अफ़गानिस्तान: मर्ज से पहले मरीज को पहचानिए

सन् 1978 में अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार और इस्लामी मुजाहिदीन के बीच का संघर्ष गृहयुद्ध में बदल गया। इसके एक वर्ष पश्चात तत्कालीन सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर सत्ता पर कम्युनिस्टों की पकड़ को बनाए रखने का प्रयास किया।

Publish: Aug 21, 2021, 12:27 PM IST

अफ़गानिस्तान: मर्ज से पहले मरीज को पहचानिए
Photo Courtesy: Financial Times

अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति ने मौजूदा वैश्विक शासन व्यवस्था को उधेड़कर रख दिया है। इस कम आबादी वाले बड़े देश में जो कुछ हुआ है, हो रहा है और होने वाला है, वह बेहद सशंकित कर देने वाला है। दुनिया के बड़े और छोटे, अमीर व गरीब, विकसित, विकासशील व अल्पविकसित देश ही नहीं तमाम वैश्विक संस्थाएं जिस तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहीं हैं, उसे देख सुन व पढ़कर लगता है कि अफगानिस्तान इस पृथ्वी ग्रह का हिस्सा न होकर सुदूर किसी अन्य अंतरिक्ष मंडल का भाग है। वहां सामान्य मनुष्य नहीं बल्कि एलियन रहते हैं, जिनकी भाषा, आचार व्यवहार हम पृथ्वीवासियों से एकदम भिन्न है ? पर क्या वास्तव में ऐसा ही है ?

अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो समझ में आता है कि अब अमेरिका स्वयं को मुक्त महसूस कर रहा है। रूस अपनी तरह से आश्वस्त है। चीन अब उन्मुक्त होने के कगार पर है। पाकिस्तान तो मदमस्त हो ही चुका है और भारत कमोवेश सुस्त और पस्त है। वहीं हमारी पूरी दुनिया इक्कीसवीं शताब्दी के इस तीसरे दशक में कितनी भोली और मासूम हो गई है कि उसे इस बात का भान ही नहीं हो पाया कि उस देश के भीतर क्या चल रहा है। तालिबान एकाएक इतना ताकतवर और व्यापक प्रभाव व प्रन्मुत्ववान कैसे बन गया ? क्या कोई आसमानी शक्ति ने उन्हें यानी तालीबानियों को एकाएक महाबली बना दिया ? दुनिया के नामीगिरामी देश यह भविष्यवाणी करते रहे हैं कि काबुल के पतन में 30 से 90 दिनों का समय लग सकता है। परंतु वास्तव में उसके पतन में 30 घंटे से भी कम लगा। इस तथ्य पर गौर करिए। अमेरिका में सीआईए के अलावा करीब 15 अन्य गुप्तचर एजेंसियां हैं। रूस में 6, चीन में 4, ब्रिटेन में 4, फ्रांस में 6, पाकिस्तान में 4 इजराईल में 4, ऑस्ट्रेलिया में 5, ईरान में 16 और भारत में 6 सुसज्जित व आधुनिकतम उपकरणों से लैस महाकाय गुप्तचर एजेंसियां है। इन 70 एजेंसियों में से किसी को भी इस बात का आभास नहीं लग पाया कि तालिबान की सामरिक शक्ति कितनी है और उन्हें कहां-कहां से मदद मिल रही है।

अफगानिस्तान में जो कुछ घंटा उसे समझने के लिए लेबनानी विचारक जिब्रान की कहानी "शैतान" याद आ रही है। कहानी बहुत लंबी है। परंतु इसका लब्बलुआव यह है कि एक दयालू पादरी इस्मान एक गांव से दूसरे गांव जाकर धार्मिक उपदेश देते हैं। उनके उपदेशों को सोने चांदी से खरीदा जाता था। एक दिन जब वे एक जंगल से गुजर रहे थे, उन्हें एक बेहद गंभीर घायल व लहुलुहान व्यक्ति कराहते हुए मिला। वे सशंकित हुए और काफी विमर्श के बाद उन्होंने उससे पूछा "तुम कौन हो ?” घायल ने कहा "मैं शैतान हूँ।" पादरी ने उसकी मदद से इंकार कर दिया और कहा तू मनुष्यता का शत्रु है, आदि-आदि। शैतान बेहद रुचिकर जवाब देता है कि मुझ पर दया न करना चाहो, सहायता न करना चाहो, यह तुम्हारी मर्जी है। इसके बाद वह चेताता है, किन्तु तुम मेरे साये में ही जीवित रहते हो और फलते-फूलते हो। वह यहीं कहता है, "तुमने मेरे अस्तित्व को एक बहाना बनाया है और अपनी जीवन वृति के लिये एक अस्त्र और अपने कर्मों को न्यायोचित बताने के लिए तुम लोगों से मेरा नाम लेते फिरते हो।" वह बात को आगे बढ़ाते हुए पादरी से कहता है, "क्या तुम्हें पता नहीं कि यदि मेरा अंत हो गया तो तुम भी भूखे मर जाओगे ? यदि आज तुम मुझे मर जाने दोगे तो कल को तुम क्या करोगे ? अगर मेरा नाम ही दुनिया से मिट गया तो तुम्हारी जीविका का क्या होगा ?" यह दृष्टांत हमें समझा रहा है कि पिछले 20 वर्षों से अमेरिका के अघोषित शासन और उसके पहले के भी करीब 20 वर्ष अफगानिस्तान में ऐसे ही युद्ध में बीते हैं।

