सड़क नहीं दे सकते तो हेलीकॉप्टर दे दो, सुकमा के आदिवासियों की गृहमंत्री अमित शाह को चिट्ठी

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक आदिवासी गांव के लोगों ने केंद्रीय मंत्री अमित शाह से गुजारिश की है कि सड़क नहीं बनवा सकते तो आने-जाने के लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था कर दें।

Updated: May 28, 2026, 05:49 PM IST

रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित रहे बस्तर संभाग के सुकमा जिले से एक बेहद अजीबोगरीब मामला सामने आया है। यहां बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे मरुकी गांव के आदिवासी ग्रामीणों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से हेलीकॉप्टर की डिमांड की है। उन्होंने गृहमंत्री से कहा कि यदि सड़क नहीं दे सकते तो आने-जाने के लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था कर दें।

आदिवासी ग्रामीणों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को इस संबंध में एक पत्र लिखा है। इस पत्र में ग्रामीणों ने तीखे कटाक्ष के साथ मांग की है कि अगर प्रशासन पिछले एक दशक से लंबित सड़क परियोजना को पूरा नहीं कर पा रहा है, तो आपातकालीन स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूरे गांव को एक हेलीकॉप्टर मुहैया करा दिया जाए। सोशल मीडिया पर यह अनोखा विरोध तेजी से वायरल हो रहा है।

दरअसल, मरुकी गांव के निवासियों का यह गुस्सा सालों की बेबसी और प्रशासनिक अनदेखी का नतीजा है। गांव के सरपंच के मुताबिक, पिछले 10 सालों से वे स्थानीय अधिकारियों से लेकर जिला कलेक्टर के दफ्तर तक चक्कर काट चुके हैं, लेकिन हर बार सिर्फ खोखले आश्वासन ही हाथ लगे। एक दशक पहले इस सड़क का निर्माण कार्य शुरू भी हुआ था, लेकिन ठेकेदार पुलिया और पुलों के गड्ढे खोदकर काम बीच में ही छोड़कर भाग गए। 

ग्रामीणों ने बताया कि मेडिकल इमरजेंसी के दौरान हालात सबसे ज्यादा गंभीर हो जाते हैं. गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों और बीमार लोगों को मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए कई किलोमीटर तक खाट पर उठाकर ले जाना पड़ता है, जहां जाकर उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए कोई गाड़ी मिल पाती है.

मानसून के दिनों में यह खतरनाक रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है, जिससे गर्भवती महिलाओं और बुजुर्ग मरीजों को कई किलोमीटर तक खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। ग्रामीणों के अनुसार उन्हें मुफ्त सरकारी राशन लेने के लिए भी 11 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अगर कोई बुजुर्ग या असमर्थ व्यक्ति ट्रैक्टर की सवारी लेता है, तो उसे ₹100 का किराया देना पड़ता है। सरकार हमें मुफ्त राशन तो दे रही है, लेकिन उस राशन को घर तक लाने के लिए हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।