मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच रूस ने निभाई दोस्ती, भारत के लिए तेल सप्लाई बढ़ाने का ऐलान

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और होर्मुज चैनल में संकट के बीच रूस ने भारत को अतिरिक्त कच्चा तेल देने की पेशकश की है।

Updated: Mar 05, 2026, 11:31 AM IST

मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव और तेल आपूर्ति के रास्तों में रुकावटों के बीच रूस ने भारत को कच्चे तेल की अतिरिक्त आपूर्ति देने की बात कही है। उद्योग से जुड़े एक सूत्र के अनुसार, लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल पहले से ही ऐसे जहाजों में मौजूद है जो भारतीय समुद्री क्षेत्र के पास हैं और कुछ ही हफ्तों में भारत तक पहुंच सकते हैं। इससे भारतीय रिफाइनरियों को तुरंत राहत मिलने की संभावना है।

सूत्र ने यह नहीं बताया कि जो जहाज गैर रूसी बेड़े के हैं वे मूल रूप से किस देश के लिए भेजे गए थे। हालांकि, उन्होंने कहा कि इन कार्गो को भी जरूरत पड़ने पर भारत की ओर मोड़ा जा सकता है जिससे आपूर्ति की कमी को तेजी से पूरा किया जा सकता है।

भारत फिलहाल तेल आपूर्ति के लिहाज से संवेदनशील स्थिति में है। देश के पास कच्चे तेल का भंडार केवल लगभग 25 दिनों की मांग के बराबर ही मौजूद है। वहीं, रिफाइनरियों के पास डीजल, पेट्रोल और एलपीजी जैसे ईंधनों का भी सीमित स्टॉक है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, नई दिल्ली ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष को देखते हुए अगले 10 से 15 दिनों में संभावित आपूर्ति संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू कर दी है।

वर्तमान स्थिति का सबसे बड़ा कारण होर्मुज चैनल में पैदा हुआ संकट है। भारत के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात इसी रास्ते से होती है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल निर्यात मार्ग माना जाता है। हाल ही में अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की थी जिसमें कई जहाजों पर हमले हुए थे। इसके बाद यह मार्ग लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया है। जिसकी वजह से भारत जैसे बड़े आयातकों को नई आपूर्ति व्यवस्था तलाशनी पड़ रही है।

भारत की रिफाइनरियां प्रतिदिन करीब 56 लाख बैरल कच्चे तेल का प्रोसेस करती हैं। ऐसे में आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर तुरंत पड़ सकता है। हालांकि, रूस ने भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए आगे आने में दिलचस्पी दिखाई है।

उद्योग से जुड़े सूत्र के मुताबिक, अगर नई दिल्ली इसकी अनुमति देती है तो रूस भारत की कुल तेल जरूरत का लगभग 40 प्रतिशत तक हिस्सा उपलब्ध कराने की स्थिति में है। हालांकि, भारतीय रिफाइनरियां पहले से ही रूसी कच्चे तेल के व्यापारियों के संपर्क में हैं लेकिन रूस से आयात बढ़ाने का अंतिम फैसला सरकार के निर्देशों पर निर्भर करेगा। खासकर उस समय जब अमेरिका के साथ व्यापार को लेकर बात जारी हैं।

आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में भारत द्वारा रूस से तेल आयात घटकर लगभग 11 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था जो नवंबर 2022 के बाद सबसे कम था। उस समय भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव को कम करने की कोशिश कर रहा था। जिससे कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर करीब 21.2 प्रतिशत रह गई थी। हालांकि, फरवरी में यह हिस्सेदारी फिर बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से रूसी तेल खरीद पर लगाए गए टैरिफ हटाने का फैसला किया था और कहा था कि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने पर सहमति जताई है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी नीति बाजार की परिस्थितियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के आधार पर ऊर्जा स्रोतों में विविधता बनाए रखने की है।

भारत के विदेश मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ-साथ नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास ने इस विषय पर किसी भी संभावित अतिरिक्त खरीद को लेकर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि, भारतीय सूत्रों का कहना है कि ईरान से जुड़े युद्ध के शुरू होने से कुछ दिन पहले तक भारतीय कंपनियों को रूसी तेल से दूरी बनाने का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस अपना तेल वैश्विक कीमतों से छूट पर बेच रहा था लेकिन मौजूदा संकट के कारण यह छूट अब कम हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि बाजार में आपूर्ति सीमित होने से विक्रेताओं की स्थिति मजबूत हो गई है।

रूस ने भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी की आपूर्ति बढ़ाने की भी पेशकश की है। यह कदम उस समय सामने आया है जब कतर ने संघर्ष के बढ़ने के बाद सोमवार को उत्पादन रोक दिया था। गैस आपूर्ति में कमी के कारण भारतीय कंपनियों को कुछ औद्योगिक उपभोक्ताओं को गैस की आपूर्ति कम करनी पड़ी है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि एशिया के दो बड़े ऊर्जा उपभोक्ता भारत और चीन अपनी लगभग आधी तेल जरूरतें मिडिल ईस्ट से पूरी करते हैं। लेकिन चीन की तुलना में भारत के पास भंडारण क्षमता काफी कम है। जिससे वह क्षेत्रीय आपूर्ति झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। खासकर तब जब रूस से आयात अमेरिकी दबाव के कारण घटता है।

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि जरूरत पड़ी तो अमेरिकी नौसेना होर्मुज चैनल से गुजरने वाले तेल टैंकरों को सुरक्षा प्रदान कर सकती है। साथ ही उन्होंने अमेरिकी इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन को निर्देश दिया है कि वह खाड़ी क्षेत्र में जहाजों के लिए राजनीतिक जोखिम बीमा और गारंटी उपलब्ध कराए ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखा जा सके।