सन् 1978 में अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार और इस्लामी मुजाहिदीन के बीच का संघर्ष गृहयुद्ध में बदल गया। इसके एक वर्ष पश्चात तत्कालीन सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर सत्ता पर कम्युनिस्टों की पकड़ को बनाए रखने का प्रयास किया। सोवियत संघ व मुजाहिदीन के बीच सात वर्षों तक लगातार युद्ध चला और अंततः सन 1987 में सोवियत संघ की सेना अफगानियों से हारकर वापस लौट गई। इसके बाद सन् 1994 में तालिबान का शक्तिशाली होना प्रारंभ हो गया। गौरतलब है रूसी सेना के आक्रमण के पहले ही रुसी जनरल निकोलाई ओग्राकोव ने लियोनेड ब्रेजनेव व तत्कालीन रुसी सरकार को सलाह दी थी कि अफगानिस्तान पर आक्रमण न करें क्योंकि उस देश को जीता ही नहीं जा सकता।

रुसी सेना प्रमुख कोई हवाई बात नहीं कर रहे थे। वे जानते थे कि सन् 1842 ईस्वी में अफगानिस्तान ने ब्रिटिश सेना की वहां पर उपस्थिति को नेस्तनाबूत कर दिया था। स्थानीय लड़ाकों ने ब्रिटेन की शक्तिशाली फौज के पूरे के पूरे 21000 (इक्कीस हजार) सैनिकों को मार डाला था और एक सैनिक विलियम ब्रायडन को महज इसलिए जिन्दा छोड़ा कि वह वापस जाकर यहां की कहानी ब्रिटेन के सैन्य अधिकारियों को सुना सके। विलियम ईस्ट इंडिया कंपनी में सहायक शल्म चिकित्सक थे। वे सन् 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ में भी पदस्थ रहे। बहरहाल बात यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी अमेरिकी सेनाध्यक्षों ने सलाह दी थी वे जितना जल्दी हो सके इस स्थान से बाहर निकल आयें अन्यथा उन्हें वियतनाम की ही तरह बेइज्जत होकर वहां से निकलना पड़ सकता है। वैसे फ्रांस सन् 2014 में अपने को अफगानिस्तान से निकाल चुका है, बिना कुछ हासिल किए। इस तरह से अफगानिस्तान अब तक 4 महाशक्तियों ब्रिटेन, अमेरिका, रूस व फ्रांस से निपट चुका है। अब चीन की बारी है। चीन की चालाकी भी वहां बुरी तरह मात खाएगी।

अफगानिस्तान कभी कंधार कहलाता था और वह वृहत्तर भारत का हिस्सा था। आईने अकबरी के अनुसार यह काबुल प्रांत व्यापक सिंध क्षेत्र में लाहौर (पंजाब) व मुलतान जैसा ही एक प्रदेश था। कहने को तो यहां मुगलों का शासन था, परंतु यहां से उन्हें बहुत ही कम राजस्व मिल पाता था। इसलिए वे वहां पर राज करने को लेकर बहुत गंभीर भी नहीं थे। वहां मुगलों का शासन भी नादिर शाह के आक्रमण के साथ समाप्त हो गया। इस दौरान सिंध के अलावा तत्कालीन पश्चिमी पंजाब का कुछ हिस्सा भी नादिर शाह के सिपहसालार अहमद शाह अब्दाली ने अपने कब्जे में ले लिया। अब्दाली को आधुनिक अफगानिस्तान का संस्थापक माना जाता है। यह संभवतः सन् 1735 ई. की बात है, जब अफगानिस्तान का निर्माण हुआ। इसके पहले का 2500 का इतिहास बताता हैं कि भारत और ईरान हमेशा एकदूसरे की सीमाओं का सम्मान करते रहे थे। परंतु नादिर शाह ने इसे भारत से अलग कर दिया और भारतीयों से इस इलाके को भूल जाने को कहा। बात यहीं पर नहीं रुकी। अहमद शाह अब्दाली लगातार पंजाब और दिल्ली पर हमला करता रहा। इसे रोकने के लिए पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह ने फ्रांसीसियों, इटालियनों, ग्रीक, रूसी, जर्मन व आस्ट्रिया के सैनिकों की सहायता से एक दमदार सेना का निर्माण किया। उन्होंने सन् 1818 में मुलतान व 1819 ई. में कश्मीर को जीता। सन् 1820 में डेरा गाजी खान, सन् 1821 में डेरा इस्माइल खान, सन् 1819 ई. में काबुल और सन् 1834 में पेशावर को अपने राज्य में मिला लिया। यह जानना इसलिए भी जरुरी है कि महाराजा रंजीत सिंह ने कमोवेश नई अंतराष्ट्रीय सीमा रेखा रच दी थी। सोचिए उपरोक्त प्रांत यदि तत्कालीन भारत में नहीं मिलाए जाते, तो वर्तमान में पाकिस्तान का क्या स्वरूप होता बिना मुलतान और पेशावर का पाकिस्तान ?

