रामनवमी: राम की ईश्वरीय मनुष्यता और वर्तमान समाज

राम को समझने और उनके मानवीय यथार्थ को जानने के लिए ‘‘रामनवमी’’ की प्रतीक्षा जरुरी नहीं है। राम तो नित्य नए अर्थों में हमारे सामने आते हैं। वे अयोध्या में जन्मे या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। परंतु जहां वह हुए वह ‘‘अयोध्या’’ बनी यह अधिक महत्वपूर्ण है। आज जब कुछ रुपयों के बदले दलबदल कर सरकारें बन या बिगड़ रहीं हैं, उसमें राम का चरित्र एक ऐसी चुनौती की तरह सामने आता है, जिससे आँख मिलाने का साहस शायद ही कोई राजनीतिज्ञ कर पाए। वहीं ‘‘भरत’’ की तो परंपरा ही जैसे समाप्त होती जा रही है

Updated: Apr 10, 2022, 09:08 AM IST

रामनवमी: राम की ईश्वरीय मनुष्यता और वर्तमान समाज

तुलसीदास कृत श्री रामचरित मानस की पहली चौपाई है:  गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन/नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।। तेहि करि बिमल बिबेक बिलोचन/बरनऊँ राम चरित भव मोचन।।

अर्थात श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुन्दर नयानमृत - अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार रूपी बंधन से छुड़ाने वाले श्री राम चरित्र का वर्णन करता हूँ।

मानस की पहली ही चौपाई साफ-साफ समझा देती है कि राम को किस नजर से देखना है। राम के चरित्र को समझने के लिए दो बेहद जरुरी तत्व हैं, पहला विवेकरूपी नेत्र और दूसरा है उन नेत्रों को निर्मल करना। यानी राम को प्रभु के रूप में देखें या एक चरित्र के रूप में.. उन्हें बेहद विवेकपूर्ण नजरिये से देखना होगा, स्वयं को बेहद निर्मल और पारदर्शी बनाते हुए। मानव इतिहास में कुछ दुलर्भतम है और उन्हें याद करें तो ‘‘अयोध्या’’ का नाम सामने आता है। अयोध्या यानी जहां युद्ध का अभाव हो। परंतु हमने आज अयोध्या को ही एक युद्धभूमि में परिवर्तित कर दिया।

 दुनिया के सबसे प्राचीन नगरों में से एक अयोध्या अब दुनिया का नवीनतम पर्यटन स्थल बनने जा रहा है। अयोध्या के इस भूलभूत बदलाव पर हममें से अधिकांश मौन हैं। हमें समझाया जा रहा है कि यह नगर अब रोज दीपावली मनाएगा, वैसे ही सजेगा जैसे राम के वनवास से लौटने पर सजा था। सोचिए क्या मनुष्य हमेशा समारोह या उत्सव में ही रहता है ? वह उत्सव इसलिए मनाता है कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ बदलाव हो। हर चीज को छूते ही सोना बन जाने वाले मंत्र को प्राप्त करने वाले का हश्र हम सब जानते हैं।

पिछले दिनों भोपाल में बच्चों पर हुए एक कार्यक्रम में हमारे समय के महत्वपूर्ण लेखक ध्रुव शुक्ल ने बेहद गंभीर बात को अत्यंत रोचक ढंग से सामने रखा। उन्होंने कहा कि ‘‘हम ऐसे समाज से आते हैं जो अपने भगवान को भी पालता है, पोसता है, उन्हें बड़ा करता है, उन्हें संस्कारित करता है।’’ यह सारे काम मनुष्य करता/करती है। ईश्वर का मनुष्यीकरण एक परिपक्व समाज में ही संभव है, जैसा कि भारतीय समाज रहा है। प्रभु राम यूँ तो ईश्वर का अवतार माने गए हैं, लेकिन उनके चरित्र चित्रण में यह ध्यान अवश्य रखा गया है कि वे ईश्वरीय सत्ता का न्यूनतम प्रदर्शन करें।

वाल्मीकि रामायण में वे अधिक मानव हैं, तो तुलसीदास के रामचरित मानस में थोड़े अधिक देव | कण्व की रामकथा उनका नया स्वरूप सामने लाती है। कबीर उन्हें एक अलग ही अंदाज से देखते हैं। तो महात्मा गांधी के राम उनके सर्वस्व हैं। लेकिन वे अधिक देवता नहीं हैं। डा. लोहिया के राम एक लोकनायक हैं, जननायक हैं, वे भारतीय समाज की अमूर्तता को मूर्तता प्रदान करते हैं। परंतु कमोवेश यह तो सभी सिद्ध करते हैं कि रामचन्द्र ने हमेषा मानवीय मूल्यों का सम्मान किया है। 

