने के चरम की ओर हैं। विश्‍व की बात छोडि़ए अपने देश और प्रदेश की बिगड़ी आबोहवा हमारा दमघोंट रही है। 2021 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में दिल्ली सबसे प्रदूषित राजधानी बताई गई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का पांचवां सबसे प्रदूषित देश है। दुनिया के सबसे प्रदूषित 15 शहरों में से 10 शहर अकेले भारत में हैं।

हमारे देखते ही देखते बीते दस-बारह सालों में न केवल दिन का तापमान लगातार बढ़ा है बल्कि यह अधिक अवधि तक बढ़ा हुआ रहता है। पहले रातें ठंडी हो जाया करती थीं अब तो ऐसा भी नहीं हो पा रहा है। ‘शबे मालवा’ की उपमा के साथ रातों के शीतल हो जाने की प्रकृति पर इठलाने वाले मालवा में अब रातें बुंदेलखंड सी तपने लगी हैं। 

रासायनिक उर्वरकों की अंधाधुंध खपत के खतरों को देखते हुए भारत में जैविक खेती के प्रति जागृति के प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी और गैर सरकारी स्‍तर पर कई तरह के प्रयासों के बारे में सुनाई देता है। बाजार में तरह-तरह के आर्गनिक प्रोडक्‍ट उपलब्‍ध है और इतनी बड़ी रेंज में ऑर्गनिक उत्‍पादों की उपलब्‍धता उनकी गुणवत्‍ता पर शक भी पैदा करती है। जितनी मात्रा में उत्‍पाद और ब्रांड दिखाई दे रहे हैं, उन्‍हें देख आश्‍वस्ति सी लगती है कि देश में रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर किसानों की निर्भरता कम होने लगी है। मगर वास्‍तव में ऐसा है नहीं।

खेती का रकबा तो उतना नहीं बड़ा जितना रासायनिक खाद का उपयोग बढ़ गया है। देश में केमिकल फर्टिलाइजर की मांग लगातार बढ़ रही है। कृषि विभाग के आंकड़ें बताते हैं कि पिछले चार साल में ही केमिकल फर्टिलाइजर के उपयोग में 73.05 लाख मीट्रिक टन की वृद्धि हुई है। सत्‍तर सालों का इतिहास देखें तो जहां 1950-51 में 65.6 हजार टन रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाता था वह 2019-20 में बढ़ कर 29369.3 हजार टन हो गया है। सवाल तो यह है कि जब जैविक खेती का इतना हल्‍ला है तो फिर रासायनिक खेती इतनी तेजी से क्‍यों बढ़ रही है?

‘दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोग’ पर अखिल भारतीय समन्वित शोध परियोजना का अध्ययन बताता है कि एक ही खेत में नाइट्रोजन उर्वरकों के निरंतर उपयोग से मृदा-स्वास्थ्य और फसल उत्पादकता ह्रास के साथ मिट्टी के पोषक तत्वों का भी क्षरण हो रहा है। यह अध्‍ययन एक नियत स्थान पर 50 वर्षों तक किया गया। इस अध्‍ययन के अनुसार नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम (एनपीके) जैसे तत्वों का लगातार प्रयोग करने से मिट्टी में सूक्ष्म और द्वितीयक पोषक तत्वों की कमी हो रही है, जो कम उपज का कारण बन सकती है। 

वैज्ञानिकों की चिंता यह भी है कि एक तरफ तो खेतों की जमीन अपनी उर्वरता खो रही है तो दूसरी तरफ मरूस्‍थल का आकार बढ़ता ही जा रहा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि मरुस्थलीकरण अकेला नहीं आता। इसके नुकसान किसी चेन की तरह होते हैं। बंजर धरती पर न पेड़ होंगे न पानी। और जब पानी का पर्याप्‍त वाष्पीकरण ही नहीं होगा तो आसमान से बरसेगा क्‍या

वैज्ञानिक अध्‍ययन कार्बन उत्‍सर्जन को लेकर हमें पहले ही चेता चुके हैं। भीषण गर्मी से भारत में जंगल जल उठे हैं। ग्लेशियर पिघलने लगे हैं जिसके चलते पाकिस्तान में आकस्मिक बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। फसलों की पैदावार पर भी असर पड़ा है जबकि वैश्विक स्तर पर भुखमरी बढ़ रही है। भौगोलिक दृष्टि से हमारे देश की स्थिति बहुत नाजुक है। अगर ग्लेशियर पिघलेंगे तो हमारे देश का सुन्दरवन क्षेत्र और बांग्लादेश के तटीय इलाके बहुत प्रभावित होंगे। ओडिशा से लगे समुद्री तट में अगर एक मीटर भी जल वृद्धि होती है तो यहाँ का करीब 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र डूब जाएगा। 

