Gandhi Jayanti: गांधी हमेशा हमारे साथ हैं
इस गाँधी जयंती से अहिंसात्मक प्रतिरोध का नया दौर पूरे देश में आरंभ हो रहा है। महात्मा गांधी, विचार के साथ ही साथ यदि हमारे आचरण का हिस्सा भी हो जाएं तो वर्तमान अनीति, अनैतिकता, अनाचार, अत्याचार टिक नहीं पाएगा।
“अगर पिता अन्याय करे तो उसके बालकों का फर्ज है, कि वे पिता का आश्रय छोड़ दें! अगर किसी स्कूल का हेडमास्टर अनीति के आधार पर अपनी संस्था चलाये, तो विद्यार्थियों को वह स्कूल छोड़ देना चाहिए। अगर किसी कारपोरेशन का अध्यक्ष भ्रष्टाचार चलाता हो, तो उसके सदस्यों को चाहिये कि वे कारपोरेशन से अलग हो जाएं और इस प्रकार अध्यक्ष के भ्रष्टाचार से खुद को निर्दोष सिद्ध कर दें। इसी प्रकार अगर कोई सरकार घोर अन्याय करे, तो प्रजा को उस सरकार के साथ पूरा या आंशिक असहयोग देना चाहिए — लेकिन वह इतना जरूर होना चाहिए कि शासक अपनी दुष्टता छोड़ दे।
- महात्मा गांधी
गांधी जयंती पर हम सब उपरोक्त में से किन-किन बातों पर गंभीरता से निर्णय ले पाने की हिम्मत जुटा सकते हैं? गांधी जी अपने इस संक्षिप्त उदाहरण में परिवार, शिक्षा, व्यापार, समाज और सरकार सबसे एक नीतिपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा रखते हुए अंत में पूरी जनता का आह्वान कर रहें हैं कि वह असहयोग के माध्यम से "शासक" को उनकी "दुष्टता" से निजात दिला दे। भारत की वर्तमान स्थिति में बदलाव मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे या महाभियोग से ही नहीं आ पाएगा। यह राजनीतिक या प्रशासनिक परिवर्तन का सूचक भर हो सकता है। "शा" की जगह "गा" के आ जाने के भर से चुनावी तंत्र नहीं सुधरेगा, और "न" की जगह "म" और "अ" के स्थान पर "ब" के आ जाने से राजनीतिक धारा या व्यवस्था भी नहीं बदलेगी। परिस्थितियां तभी बदलेंगी जब व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन को लेकर बहस और विचार मंथन होगा!
भारत में चुनावों में हो रही धांधलियों और चुनाव आयोग की अकर्मण्यता पर बहुत सी बातें सामने आ रही हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी को लेकर बवाल सा मचा हुआ है। दुखद यह है कि यह सब "इंडियन एक्सप्रेस" में छपी रिपोर्ट के बाद हुआ है। जबकि वास्तविकता यह है कि राहुल गाँधी ने एक वर्ष पहले 18 सितंबर 2025 को "वोट चोरी" को लेकर प्रेसवार्ता की थी और 2024 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हुई अनियमितताओं को सामने रखा था। उसी क्रम में वे महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में हुई अनियमितताओं की बात भी उठाते रहे। उन्होंने अपनी तर्कपूर्ण बात के साथ प्रमाण भी सामने रखे थे। परन्तु देश का यह दुर्भाग्य रहा कि उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया। ऐसा सिर्फ मीडिया, सरकार या चुनाव आयोग ने नहीं बल्कि तकरीबन सभी राजनीतिक दलों ने भी किया। जबकि ये सभी लोकतंत्र के डगमगाते जहाज पर एकसाथ सवार हैं। इस अनदेखी का खामियाजा सभी राजनीतिक दलों, जिनमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है, ने उठाया है।
आज तक़रीबन सभी राजनीतिक दलों को यह लग रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के बदल जाने से स्थितियां बदल जाएंगी। गौर करिए जब सर्वोच्च न्यायालय यह कहे कि अगली बार मत (वोट) दे देना या अभी तो सिर्फ उपचुनाव हैं और ऐसे में स्थगन की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान में कमोवेश 13 (तेरह) करोड़ नागरिक संदिग्ध मतदाता हो गए। दुनिया में महज एक दर्जन देशों की आबादी इससे ज्यादा है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि चुनाव आयोग का कार्य मतदाताओं को जोड़ना है या उन्हें बेदखल करना। क्या ये लोग भारत के नागरिक नहीं हैं? और यदि ये भारत के नागरिक हैं तो इनके मताधिकार का बहिष्कार कर बनी कोई भी सरकार को वैधता कैसे प्रदान की जा सकती है? इस सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली, बैंगलोर जैसे शहरों में करीब 40 से 50 प्रतिशत मतदाताओं को संदिग्ध करार कर देने के बावजूद कहीं से भी व्यापक असंतोष सामने नहीं आया है? बिहार और बंगाल से किसी बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट तक सुनाई नहीं दी। क्या हमारा लोकतंत्र के प्रति लगाव घटता जा रहा है या हम इतने हताश हो गए हैं कि खुद से भी उम्मीद गवाँ बैठे हैं?