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक पश्चिमी देशों के सामने अफगान लड़ाकों की वीरता एक दंत कथा के समान थी। उनके मन में विचार उठता था कि क्या अफगानी के होते हैं ? परंतु अफगानिस्तान की सरजमीन लड़ाकों की ही नहीं रही । जलालुद्दीन रूमी सरीखे महान सूफी भी हुए हैं। उनका जन्म सन् 1207 ई. में हुआ 3/4 यह देश भारत का ही हिस्सा था। रूमी कहते हैं, "बंद हो अगर दोस्त का दरवाजा तो वापस मत चले आना।" अफगानिस्तान का एक देश के रूप में बहुत संगठित हो पाना हमेशा से कठिन हो रहा है। अपनी कबीलाई पहचान से यहां लोगों को जबरदस्त मोह है। अफगानिस्तान में कुल 14 जातीय (नृजातीय या इथेनिक) समूह निवास करते हैं। इसमें से सर्वाधिक 40 से 42 प्रतिशत पश्तो हैं अपनी पहचान के प्रति इनका लगाव अफगान के राष्ट्रगान में भी सुनाई देता है। (वैसे पिछली एक शताब्दी में यहां पांच राष्ट्रगान बदल चुके हैं।) भारतीय राष्ट्रगान में हम प्रदेशों जैसे पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड उत्कल, बंग को याद करते हैं। वहीं अफगानिस्तान के राष्ट्रगान में सभी जातीय समूहों का जिक्र आता है।

संविधान का अनुच्छेद 20 स्पष्ट करता है कि अफगानिस्तान का राष्ट्रगान पश्तों में होगा और इसमें "ईश्वर है महान" के साथ ही साथ सभी जातीय समूहों का उल्लेख होगा। इसे कुछ इस तरह रचा गया है। "यह देश प्रत्येक जातीय समूह का है, यह बलोच और उज्बेक पश्तून और हजारा, तुर्कमानियों और ताजिकों की भूमि है। इनके साथ अरब और गुज्जर, पामिरी, नूरिस्तानी, ब्राहुइस और विझल्बाश है, साथ ही अमिक्स और पाशाई भी हैं। अतएव जिस राष्ट्र में जातीय पहचान को इतना महत्व दिया जाता हो इसे इतनी आसानी से समझ पाना और उस पर शासन कर पाना बेहद कठिन है।

इस लेख के पीछे मकसद यही है कि हम पश्चिमी देशों की गलत धारणा हिसाब से ही वर्तमान अफगानी समस्या को समझने के बजाए उसे इस देश के जातीय व सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुसार देखने की कोशिश करें। खलील जिब्रान की कहानी, शैतान के अंत में तमाम शास्त्रार्थ के पश्चात पादरी शैतान के उपचार को राजी हो गए। जिब्रान लिखते हैं, "उन घाटियों के बीच सन्नाटे से घिरे और अन्धकार के आवरण से सुशोभित पिता इस्मान अपने गांव की ओर चले जा रहे थे। उनकी कमर उनके ऊपर के बोझ से झुकी जा रही थी और उनकी काली पोशाक तथा लंबी दाढ़ी पर से बह रही थी, किन्तु उनके कदम सतत आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके होंठ मृतपाय शैतान के जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे।"

समझ रहे हैं कि कौन किसको और क्यों बचा रहा है। अफगानिस्तान की बदहाली और अराजकता आज वैश्विक अनिवार्यता क्यों बन गई हैं ?