वे माता कैकई की इच्छा का आदर करते हैं। पिता दशरथ के वचनों का पालन करते हैं। उनके लिए कैकई उतनी ही पूज्य हैं, जितनी की कौशल्या। वे साधु समाज के कष्टों का निवारण संघर्ष के माध्यम से करते हैं, मित्रों के कष्टों को अपना कष्ट समझते हैं, पत्नी का वियोग सहते हैं और अपने भाइयों से अगाध प्रेम करते हैं। उनकी उपस्थिति को अपनी ताकत मानते हैं। वे शत्रुओं के प्रति क्षमा का भाव रखते हैं। वे यदा-कदा ही चमत्कारिक शक्तियों का प्रयोग करते हैं। वे तमाम अपमान सहते हैं। लगातार परिक्षाएं देते रहते हैं। अपनी निष्ठा का प्रमाण देते हैं। परंतु कभी भी अत्यधिक क्रोधित नहीं होते या रौद्र रूप धारण नहीं करते, जैसा कि आजकल के उनके पोस्टर आदि हमें बताते हैं। वे अपने पिता की नजरों में अपना स्थान बनाते हैं, अपने गुणों और विनयशीलता से उनकी निगाह में स्वयं को विकसित करते हैं। 

तभी तो राजा दशरथ (अयोध्या कांड में) कहते हैं,

कहई बुभुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीम जनु-तनु धरि सोही।।

बिप्र सहित परिवार गोसाई। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।

(राजा दशरथ कह रहे हैं, हे मुनिराज सुनिये। श्री रामचन्द्र अब सब प्रकार से योग्य हो गये हैं,। सेवक मंत्री, सब नगरवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं, सभी को रामचंद्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं।)

रामचन्द्र की उस विराटता की कल्पना कीजिए जिसमें दशरथ बता रहे हैं कि राम उनके दुश्मनों को भी प्रिय हैं। इस तरह की मानवोचित दुर्लभता ही राम के चरित्र की विशेषता भी है। परंतु राम को राम तो और बहुत सारे लोग बनाते हैं। अब भरत को ही लीजिए। भरत राम के वनवास की अवधि में बिना विचलित हुए, बिना लालच में पड़े, अयोध्या का राजपाट संभाल रहे हैं। इतिहास या लेखकों ने इस अतिमानवीय चरित्र के साथ उतना न्याय नहीं किया जितना इनके साथ होना चाहिए था। हम कभी इस बात पर ज्यादा विचार नहीं करते कि राम के बिना अयोध्या का शासन कैसे चला होगा। भरत ने किस तरह अपने ग्लानि भाव पर विजय पाई होगी। बारह वर्षों तक निर्विकार भाव से राज संभालकर राम के सुपुर्द करने की समयावधि में उनकी मानसिक वेदना क्या रही होगी। वे अयोध्यावासियों की नजरों में खलनायक तो नहीं बने ? परंतु जब हम किसी एक मूर्ति के आसपास स्वयं को केंद्रित कर लेते हैं, तो जीवन की विविधताओं की अनदेखी कर दते हैं।

महात्मा गांधी कहते है, ‘‘हिन्दुस्तान उन सभी का है, जो यहां पैदा हुए हैं, यहीं पले हैं और जो किसी अन्य देश को अपना देश नहीं मानते। इसलिए यह जितना हिंदुओं का है, उतना ही पारसियों का या यहूदियों का, या भारतीय ईसाइयों का, या मुसलमानों का और अन्य अ-हिंदुओं का। स्वतंत्र भारत में हिंदू-राज नहीं भारतीय राज होगा। जिसका आधार, किसी धार्मिक मत या संप्रदाय का बहुसंख्यक होना नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष रूप से संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व होगा। मेरी कल्पना के अनुसार कई संप्रदाय वाले मिलजुल कर हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दे सकते हैं।" 

हजारों- हजार वर्षों से अयोध्या अपना विस्तार कर पूरे भारत को अयोध्या यानी विवाद रहित देश के रूप में विकसित होने का संदेश ही तो संप्रेषित कर रही थी। भारत में राम जय-जय सियाराम रहे हैं, सीताराम रहे हैं, जै राम जी की रहे हैं, वे रघुनंदन रहे हैं, वे दशरथ पुत्र रहे हैं, वे कौशल्या नंदन रहे हैं, वे हमारे सबके राम हैं। वे सुग्रीव के भी राम हैं और हनुमान के भी। परंतु वे कभी भी श्रीराम और वह भी क्रोधित श्रीराम तो नहीं रहे। यह तो अकल्पनीय है कि जो गांधी मरते वक्त भी ‘‘हे-राम’’ कह गया हो, उसकी हत्या के पैरोकार जब जेल से छूटकर इंदौर हवाई अड्डे पर उतरते हैं तो उनके समर्थन में भयानक अट्टाहास के साथ ‘‘जय श्रीराम’’ का घोष होता है। 

फिर राम के मनुष्य होने पर लौटते हैं। कभी मनुष्यता को नए सिरे से जानना समझना चाहते हों, कि क्यों इस सृष्टि का प्रत्येक प्राणी स्नेह का पात्र है, तो रामचरित मानस का अरण्यकांड जरुर पढ़िये। राम एक मनुष्य के नाते कितने और क्यों विचलित हैं यह समझ में आएगा। साथ ही गांधी जैसी महान आत्मा किस तरह प्रत्येक प्राणी मात्र में सबकुछ देखती- समेटती है, वह भी जानने की प्रक्रिया भी शुरू होगी। गौर करिए सीता की खोज में राम भटक रहे हैं। एक स्थान पर वे कहते हैं,