विजय देवनारायण साही की पंक्तियाँ हैं, "परमगुरु, दो तो ऐसी निरीहता दो / कि इसे दहाड़ते आतंक के बीच / फटकार कर सच बोल सकूँ / और इसकी चिन्ता न हो / कि इसे बहुमुखी युद्ध में / मेरे सच का इस्तेमाल / कौन अपने पक्ष में करेगा।" भारतीय नेताओं में से संभवतः राहुल गाँधी ने ही वर्तमान राजनीतिक सत्ता के प्रत्येक अंधेरे पक्ष को पूरी ईमानदारी और साहस के साथ सामने रखा। फिर बात नोटबंदी की हो या जीएसटी की। राफेल विमान की हो या शेयर बाजार की और अब चुनाव आयोग द्वारा की गई अनियमितताओं की।
हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि इस पूरे मामले में चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग तो बस मोहरे हैं। शतरंज की इस बिसात में असली रुतबा तो राजा और वजीर का ही है। वैसे शतरंज के खेल में कोशिश रहती है कि प्यादे को कैसे न कैसे वजीर बना दिया जाए। इसलिए लगता है कि खेल में पूरी ताकत प्यादे के पीछे है, लेकिन वास्तव में घेरा तो सामने वाले राजा और वजीर को जाता है और प्यादा आखिरी घर तक पहुँचने से पहले अक्सर शहीद हो जाता है। वैसे भी कौनसा राजा अपने प्यादे को राजा बनने देगा?
याद करिए आजादी के संघर्ष के दौरान भी एक समय आया था, जब महात्मा गाँधी स्वयं को अकेला महसूस करने लगे थे। तब उन्होंने कहा भी था, "जब-जब लोगों से भयंकर भूलें होंगी, तब-तब मैं उन्हें कबूल करता ही रहूँगा। अगर मैं इस दुनिया में किसी जालिम के आगे सिर झुकाता हूँ, तो वह है मेरा "अंतर्नाद” और यदि मेरा साथ देने वालों की संख्या घटते-घटते इतनी हो जाए कि मैं अकेला ही रह जाऊँ, तो भी मेरा नम्र विश्वास है कि उस अवस्था में भी रह सकने का साहस मुझमें है।"
अतएव आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयुक्तों और शीर्ष सत्ता परिवर्तन की मांग के समानांतर वैकल्पिक व्यवस्था का प्रारूप भी सामने रखा जाए। यदि छात्रों से युवाओं से बात की जाती है तो नई शिक्षा नीति का विकल्प भी सामने रखा जाना अनिवार्य है। अन्यथा एक दशक में फिर इसी तरह की परिस्थिति के दोहराव का अंदेशा बना ही रहेगा।
अतएव गांधी को सिर्फ विचार में नहीं आचरण में लाने की भी आवश्यकता है। वे कहते हैं, "घृणा मारना सिखाती है और प्रेम मरना।" वे समझाते हैं “नैतिकता के सबसे प्राथमिक सिद्धांत को देखें तो उच्चता और न्यूनता या हीनता का विचार सबको घृणास्पद है।" परंतु पिछले एक दशक से ज्यादा से उच्चता का विचार जिस तेजी से फैलाया गया है उसने अंततः समाज में घृणा को स्वीकार्यता प्रदान करने के कगार तक पहुँचा दिया है।
साही ने इसी कविता में कहा है, "परम गुरु / दो तो ऐसी विनम्रता दो / कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ / और यह अंतहीन सहानुभूति / पाखंड न लगे / दो तो ऐसा कलेजा दो / कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख / की गाँठों में मरोड़े हुए / उन लोगों का माथा सहला सकूँ / और इसका डर न लगे / कि कोई हाथ ही काट खाएगा।" तो स्थितियां यहाँ तक पहुँच गई है कि भारतीय समाज के लोकतंत्र को पुनर्परिभाषित किया जाना अब अनिवार्य हो गया है।
