जी भाईसाहब जी: सम्मान के लिए कांग्रेस छोड़ी, न टिकट मिला, न पद

MP Politics: बीजेपी हाईकमान तो चौंकाने वाले निर्णय ले कर नई लीडरशीप खड़ी कर रहा है। मगर इस कारण कुछ नेताओं की राजनीति पर ही संकट खड़ा हो गया है। वे नेता जो कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में गए थे, उन्हें न टिकट मिला न ही पद। ये नेता पार्टी में सम्मान के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं।

Updated: Jun 09, 2026, 04:13 PM IST

मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। तीसरा उम्मीदवार उतार कर बीजेपी ने कांग्रेस में तोड़फोड़ के इरादे जाहिर कर दिए हैं। बीजेपी से राज्यसभा टिकट के दावेदारों में कांग्रेस से गए नेता सुरेश पचौरी भी शामिल थे। राजनीतिक समीकरणों का गुणा भाग करते हुए कहा गया ब्राह्मण वोट को देखते हुए पूर्व मंत्री सुरेश पचौरी का दावा मजबूत है। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से पचौरी की मुलाकातों को इसी दृष्टि से देखा जा रहा था। फिर जब पार्टी ने टिकट घोषित किए तो नाम जितने चौंकाने वाले थे उतने ही टिकट दावेदारों को सदमा देने वाले थे।

यह सदमा भी सुरेश पचौरी जैसे नेताओं को ज्यादा है क्योंकि इस तरह एक रास्ता और बंद हुआ। रास्तों के बंद होने से राजनीतिक पुनर्वास की संभावना भी और क्षीण हो गई हैं। यही हाल उन सभी नेताओं का है जो कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में गए हैं। खासकर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ गए नेता अलग अलग मुश्किल से घिरे हुए हैं। 2020 में कांग्रेस छोड़ कर गए जो नेता चुनाव जीत गए वे तो किसी तरह अपना अस्तित्व बचाये हुए हैं मगर चुनाव हारने वाले नेता पद तो दूर बीजेपी में सम्मान पाने के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं।

इन नेताओं की मुश्किल यह है कि टिकट वितरण हो या पद देने की बात, बीजेपी हाईकमान नई नई इबारतें गढ़ता है। इस प्रयोग की वजह से बीजेपी के ही वरिष्ठ नेताओं के लिए जगह सीमित होती जा रही है तो कांग्रेस से गए नेताओं की सुध कौन ले?

जिसे पार्टी से निकाला था अब क्यों थमाया टिकट?

राज्यसभा भेजने के लिए बीजेपी ने जितना रजनीश अग्रवाल का चयन कर नहीं चौंकाया उससे ज्यादा महेश केवट को टिकट दे कर हैरत में डाला है। तय वोट संख्या के अनुसार 2 सीट बीजेपी के हिस्से में जानी है और 1 सीट कांग्रेस को मिलनी है। बीजेपी ने दो सीट के लिए युवा जमीनी नेता रजनीश अग्रवाल और अमृतसर से नेता तरुण चुघ को चुना। तीसरी सीट के लिए कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा है।

कांग्रेस प्रत्याशी का एलान होते ही बीजेपी ने महेश केवट को टिकट देकर कांग्रेस की आसान जीत को मुश्किल बना दिया। चर्चा का विषय यह है कि तीसरे टिकट के लिए भी पार्टी ने दावेदार नेता को नहीं चुना बल्कि उस नेता को चुना जिसे पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बाहर निकाला था।समीकरण देखें तो राज्यसभा के लिए तीसरे प्रत्याशी का दांव बीजेपी को राजनीतिक गणित के हिसाब से उल्टा भी पड़ सकता है। बेशक महेश केवट को जिताने के लिए एमपी बीजेपी को खूब मेहनत करनी होगी। यह लगभग असंभव सी चुनौती है। मगर वोट के गणित से देखें तो महेश केवट को राज्यसभा की तीसरी सीट पर उतारने का फैसला रणनीतिक चतुराई है। यदि वे चुनाव नहीं भी जीतते हैं, तब भी निषाद केवट समाज को एक बड़ा राजनीतिक संदेश जाएगा। मध्य प्रदेश और उससे सटे उत्तरप्रदेश में इस समुदाय का अच्छा-खासा प्रभाव है।

