8.3 करोड़ बच्चों पर मोटापे का खतरा, आर्थिक सर्वे में जंक फूड के विज्ञापनों पर रोक लगाने की सिफारिश

Economic Survey 2026: इकोनॉमिक सर्वे ने अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत पर जताई चिंता, बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य को खतरे में बताया

Updated: Jan 30, 2026, 11:52 AM IST

नई दिल्ली। इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने देश में तेजी से बढ़ रही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) यानी जंक फूड की खपत पर गंभीर चिंता जताई है। सर्वे ने सुझाव दिया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाना चाहिए। सर्वे में यह भी कहा गया है कि शिशु और छोटे बच्चों के दूध उत्पादों और पेय पदार्थों के प्रचार पर भी सख्त रोक लगनी चाहिए।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, जंक फूड का बढ़ता सेवन मोटापा, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है, जिससे देश में स्वास्थ्य असमानता भी बढ़ रही है। सर्वे में कहा गया कि भारत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री के मामले में दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। 

साल 2006 में इन खाद्य पदार्थों की खुदरा बिक्री करीब 0.9 अरब डॉलर थी। 2019 तक यह बढ़कर लगभग 38 अरब डॉलर हो गई। 2009 से 2023 के बीच इसमें 150% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इसी दौरान पुरुषों और महिलाओं, दोनों में मोटापा लगभग दोगुना हो गया।

सर्वे के मुताबिक, लोगों की डाइट में UPFs के बढ़ने से दुनिया भर में क्रोनिक बीमारियां बढ़ रही हैं और हेल्थ में असमानताएं भी बढ़ रही हैं। लोगों की सेहत पर UPFs के असर को लेकर नए-नए आंकड़े आ रहे हैं, जिससे पता चलता है कि पब्लिक हेल्थ पॉलिसी को लागू करने में कोई देरी नहीं होनी चाहिए, जबकि आगे की रिसर्च भी जारी रहनी चाहिए। 

अब तक की 100 पॉलिसी उन खाने की चीजों की खपत कम करने पर जोर दे रही हैं जिनमें ज्यादा फैट, चीनी और सोडियम होता है, जिनमें से कई UPFs हैं। हालांकि, डाइट को बेहतर बनाना सिर्फ कंज्यूमर के व्यवहार में बदलाव पर निर्भर नहीं हो सकता; इसके लिए फूड सिस्टम में कोऑर्डिनेटेड पॉलिसी की जरूरत होगी जो UPF प्रोडक्शन को रेगुलेट करें, और ज्यादा हेल्दी और टिकाऊ डाइट और मार्केटिंग को बढ़ावा दें।

2019-21 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की रिपोर्ट के अनुसार, 24 फीसदी भारतीय महिलाएं और 23 फीसदी भारतीय पुरुष ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं। 15-49 साल की महिलाओं में 6.4 फीसदी मोटापे से ग्रस्त हैं, और पुरुषों में 4.0 फीसदी मोटे हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ज्यादा वजन की समस्या 2015-16 में 2.1 फीसदी से बढ़कर 2019-21 में 3.4 फीसदी हो गई है। अनुमानों के अनुसार, 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे का शिकार थे, और 2035 तक यह संख्या 8.3 करोड़ बच्चों तक पहुंचने का अनुमान है।

इकोनॉमिक सर्वे ने साफ कहा कि सिर्फ लोगों की खाने की आदत बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार को खाद्य उत्पादन, मार्केटिंग और नीतियों के स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। सर्वे ने सुझाव दिया कि जंक फूड के पैकेट पर आगे की तरफ पोषण चेतावनी लेबल लगाए जाएं, बच्चों को टारगेटेड विज्ञापनों पर रोक लगे और यह सुनिश्चित किया जाए कि व्यापार समझौते सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को कमजोर न करें।