टाइगर स्टेट MP में बाघ सुरक्षित नहीं, 7 महीने में 40 बाघों की हुई मौत

मध्य प्रदेश में इस साल 40 बाघों की मौत दर्ज की गई है। जो देशभर में हुई कुल 111 मौतों का 36 प्रतिशत है। टाइगर रिजर्व से बाहर निकलते बाघ बिजली के तारों, आपसी संघर्ष और शिकार की चपेट में आ रहे हैं।

Updated: Jul 29, 2026, 05:42 PM IST

देश में सबसे अधिक बाघों वाले राज्य मध्य प्रदेश के सामने अब बाघ संरक्षण की नई चुनौती खड़ी हो गई है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के 19 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, इस साल देशभर में 111 बाघों की मौत दर्ज की गई है। इनमें अकेले मध्य प्रदेश में 40 बाघों की मौत हुई है। यह कुल मौतों का करीब 36 प्रतिशत है। इस सूची में महाराष्ट्र 25 मौतों के साथ दूसरे और तमिलनाडु 9 मौतों के साथ तीसरे स्थान पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनकी सुरक्षा खासकर टाइगर रिजर्व के बाहर अब सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

राज्यवार आंकड़ों से साफ है कि मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा महाराष्ट्र से 15 अधिक और तमिलनाडु की तुलना में चार गुना से ज्यादा है। प्रदेश में वर्तमान में लगभग 785 बाघ हैं और उनकी बढ़ती आबादी अब टाइगर रिजर्व की सीमाओं से बाहर भी फैल रही है। ऐसे में जंगलों के बीच संपर्क मार्ग (कॉरिडोर), बफर क्षेत्र और मानव बस्तियों के आसपास सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रदेश में दर्ज 40 मौतों में से 24 बाघों की मौत टाइगर रिजर्व के भीतर हुई है। जबकि, 16 बाघ रिजर्व क्षेत्र के बाहर मृत पाए गए हैं। यानी करीब 40 प्रतिशत मौतें ऐसे इलाकों में हुई जहां बाघ मानव गतिविधियों के ज्यादा संपर्क में आते हैं। नर्मदापुरम, सीहोर, शहडोल, छिंदवाड़ा, बुरहानपुर, उमरिया, बालाघाट, सिवनी, नरसिंहपुर और सतना जैसे जिलों में रिजर्व के बाहर बाघों की मौत दर्ज हुई है। वहीं, बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, पन्ना, सतपुड़ा, संजय-डुबरी, रातापानी और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में भी कई मामलों की पुष्टि हुई है।

वन विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2025 में प्रदेश में 53 बाघों की मौत हुई थी। इनमें सबसे बड़ा कारण बाघों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर हुआ आपसी संघर्ष रहा है। रिकॉर्ड के अनुसार, 17 मौतें आपसी संघर्ष, 7 बिजली के करंट, 6 प्राकृतिक कारणों, 5 अज्ञात कारणों, 2 ट्रेन दुर्घटनाओं तथा अन्य मौतें बीमारी, संक्रमण और विभिन्न हादसों के कारण हुई हैं। वहीं, साल 2026 के शुरुआती महीनों में दर्ज 29 मामलों में 22 मौतें प्राकृतिक और अन्य कारणों से तथा 7 मौतें शिकार से जुड़ी पाई गई हैं। शिकार के सात मामलों में छह बाघों की मौत बिजली के करंट से हुई है। जबकि, एक मामला सीधे अवैध शिकार का था। प्राकृतिक कारणों में भी आपसी संघर्ष प्रमुख वजह रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है वैसे वैसे युवा और वयस्क बाघ नए इलाकों की तलाश में टाइगर रिजर्व से बाहर निकल रहे हैं। इसी दौरान वे खेतों में लगी बिजली की फेंसिंग, रेलवे लाइन, सड़क, मानव बस्तियों और अन्य खतरों की चपेट में आ रहे हैं। यही वजह है कि संरक्षण की रणनीति अब सिर्फ संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकती।

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एनटीसीए के 2012 से 2025 तक के आंकड़े भी इस चिंता को मजबूत करते हैं। इनके अनुसार, देशभर में दर्ज बाघों की लगभग 47.5 प्रतिशत मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर हुई हैं। इससे स्पष्ट है कि बाघ संरक्षण के लिए सुरक्षित वन कॉरिडोर, बफर जोन और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीति पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. समीता राजौरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय टाइगर डे के अवसर पर वन विभाग संरक्षण व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए तकनीक तथा जनभागीदारी पर विशेष ध्यान दे रहा है। उनके अनुसार, मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा लंबे समय से अपनाई गई प्रभावी प्रबंधन प्रणाली और स्थानीय लोगों के सहयोग से मिला है। अब बढ़ती बाघ आबादी के अनुरूप बेहतर हैबिटेट विकसित करने और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी काम किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए जाने वाले बिजली के तार और अवैध फंदे कई बार बाघों और तेंदुओं की मौत का कारण बनते हैं। इसके विकल्प के रूप में सोलर झटका मशीनों को बढ़ावा देने की योजना पर विचार किया जा रहा है। साथ ही भोपाल सहित संवेदनशील क्षेत्रों में ई सर्विलांस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित कैमरों के जरिए बाघों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है ताकि समय रहते ग्रामीणों को सतर्क किया जा सके और मानव-बाघ संघर्ष को कम किया जा सके।

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वहीं, वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने दावा किया कि इस साल प्रदेश में अब तक 45 बाघों की मौत हो चुकी है। उनके अनुसार, इनमें 11 मामले शिकार से जुड़े हैं जबकि सात मामलों में शिकार की पुष्टि हुई है और चार मामलों में बाघों के अंग बरामद किए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि संरक्षण व्यवस्था में लंबे समय से बरती जा रही कथित लापरवाही और शिकार रोकने के प्रयासों में कमी के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ रही बाघों की मौतें प्रदेश की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश के सामने अब चुनौती केवल बाघों की संख्या बढ़ाने की नहीं बल्कि उनकी सुरक्षित आवाजाही, बेहतर आवास और रिजर्व के बाहर भी प्रभावी संरक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने की है। यदि राज्य को देश का अग्रणी टाइगर स्टेट बनाए रखना है तो संरक्षण की रणनीति को जंगलों की सीमाओं से बाहर तक विस्तार देना होगा।

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