पहले उन्हें मध्य प्रदेश राज्य मछुआ कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया फिर राज्यसभा सीट के लिए उम्मीदवार बनाया। राज्यसभा का टिकट मिलने से महेश केवट का राजनीतिक कद बढ़ेगा और समुदाय में उनकी स्वीकार्यता भी मजबूत होगी। इसका लाभ भविष्य में भाजपा को मिल सकता है। बीजेपी नेताओं ने इस नामांकन को भगवान राम और केवट के सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ना शुरू कर दिया है। यह राजनीतिक संदेश खुल कर जनता तक पहुंचाया जा रहा है। 2027 के उत्तर प्रदेश के चुनाव और मछुआ वोट ही वह वजह है कि दूसरे सारे नेताओं को किनारे कर महेश केवट को टिकट दिया गया।

पुलिस को डराया मगर भारी पड़ गया संघ

इंदौर के उषा नगर में हुई मारपीट और पथराव की घटना ने एक बार फिर शहर की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मगर यह मामला केवल आपसी रंजिश का ही नहीं है। बीजेपी के दो गुटों के आपस में टकराव या प्रशासन से उलझना आम बात है। ताजा मामला संघ और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच का है। जनवरी 2025 में भी जब दिनदहाड़े पार्षद के परिवार और बच्चे के साथ बदसलूकी की गई तब दोनों गुट बीजेपी के थे। इस बार अन्नपूर्णा क्षेत्र में कुत्तों को खाना डालने को लेकर आरएसएस और बीजेपी के कार्यकर्ता आमने-सामने हो गए। विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट और तोड़फोड़ हो गई।

पुलिस ने आरएसएस कार्यकर्ता की शिकायत पर बीजेपी नेता वीरेंद्र शेड्गे, बीजेपी विधायक मालिनी गौड़ के पीए प्रणव चित्तौड़ा सहित 7 लोगों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का प्रकरण दर्ज किया है। जबकि बीजेपी नेता के आवेदन पर भी संघ के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया गया बल्कि पुलिस द्वारा कहा गया कि जांच की जा रही है। इस विवाद के बाद बीजेपी नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा ने बीजेपी नेता वीरेंद्र शेड्गे को पद से मुक्त कर कर दिया है। वीरेंद्र शेडगे वही नेता है जिन्होंने एक महीना पहले ट्रैफिक पुलिस से विवाद के बाद महू नाका चौराहे पर जमकर हंगामा किया था। इसके बाद कई पुलिसकर्मी सस्पेंड कर दिए गये थे। मगर इस बार वे भूल गए कि जब संघ सामने हो तो बीजेपी नेता की नहीं चलती है।

डॉ. नरोत्तम मिश्रा कब तक करें विश्राम

मध्यप्रदेश में कोई चुनाव हो या संगठन की गतिविधियां डॉ. नरोत्तम मिश्रा का जिक्र जरूर होता है। कभी बीजेपी सरकार के संकट मोचक मंत्री कहे जाने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा दतिया विधानसभा चुनाव क्या हारे उनके तारे गर्दिश में चले गए। उसके बाद समर्थकों ने बेसब्री से उनके पुनर्वास के सपने बुने लेकिन यह इंतज़ार खत्म ही नहीं हो रहा है।

इस बार भी राज्य सभा की तीसरी सीट जीतना लक्ष्य है तब नरोत्तम के मैनेजमेंट को याद किया जाना स्वाभाविक है। इस बार भी नरोतम खूब याद आ रहे हैं मगर किस्मत ऐसी कि भाग्य दरवाजे पर आ कर ठिठक जाता है। मध्य प्रदेश भाजपा संगठन प्रभारी महेंद्र सिंह जैसे बीजेपी के राष्ट्रीय नेता, पदाधिकारी सब मिलते जरूर है मगर पद मिलने की खबर कोई नहीं लाता। कोर्ट के फैसले के बाद उपचुनाव से उम्मीद जागी मगर कब तक चुनाव आयोग ने उपचुनाव की घोषणा नहीं की है। जाहिर है, चुनाव की तैयारी है मगर सवाल है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा का इंतजार कब पूरा होगा।