लछिमन देखु बिपिन कई सोभा। देखत केहिकर मन नहीं छोभा।।

नारि सहित सब खग मृग बृंदा/मानहुँ मोरि करत दृहिं निंदा।।

‘‘हे लक्ष्मण ! जरा वन की शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओं के समूह सभी स्त्री सहित हैं। मानो वे मेरी निंदा कर रहे हैं।’’

राम के चरित्र की इस अनूठता को देखिए। वे अपने एकाकीपन को पशु पक्षियों के माध्यम से परिभाषित कर रहे हैं उसकी व्याख्या करते हैं। अगले ही क्षण वे लक्ष्मण से कहते हैं, "उन्हें देखकर हाथी, हथिनियों को साथ लगा देते हैं। वे मानों मुझे शिक्षा देते हैं कि (स्त्री कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिए) भली भांति चिन्तन किए हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिए। इतना ही नहीं अच्छी तरह सेवा किए हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिए।’’ बहुत स्पष्ट निर्देश है कि समय के साथ संदर्भ भी बदलते हैं और कई बार अर्थ भी। 

राम को समझने और उनके मानवीय यथार्थ को जानने के लिए ‘‘रामनवमी’’ की प्रतीक्षा जरुरी नहीं है। राम तो नित्य नए अर्थों में हमारे सामने आते हैं। वे अयोध्या में जन्मे या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। परंतु जहां वह हुए वह ‘‘अयोध्या’’ बनी यह अधिक महत्वपूर्ण है। आज जब कुछ रुपयों के बदले दलबदल कर सरकारें बन या बिगड़ रहीं हैं, उसमें राम का चरित्र एक ऐसी चुनौती की तरह सामने आता है, जिससे आँख मिलाने का साहस शायद ही कोई राजनीतिज्ञ कर पाए। वहीं ‘‘भरत’’ की तो परंपरा ही जैसे समाप्त होती जा रही है। 

भरत यानी विश्वास, भरत यानी श्रद्धा, भरत यानी मोह का त्याग, भरत यानी राज्य के ऊपर अपना निज समर्पित कर देना। वहीँ लक्ष्मण यानी अपलक अपने आप को दूसरे की सेवा में प्रस्तुत रखना। बिना दिन रात की परवाह किए। शत्रुघ्न यानी वीतरागी होने के बावजूद स्वयं को कर्म से जोड़े रखना। हनुमान यानी सेवा का अप्रतिम प्रतीक बन जाना। परंतु यह सब मंदिर के बाहर की दुनिया में संभव है। मंदिर चाहे जितना भव्य हो लेकिन उसमें श्रद्धा का भाव तो मनुष्यता से आता है। अंधेरी रातों में जब आदिवासी जंगल पार करते हैं, तो अपने हाथ में एक छोटा कंकड़ ले लेते हैं, वह उनमें विश्वास भर देता है। जब वे जंगल पार कर लेते हैं तो एक निश्चित स्थान पर उस कंकड़ को फेंक देते हैं। अपने अनाम देवता और रास्ता व संकट से पार करने वाले उस कंकड़ दोनों को प्रणाम करते हैं और अपने रास्ते चले जाते हैं। यानी विश्वास तो श्रद्धा से उपजता है। 

याद रखिए राम का धनुष पर बाण चढ़ाना उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति है, क्रोध की नहीं। वे कभी भी संहार के लिए हथियार नहीं उठाते, हमेशा कुछ सहेजने, बचाने के लिए धनुष उठाते हैं। शुरुआत हमने मानस की पहली चौपाई से की थी। अंत में ग्रंथ के अंतिम दो दोहों पर गौर करिए,

मो सम दीन न दीन तुम समान रघुवीर

अस बिचारी रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।

कामिहि नारि पिआरी जिमि लोभिही प्रिय जिनि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।

सोचिए एक महाकाव्य लिखने बाद अंतिम पंक्तियों में तुलसीदास कह रहे हैं, ‘‘जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है, और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथ जी ! हे राम जी ! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये।

तुलसीदास अपने आराध्य को याद रखने के लिए जिन उपमाओं को उद्धत कर रहे हैं वे अमूनन तिरस्कार के योग्य मानी जाती हैं। परंतु गोसांईजी तो उनसे स्वयं को व्याख्याचित कर रहे हैं। ठीक इसी नजरिए से राम को देखने की जरुरत है। हमारा नजरिया मानवीय हो। याद रखिए दुर्जन हमेशा से थे और हमेशा ही रहेंगे। अयोध्या भी हमेशा से रही है और हमेशा अयोध्या बनी रहनी चाहिए। तभी तो राम के लौटने की संभावना बनी रहेगी।