विशेष दर्शन पर मंदिर समिति का एकाधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल मंदिर से जुड़ी याचिका खारिज की

उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने कहा, गर्भगृह प्रवेश तय करना अदालत का काम नहीं है।

Updated: Jan 27, 2026, 05:20 PM IST

उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि मंदिर में किसे विशेष दर्शन की अनुमति दी जाएगी यह तय करना अदालत का काम नहीं है।

यह मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था जब याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी ने महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन को भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे खत्म करने की मांग की थी। इससे पहले उन्होंने यही याचिका मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी दायर की थी लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली थी। जिसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी।

यह भी पढ़ें:कल्याण-डोंबिवली में शिवसेना UBT के 4 पार्षद गायब, जांच में जुटी पुलिस, खंगाले जा रहे CCTV फुटेज

इस याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने की। बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने की जबकि उनके साथ जस्टिस महादेवन और जस्टिस जॉयमाला बागची भी पीठ में शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तरह की याचिकाओं पर कड़ा रुख अपनाया है।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी लोगों को आसानी से प्रवेश मिल जाता है। वे शिवलिंग पर जल अर्पित कर पूजा कर सकते हैं। जबकि, आम श्रद्धालुओं को दूर से ही दर्शन करना पड़ता है। उनका कहना था कि यह व्यवस्था समानता के अधिकार का उल्लंघन है और संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है।

यह भी पढ़ें:MP में मौसम का बड़ा उलटफेर, 4.9 डिग्री तक गिरा पारा, कोहरे के बीच 28 जिलों में बारिश का अलर्ट

इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि गर्भगृह में किसे प्रवेश दिया जाए और किसे नहीं इसका फैसला अदालत नहीं कर सकती है। यह पूरी तरह मंदिर प्रशासन और प्रबंधन का विषय है। उन्होंने कहा कि अगर अदालत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने लगेगी तो न्यायपालिका पर अनावश्यक बोझ बढ़ जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश ने आगे यह भी कहा कि यदि अनुच्छेद 14 के आधार पर गर्भगृह में प्रवेश का अधिकार मांगा जाने लगे तो भविष्य में अनुच्छेद 19 के तहत मंत्र पढ़ने या अन्य धार्मिक क्रियाओं के अधिकार की भी मांग उठ सकती है जिससे न्यायिक सीमाएं धुंधली हो जाएंगी।

यह भी पढ़ें:MP: गणतंत्र दिवस पर पिपरिया हाईस्कूल शर्मसार, छात्राओं के चेंजिंग रूम में घुसे नशे में धुत युवक, शिक्षकों से मारपीट

याचिका में यह मांग रखी गई थी कि या तो गर्भगृह में सभी श्रद्धालुओं की एंट्री पूरी तरह बंद कर दी जाए या फिर सभी को समान रूप से प्रवेश की अनुमति दी जाए। कुछ चुनिंदा लोगों को विशेष सुविधा देना समानता के सिद्धांत के खिलाफ बताया गया था।