गोडसे ज्ञानशाला में महात्मा गांधी कहां-कहां हैं

गांधी को जब भी कटघरे में खड़ा किया जाता है, गांधी के तरीकों, गांधी की नीतियों और गांधी के विचारों से ही जवाब मिलते हैं, गरीबों और वंचितों के लिए किये गये गांधी के कार्य हिंदू महासभा का मार्गदर्शन कर सकते हैं

Updated: Jan 13, 2021, 09:31 PM IST

गोडसे ज्ञानशाला में महात्मा गांधी कहां-कहां हैं
Photo Courtesy: Mohit Singh/Wikimedia Commons

ग्वालियर की गोडसे ज्ञानशाला में जब पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे तब महात्मा गांधी एक बार फिर याद आ गए। 31 मई 1947 को बापू ने अपनी प्रार्थना सभा में कहा था कि यदि सम्पूर्ण भारत जलता रहे और मुस्लिम लीग यदि तलवार की नोंक पर इसे मांगती है तो भी हम पाकिस्तान स्वीकार नहीं करेंगे। जिन्ना गांधी को पाकिस्तान की राह मे सबसे बड़ा रोड़ा समझते थे। दरअसल गांधी विभाजन को आज़ादी के बाद तक टालना चाहते थे। वे कहते थे कि आज़ादी के वातावरण में दोनों समुदाय मिलजुल कर रहना सीख लेंगे। गांधी की तमाम कोशिशों पर सांप्रदायिक ताकतों की ज़िद भारी पड़ी और अंतत: भारत का विभाजन हो गया।  बाद में जब गोडसे ने गांधी की हत्या की तो इसका बड़ा कारण भारत का विभाजन बताया गया और इसके लिए बापू को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। अब बापू नहीं हैं लेकिन अखंड भारत की परिकल्पना अब भी हिलोरें मारती है। यह बात और है कि बचे हुए भारत को सुरक्षित रखने की आशाएँ अक्सर धूमिल करने की कोशिशें भी होती रहती हैं। 

गोडसे को हिंदू महासभा से संबद्ध बताया जाता है। महात्मा गांधी की हत्या में उपयोग की गई बंदूक से गोडसे की ज्ञानशाला तक के सफर में ग्वालियर का स्थान हिंदू महासभा के लिए बेहद अहम रहा है। निश्चित ही गोडसे ज्ञानशाला में हिन्दू महासभा ने देश के विभाजन को लेकर कहानियां सुनाई होंगी, नाथूराम गोडसे की देशभक्ति का बखान किया गया होगा। महात्मा गांधी कहते थे कि असहमति के बिना आज़ादी अधूरी है, लिहाजा हिंदू महासभा की महात्मा गांधी के विचारों से असहमति और गोडसे के विचारों से सहमति की आलोचना अलोकतांत्रिक ही होगी। लेकिन इन सबके इतर इस संस्था के और भी उद्देश्य निर्धारित किए गए थे, जिन पर प्रकाश डालना लाजिमी होगा।  बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में अखण्ड हिन्दुस्तान की स्थापना को केंद्र में रखकर बनाई गई यह संस्था भारतीय संस्कृति की रक्षा करना,विभिन्न जातियों तथा उपजातियो को एक अविछिन्न समाज में संगठित करना, सामाजिक असमानता से दूर एक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण तथा नारी सम्मान की रक्षा जैसे उद्देश्यों को अपना ध्येय बताती रही है।

महिला उत्पीड़न को लेकर भारत दुनिया भर में बदनाम है और  इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि बेटियों की सुरक्षा को लेकर समाज में एक बेचैनी और दहशत का माहौल है। पिछले साल जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते है कि  देश में हर दिन बलात्कार की औसतन 87 घटनाएं हो रही हैं।   एनसीआरबी के मुताबिक देशभर में 2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 7.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या हुई थी, तब वे प्रार्थना सभा की और बढ़ रहे थे। बूढ़े बापू का बायां हाथ मनु और दायां हाथ आभा के कंधे पर था। बाएं तरफ से ज्ञान शाला के मुख्य किरदार नाथूराम गोडसे गांधी की तरफ झुके, इस दौरान गोडसे ने मनु को धक्का दिया और उनके हाथ से माला और पुस्तक नीचे गिर गई। वह उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकीं तभी गोडसे ने पिस्टल निकाल ली और एक के बाद एक तीन गोलियाँ गांधी के सीने और पेट में उतार दीं। इस दौरान भारतीय संस्कृति की अस्मिता के मुख्य तत्व नारी सम्मान, पुस्तक की गरिमा और बूढ़ी काया का सम्मान तार-तार होते दुनिया ने देखा। हाथरस और बदायूं जैसी न जाने कितनी वीभत्स घटनाएँ इस देश में रोज होती हैं। हिंदू महासभा के उद्देश्य के अनुसार इसके सदस्य इन घटनाओं को रोकने या इनका विरोध करते शायद ही कभी देखे गए हों।

