जम्मू-कश्मीर में देशद्रोह और UAPA कानून का हुआ दुरुपयोग, पूर्व जजों और नौकरशाहों की रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल शासन के तहत नागरिकों की स्थिति बदतर होती जा रही है, सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकारों को देशद्रोह और आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत उनपर निशाना बनाया जा रहा है, ये आरोप न्यायाधीशों और पूर्व नौकरशाहों की एक रिपोर्ट में लगाया गया है

Updated: Aug 08, 2022, 01:48 PM IST

जम्मू-कश्मीर में देशद्रोह और UAPA कानून का हुआ दुरुपयोग, पूर्व जजों और नौकरशाहों की रिपोर्ट
Photo Courtesy: NDTV

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में नागरिकों की स्थिति और अधिक बदतर होती जा रही है। यहां सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को देशद्रोह और आतंकवाद विरोधी कानूनों जैसे कि UAPA के तहत निशाना बनाया जा रहा है। एक्टिविस्ट्स और जर्नलिस्ट्स को निशाना बनाने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। ये बात पूर्व जजों और ब्यूरोक्रेट्स की एक रिपोर्ट में सामने आया है। 

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह की अध्यक्षता वाली रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि उपराज्यपाल के तीन साल के शासन के बाद नागरिक सुरक्षा की स्थिति बदतर हो गई है। कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ यूएपीए और पीएसए जैसे देशद्रोह और आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग जारी है। इस रिपोर्ट में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई आयोग द्वारा अनुशंसित परिसीमन की भी आलोचना की गई है। 

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रिपोर्ट में फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स' को लेकर "प्रचार" की भी आलोचना की गई है और कहा गया है कि इस फिल्म ने पंचों (ग्राम प्रधानों) और पंडितों को घाटी में अधिक असुरक्षित बना दिया है। फोरम ने केन्द्र सरकार से यह अपील की है कि जम्मू और कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। यह भी कहा है कि चुनाव आयोग को विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा करनी चाहिए और उन्हें पहले से निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों के तहत रखना चाहिए।

यह रिपोर्ट घाटी की स्थिति पर सरकार के रुख के बिल्कुल विपरीत है। हाल ही में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में दावा किया था कि साल 2022 में एक भी कश्मीरी पंडित ने कश्मीर घाटी नहीं छोड़ी है। उन्होंने इस रिपोर्ट का भी खंडन किया था कि समुदाय के कई लोगों ने आतंकवादियों द्वारा टारगेट किलिंग्स के बाद घाटी छोड़ने की धमकी दी है।

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव गोपाल पिल्लई की सह-अध्यक्षता में इस स्वतंत्र रिपोर्ट को तैयार किया गया है। फोरम के अन्य सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रूमा पाल और मदन लोकुर, पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव और लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग (सेवानिवृत्त) हैं। इस फोरम ने अगस्त 2021 से जुलाई 2022 तक की अवधि के दौरान वहां के हालातों को लेकर अपना रिपोर्ट पेश किया है।