मोबाइल टॉवर लगाने व उनसे उत्‍पन्‍न रेडिएशन का असर प्राणियों पर पड़ने लगा है। केरल में एपीकल्चर विशेषज्ञों ने मधुमक्खी पालन के दौरान पाया कि मधुमक्खियों की नेविगेशन स्किल प्रभावित हो रही है यानि उनका दिशा ज्ञान कमजोर पड़ने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में केरल में मधुमक्‍खी की आबादी लगभग 60 प्रतिशत कम हो गई है। ऐसे कई उदाहरण हैं। मध्‍य प्रदेश में पंछियों की संख्‍या घट रही है। जुगनू अब दिखाई नहीं देते हैं, ति‍तलियां रसायनों के कारण मारी जाती हैं और गिद्ध को बचाने के लिए पूरा प्रोजेक्‍ट शुरू करना पड़ा है।  

इन तमाम चिंताओं के बीच सेव साइल यानि मिट्टी बचाओ जैसे अभियान आरंभ करने पड़े हैं। तमाम संगठन कह रहे हैं कि अब न चेते तो आगे स्थितियां संभाले नहीं संभलेंगी। इतनी चेतावनियों के बाद भी आम जनजीवन पर इसका असर नहीं दिखाई देता है। तर्क दिए जाते हैं कि वैज्ञानिकों ने धरती के नष्‍ट होने के दावे किए थे मगर जितना आकलन किया गया था उतना नुकसान हुआ नहीं। जब गर्मी ने पचास साल की रिकार्ड तोड़ा जैसी खबरें आती है तो यह भी सच है न कि पचास साल, सौ साल पहले तापमान इतने स्‍तर तक गया था, जो आज टूट गया है। 

इन तर्कों के जवाब में यह बताना जरूरी है कि तब बदलाव या असामान्‍य स्थिति कुछ समय के लिए होती थी अब उसकी आवृत्ति और अवधि बढ़ गई है। जैसे चार माह होने वाली बरसात सिमट कर डेढ़-दो माह की अवधि तक रह गई है। इस दौरान कुछ दिन तेज बारिश के कारण पानी एक साथ बरस जाता है, बाकि समय सूखा पड़ा रहता है। 

यही कारण है कि सस्‍टेनेबल डेवलपमेंट के लिए ग्रीन तकनीकी समाधानों को प्रस्‍तुत करने के साथ ही लोगों की मानसिकता को बदलने पर भी ध्‍यान देना होगा। लोगों को यह समझाना होगा कि धरती की जैव विविधता के साथ की गई छेड़छाड़ की भरपाई दस-बीस सालों में नहीं हो पाएगी। आने वाली पीढि़यों को लंबे समय तक धरती की सेहत बिगाड़ने वाली हमारी इन कारगुजारियों के परिणाम भोगने होंगे। हमें अपनी ग्राम्‍य परंपरा और जीवन दर्शन में परिणाम खोजने होंगे। एक साधन के लंबे समय तक उपयोग, सबकुछ हमारे उपभोग के लिए नहीं है जैसी सोच को बढ़ाना होगा। यूज एंड थ्रो और हर चीज का दाम लगा कर उसे खरीद लेने वाली उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति को न्‍यून करना होगा। अपनी इच्छाओं पर लगाम लगाए बिना बात बन नहीं सकती है। 

ऐसी परिस्थिति में हमें स्वीडन की संसद के बाहर प्रदर्शन करने वाली पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग की याद आती है। ग्रेटा ने सवाल किया था कि जब वह 75 वर्ष की होगी तो सम्भवतः बच्चे पूछेंगे, ‘तुमने पर्यावरण को बचाने के लिए उस समय कुछ क्यों नहीं किया जब करने का समय था।’ 


सवाल तो आप से भी है। क्‍या आप धरती को बचाने के लिए, अपने बच्‍चों को बेहतर पर्यावरण देने के लिए कुछ कर रहे हैं?