हिंदू एकता और समानता स्थापित करने की बात करने वाली हिंदू महासभा की डायरी में झारखंड के आदिवासी भी होने चाहिए। जहां चालीस प्रतिशत से भी ज़्यादा आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रहती है, इनमें आदिवासी और पिछड़े तबक़े के लोग ज़्यादा हैं।  यहां पर भूख से आदिवासियों के मर जाने की खबरें आती रहती हैं। मरने वालों में ज़्यादातर वो लोग होते हैं जिनके पास रोज़गार के साधन नहीं हैं या फिर उन्हें समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 2017 में  झारखंड के सिमडेगा ज़िले के कारीमाटी में कोइली देवी की 11 साल की बेटी संतोषी की मौत भूख से हो गई थी। अपने दर्द को बयान करते हुए इस बेबस माँ ने कहा था,“मैं मज़दूरी करती हूँ। कई दिनों तक मुझे काम नहीं मिल पाया। घर में अनाज नहीं था। बेटी भूखी थी, वो बार-बार भात मांग रही थी। मगर मैं कहाँ से लाती, मैंने उसे लाल चाय बना कर दी। मगर कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया।” 

कोइली देवी कहती हैं कि उन्हें गाँव के लोगों से भी मदद नहीं मिलती थी, क्योंकि वो पिछड़े समाज से आती हैं। जब पानी भरने गाँव के चांपाकल पर जाती हैं, तो उसके बाद पानी भरने वाले उसे धोकर पानी भरते हैं। उसका कहना था, क्या मदद मांगूं? छुआछूत करते हैं गाँव के लोग। कोई चावल उधार भी नहीं देता,क्योंकि अगर हम उधार वापस लौटाएंगे तो वो हमारे छुए चावल को नहीं लेंगे।” कोइली देवी आज भी उसी झोपड़ी में रहती है,उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। कहने के लिए वह हिंदू ही हैं, लेकिन महासभा के सदस्य कोइली देवी की समस्याओं को देश के लिए किसी खतरे के रूप में न देखते। लेकिन गांधी को गरीबी और असमानता भारत के लिए बड़ी चुनौती लगती थी। गांधी अपने साथ लोगों के चलने का आह्वान करते हुए यह जरूर याद दिलाते थे कि मेरे साथ चलना है तो सब कुछ त्याग कर चलना होगा। मोटा कपड़ा पहनना होगा, जल्दी उठना होगा, नीरस खाना खाकर अपना पेट भरना होगा तथा अपना मल स्वयं साफ करने को तैयार रहना होगा।

हिंदू महासभा का एक उद्देश्य सामाजिक असमानता को खत्म कर मजबूत हिंदू धर्म का निर्माण बताया जाता है। उनके इस उद्देश्य को गांधी ही पूरा करते नजर आते हैं। गांधी ने एक बार कहा था कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं अस्पृश्यों में ही जन्म लेना पसंद करूंगा, जिससे मैं उनके सम्मान के लिए पुन: संघर्ष कर सकूँ। पूना पैक्ट के जरिए उन्होंने हिंदू धर्म का संभावित विभाजन टाल दिया था। यही कारण है कि भारत के दलित गांधी पर भरोसा करते हैं। हिंदू महासभा का अस्तित्व इनमें कहां है, किसी को नहीं मालूम।

हिंदू महासभा का उद्देश्य राष्ट्र को मजबूत करना बताया जाता है। राष्ट्र के मजबूत होने के लिए गरीबी को भी दूर करना पड़ेगा। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल आबादी का 30 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे ज़िंदगी बसर करता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2020 के अनुसार वैश्विक सूचकांक में भारत का स्कोर 27.2 है। यह स्थिति गंभीर स्तर की मानी जाती है। दुनिया के 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत 94वें नंबर पर है। अति पिछड़े और गृह युद्ध से बुरी तरह से प्रभावित देश सूडान के साथ। कोरोनाकाल में देश के 40 करोड़ मजदूर प्रभावित हुए। अनेक भूख प्यास से मर गए, पैदल चलते हुए मर गए, कई परिवार भूखे सोने को मजबूर हुए। 2017 में जब झारखंड में आदिवासियों के भूख से मरने की खबरें आईं, तब  झारखंड के तत्कालीन खाद्य व आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने कहा कि हमने हर आरोप की जाँच करायी, लेकिन हमें भूख से मौत का कोई उदाहरण नहीं मिला। झारखंड पहला राज्य है, जिसने भूख से मौत की परिभाषा तय करने के लिए कमेटी बनायी और इसका एक प्रोटोकॉल निर्धारित किया।