वास्तविकता यह है कि भारत में लोकतंत्र की बहाली का संघर्ष अब लड़ाई की सीमा लांघकर युद्ध जैसी संज्ञा की ओर बढ़ गया है। स्थितियों को सिर्फ राजनीतिक हलकों तक सीमित रख कर संविधान की रक्षा कर पाना अब संभव नहीं है। भारत की वर्तमान सत्ता व्यवस्था प्रत्येक स्वतंत्र और निरपेक्ष आवाज को दबाने में काफी हद तक सफल हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में गैर लाभकारी संगठनों का चरित्र जिस तरह बदला है, वह हम सबके सामने है।
अधिकारों को लेकर संघर्षरत संगठनों की आर्थिक नाकाबंदी कर दी गई है। सिर्फ वे ही अब कार्य कर पा रहे हैं जो सेवा कार्य में सक्रिय हैं। पिछले कुछ वर्षों में गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से जो सुधार की आवाजें उठ रहीं थीं और प्रयास हो रहे थे, अब दोनों ही थम गए हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी किसी "हिल स्टेशन" पर स्थायी छुट्टी पर चला गया है। ऐसे समय में चुनाव आयोग की गैर जिम्मेदाराना गतिविधियों ने भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग में चेतना का संचार किया है। हमें याद रखना होगा कि गांधी जी ने आजादी के करीब 12 वर्ष पहले ही यह समझा दिया था कि आजादी के बाद के हमारे संघर्ष और ज्यादा दुष्कर हो जाएंगे क्योंकि तब हमें अपनी चुनी सरकार से ही संघर्ष करना होगा। उनका कहा आज सच होता नजर आ गया है।
इंडिया गठबंधन की बैठक में एकमत से संघर्ष की बात को स्वीकारा है। यह स्वागत योग्य है। परंतु आवश्यकता इस संघर्ष को तमाम असहमतियों के बावजूद जीवंत बनाए रखने की है। सुखद यह है कि सत्ताधारी अब धार्मिक उन्माद की बात नहीं कर पा रहे हैं। यह भारतीय गणतंत्र के लिए शुभ संकेत भी है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि गांधी को खोजने में समय व्यर्थ न करें। वे हमेशा हमारे साथ हैं। खोजा तो उसे जाता है, जो कहीं चला गया हो। बापू ने तो कहा भी था कि मैं तुम्हें अपनी कब्र से भी देखता रहूँगा। अनायास ही आजादी के संघर्ष जैसी परिस्थितियां निर्मित होती जा रही हैं। शासक वर्ग को समझना चाहिए कि भारत महज एक देश नहीं, बल्कि एक विचार है, जो हजारों वर्षों से तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी संस्कृति को बनाए रखे हुए है।
इस गाँधी जयंती से अहिंसात्मक प्रतिरोध का नया दौर पूरे देश में आरंभ हो रहा है। महात्मा गांधी, विचार के साथ ही साथ यदि हमारे आचरण का हिस्सा भी हो जाएं तो वर्तमान अनीति, अनैतिकता, अनाचार, अत्याचार टिक नहीं पाएगा।
अंत में बापू के इस कथन पर जरूर गौर करिए, "बहुमत के नियम का अमुक हद तक ही उपयोग है, अर्थात मनुष्य को तफसील की बातों में ही बहुमत के आगे झुकना चाहिए। लेकिन बहुमत के चाहे जैसे निर्णयों के लिए अनुकूल बनने का अर्थ गुलामी होगा। लोकतंत्र के मानी ऐसा राज्य नहीं जिसमें लोग भेड़ की तरह व्यवहार करें। लोकतंत्र में व्यक्ति के मत और कार्य की स्वतंत्रता की सावधानी से रक्षा की जाती है।" परंतु आज क्या यह हो पा रहा है? और ऐसा क्यों? तो जवाब के लिए उनकी इस बात पर गौर करिए, "ब्रिटेन की तोपें-बंदूकें हमारी गुलामी के लिए उतनी जिम्मेदार नहीं हैं, जितना हमारा स्वेच्छा से दिया हुआ सहयोग।" वे यह भी समझाते हैं, "मेरी निश्चित मान्यता है कि मनुष्य अपनी कमजोरी से अपनी स्वतंत्रता खोता है।" बापू को नमन
(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)