महात्मा गांधी यदि जीवित होते तो जरूर इन आदिवासियों की झोपड़ियों में जाते, किसी संस्था के लोग यहां तक गए न गए, पता नहीं है। महात्मा गांधी जीवन भर व्यवस्थाओं को बेहतर करने के लिए जूझते रहे और उनके मरने के बाद उनके अनुयायी गांधी मार्ग पर चल पड़े।  गांधी की मृत्यु के बाद उनके बहुत सारे साथी और सहयोगी सेवाग्राम में जुटे। एक दूसरे से मिले और वापस अपने अपने क्षेत्रों में लौटकर दीन दुखियों की सेवा, गरीबों की बस्तियों में अध्यापन, जन जागृति, कुटीर और ग्रामोद्योग के प्रति चेतना बढ़ाने जैसे कार्यो में संलग्न हो गए। 

गांधी के प्रमुख सहयोगी रहे आचार्य विनोबा भावे ने आंध्र प्रदेश से भूदान आंदोलन प्रारम्भ किया। यह जमींदारों से जमीन दान में लेकर गरीबों और भूमिहीन लोगों को स्वेच्छा से जमीन दान करने का कार्यक्रम था। उनका यह आंदोलन 13 सालों तक चलता रहा। इस दौरान विनोबा भावे ने देश में 58 हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया। इसके नतीजे उत्साहवर्धक रहे और वह गरीबों के लिए 44 लाख एकड़ भूमि दान के रूप में हासिल करने में सफल रहे। उन जमीनों में से 13 लाख एकड़ जमीन को भूमिहीन किसानों के बीच बांट दिया गया। एक और गांधीवादी बाबा आमटे को हम सब जानते है। महाराष्ट्र के चन्द्रपुर के आनंदवन में अब बाबा आमटे जीवित नहीं है लेकिन उनका आनंदवन दलितों, वंचितों और  जरुरतमंदों का घर है जहां विश्व शांति का हर दिन संदेश दिया जाता है।

गांधी की सहयोगी सरला बहन ने उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के हिमालयी जंगलों में पर्यावरणीय विनाश के बारे में लोगों में बड़ा जागरुकता अभियान चलाया और प्रख्यात चिपको आंदोलन के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी मानते थे कि मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे पर निर्भर हैं और अभिन्न रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सरला बहन  बापू की इस विचारधारा को आम जन तक पहुंचाती रहीं और इसका सकारात्मक प्रभाव हुआ। विकास के नाम पर होने वाली कटाई पर काफी हद तक रोक लगी। भारत में मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने वाले और सुलभ शौचालयों के जनक बिंदेश्वर पाठक का जीवन और कार्य भी  गांधी के आदर्शों से प्रेरित है।  उनके प्रयासों और सुलभ इंटरनेशनल की मदद से देशभर में सुलभ शौचालयों की श्रृंखला स्थापित हुई है।

यह माना जाता है कि हिंदू महासभा भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार पर बल देती है। बापू के जीवन में यही सब तो दिखाई दिया था। उनके जीवन पर रामायण, राम चरित मानस और गीता का बड़ा प्रभाव था। बुराई पर अच्छाई की विजय का गुण उन्होने प्रभु श्री राम से ही सीखा था। पतंजलि से आत्म शुद्धि और अहिंसा जैन धर्म से सीखी थी। पवित्र आचरण और मन की शुद्धता के गुण उन्होने भारतीय मनीषियों से सीखे थे। बापू के सहयोगी विनोबा भावे ने कहा था कि गांधी के विचारों में सदैव ऐसा मनुष्य और समाज रहा, जहां वह करुणा मूलक, साम्य पर आश्रित स्वतंत्र लोकशक्ति के रूप में आगे बढ़े। यदि हम उसके योग्य नहीं बनते तो आज ही नष्ट हो जाने की नौबत है।

गांधी पर सवाल खड़े किए जाने चाहिए क्योंकि गांधी पर किए गए सवाल हमें गांधी के और करीब आते हैं। हमें और उनके बारे में समझाते हैं और हम अपने अंदर बैठे गांधी को उभार पाते हैं। गांधी को जब भी कटघरे में खड़ा किया जाता है, गांधी के तरीकों, गांधी की नीतियों और गांधी के विचारों से ही जवाब मिलते हैं। गांधी सिखाते हैं कि उच्च नैतिक आदर्शों का पालन करते हुए भी नेतृत्व किया जा सकता है और लोकप्रियता हासिल की जा सकती है। गांधी के गरीबों और वंचितों के लिए किए गए कार्य हिंदू महासभा के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं।