आज़ादी का अमृत महोत्सव और 9 अगस्त की प्रासंगिकता, मूल्यों से भटकता राष्ट्रीय नेतृत्व

वर्तमान समय में जब हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तब हमारे सामने आजादी के सिकुड़ते हुए मायने दृष्टिगोचर होते दिखाई दे रहे हैं। आजादी के करीब 5 साल पहले देश एक मिली जुली सरकार की बात कर रहा था और आज जो दल शासन कर रहा है, वह कमोवेश भारत को एकदलीय शासन की ओर ले जाने हेतु प्रवृत है। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष तो इसकी सार्वजनिक घोषणा भी कर चुके हैं। आज राजनीतिक दलों को सार्वजनिक प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है और तमाम असहमत महीनों-वर्षों से बिना सजा के जेल में हैं और आजादी का अमृत महोत्सव भी उन्हें जकड़न और कारावास की बेड़ियों से मुक्ति नहीं दिला पा रहा..

Updated: Aug 07, 2022, 02:03 PM IST

आज़ादी का अमृत महोत्सव और 9 अगस्त की प्रासंगिकता, मूल्यों से भटकता राष्ट्रीय नेतृत्व
photo courtesy: DD

अगस्त 1942 की 3 तारीख को गांधी जी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंबई (मुंबई) पहुंचे थे। 4 व 5 अगस्त को कार्यसमिति की बैठक में गांधी जी पूरे समय उपस्थित रहे। 6 अगस्त को उन्होंने प्रेस से बातचीत की और कांग्रेस के उस प्रस्ताव जिसमें अंग्रेजों से ‘‘भारत छोड़ो और संघर्ष के आरंभ’’ के बारे में वायसराय को पत्र लिखने की अपनी इच्छा का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि यह कोई अंतिम चेतावनी नहीं बल्कि टकराव से बचने की एक ईमानदार प्रार्थना होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि एक ऐसे समय जबकि मैं अपने जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष प्रारंभ करने वाला हूँ, मेरे दिल में अंग्रेजों के लिए कोई घृणा या द्वेष नहीं है। इसके बाद 7 अगस्त की दोपहर को मध्य बंबई के गोवालिया टेंक मैदान में उन्होंने कांग्रेसजनों से शांति व अहिंसा की अपील की और कहा कि जापान से सहानुभूति जताने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जापान की बढ़त का अर्थ है चीन और एक हद तक रूस का नष्ट होना।

गौर करिए इसके बाद 8 अगस्त की कांग्रेस समिति की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि ब्रिटेन भारत में अपना शासन तुरंत समाप्त करे। एक बार स्वतंत्र हो जाने के बाद भारत आतंरिक सहयोगियों का सहयोगी हो जाएगा और वे स्वतंत्रता के अपने साझा संघर्ष को आत्मसात करेंगे। इस प्रस्ताव में एक अंतरिम सरकार की बात की गई थी, जिसमें कांग्रेस का बाहुल्य नहीं होगा बल्कि यह एक मिलीजुली सरकार होगी जिसमें भारत के सभी महत्वपूर्ण वर्गों के प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व होगा। यह प्रस्ताव यहीं समाप्त नहीं होता। इसमें आगे कहा गया, भारत की स्वतंत्रता उन सभी एशियाई देशों के लिए स्वतंत्रता का प्रतीक होगी जो पराधीन हैं। फ्रांसीसी, डच और अंग्रेज स्वयं को अपने इन उपनिवेशों से हटा लें और उन्हें यह भी स्पष्ट तौर पर समझ लेना होगा कि जो देश अभी जापान के नियंत्रण में हैं वे बाद में किसी अन्य औपनिवेशिक ताकत के शासन या नियंत्रण में न चले जाएं।’’

यह व्यापक प्रस्ताव या दस्तावेज एक विश्व धरोहर है, जो बता रहा है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य क्या थे और इस संघर्ष की सोच का दायरा कितना व्यापक था। यह अकेले भारत का संघर्ष नहीं था। यह पूरी दुनिया, पूरी मानवता की मुक्ति का संघर्ष था। इसलिए हमें इस 9 अगस्त को सोचना होगा कि स्वाधीनता संघर्ष के हमारे मूल्य क्या आज गलत दिशा की ओर मुड़ चुके हैं? 8 अगस्त को बापू ने बहुत विस्तृत संबोधन दिया था। अपने उद्बोधन के बाद उन्होंने पटेल और महादेव देसाई से कहा, ‘‘अब मेरी समझ में आया कि कल रात मैं ठीक से क्यों सो नहीं पाया। मेरे दिमाग में इतना कुछ था कि मैं जान ही नहीं पा रहा था कि मैं वह सब अभिव्यक्त कर भी पाऊंगा या नहीं। मैंने वस्तुतः देश से वह सब कह दिया जो मैं कहना चाहता था।’’ गांधी जानते थे कि यह संभवतः उनके राजनीतिक जीवन की अंतिम बड़ी लड़ाई है। अंततः ‘‘भारत छोड़ो’’ प्रस्ताव पारित हो गया।

भारत छोड़ो आंदोलन के पीछे के इतिहास की इतनी विस्तृत विवेचना के पीछे वजह यह है कि वर्तमान समय में जब हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तब हमारे सामने आजादी के सिकुड़ते हुए मायने दृष्टिगोचर होते दिखाई दे रहे हैं। आजादी के करीब 5 साल पहले देश एक मिली जुली सरकार की बात कर रहा था और आज जो दल शासन कर रहा है, वह कमोवेश भारत को एकदलीय शासन की ओर ले जाने हेतु प्रवृत है। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष तो इसकी सार्वजनिक घोषणा भी कर चुके हैं। आज राजनीतिक दलों को सार्वजनिक प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है और तमाम असहमत महीनों-वर्षों से बिना सजा के जेल में हैं और आजादी का अमृत महोत्सव भी उन्हें जकड़न और कारावास की बेड़ियों से मुक्ति नहीं दिला पा रहा। भारत की वर्तमान स्थिति के लिए एक अन्य बात जो बेहद महत्वपूर्ण है, वह है, पूंजी का बहुत थोड़े से लोगों/निगमों के पास केंद्रित हो जाना। पूंजी पर एकाधिकार अंततः राजनीतिक व्यवस्था को भी एकाधिकारी और अधिनायकवादी बना देता है।

प्रमुख अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज जो कि मनरेगा में कार्य कर रहे मजदूरों की बकाया मजदूरी के संघर्ष हेतु दिल्ली आए थे, का कहना है। “आप जानते हैं कि इस देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। आप जानते हैं कि देश के सबसे अमीर आदमी गौतम अडानी हैं, वे हमारे प्रधानमंत्री के खास दोस्त भी हैं। मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ, उनकी संपत्ति करीब 10 लाख करोड़ रु. है। यदि 100 मजदूर 400 रु. प्रतिदिन के हिसाब से वर्षभर में 250 दिन काम करेंगे तो वे एक साल में 1 करोड़ रु. कमा पाएंगे। यानी 100 मजदूरों को अडानी तक पहुंचने में करीब 10 लाख साल (दस लाख साल) लगेंगे।’’ परंतु समस्या यह है कि हममें से अधिकांश ने इस तरह से विश्लेषण करना ही छोड़ दिया है। डा. लोहिया ने कहा था (आजादी के बाद) कि एक दिन भारत के लोग अपने ही देश में उपनिवेश बन जाएंगे। ऐसा वे इस आधार पर कह रहे थे क्योंकि जब देश को गुलाम बनाने की प्रक्रिया खत्म हो जाएगी तो देश अपने ही नागरिकों को गुलाम बनाने की प्रक्रिया में जुट जाएंगे। उन्होंने इसमें चीन को जोड़ा था | आज चीन की स्थिति भी कुछ बहुत अच्छी नहीं है। जिस तरह मीडिया व अन्य संवेधानिक संस्थाएं एकपक्षीय हो रहीं हैं, वह हमारी आजादी के मूल्यों से मेल नहीं खातीं।

गौरतलब है जब ‘‘भारत छोड़ो’’ प्रस्ताव पारित हुआ तब तक विभाजन का ज्वर इतना तीव्र नहीं चढ़ा था। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं। क्या भारत-पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के राजनीतिज्ञों को यह नहीं सोचना था कि वे आजादी के 75वें वर्ष में उपमहाद्वीप में अपनी स्वतंत्रता का कोई साझा समारोह मनाएं ? बड़ा देश होने के नाते भारत को पहल तो करनी ही चाहिए थी, भले ही वह असफल हो जाती। परंतु आज तो भारत के भीतर ही कोई साझा कार्यक्रम नहीं हो रहा है। आपसी वैमनस्य जिसमें राजनीतिक वैमनस्य भी शामिल है, चरम पर है। इसलिए 8 अगस्त 1942 को पारित भारत छोड़ो प्रस्ताव की विस्तृत विवेचना होनी चाहिए और स्वतंत्रता की सीमित परिभाषा को नई तरह से समझा जाना चाहिए।

भारत में बढ़ती मंहगाई बेरोजगारी और असुरक्षा को लेकर राजनीतिज्ञों में परस्पर विरोधी मत सामने आ रहे हैं। यह आश्चर्य का विषय है कि सत्तापक्ष कमोवेश देश में मँहगाई होने की बात को ही सिरे से नकार रहा है। यदि थोड़ा बहुत मानता भी है तो कहता है कि यह अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का प्रतिफल है। गौरतलब है कुछ महीनों पहले ही वर्तमान प्रधानमंत्री ने देश के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरु का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि पंडित नेहरु ने अपने समय बढ़ रही महंगाई के लिए कोरिया युद्ध को दोषी ठहराया था? तो फिर आज रुस-युक्रेन युद्ध को भारत में मंहगाई के लिए किस आधार पर जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। मंहगाई व बेरोजगारी की वजह से देश में कमोवेश हाहाकार की स्थिति बनती जा रही है। दूसरी ओर सांप्रदायिकता की आंधी सबकुछ उड़ा ले जाने को बेचैन है। गांधी का खादी का झंडा अब आयातित या मिल में बने पोलियस्टर में बदल दिया गया है। ऐसा जताया जा रहा है, जैसे झंडा फहरा दिए जाने से भारत की सभी समस्याओं का निपटारा हो जाएगा। ऐसा तभी संभव था, जबकि भारतीय संविधान सभा द्वारा तिरंगे और अशोक चक्र को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाये जाने के पीछे के पूरे दर्शन और भावना को ठीक तरह से संप्रेषित किया जाता। याद रखिए केसरिया कभी भगवा नहीं हो सकता।

फैज अहमद ‘‘फैज’’ की एक लंबी नज्म इन्तिसाब (समर्पण) की कुछ पंक्तियां हैं, ‘‘आज के नाम/और/आज के गम के नाम/आज का गम के: है जिन्दगी के भरे गुलसितां से खफा/जर्द पत्तों का बन/जो मेरा देस है।’’ ये देश सूखे पीले पत्ते की मानिंद हो रहा है | उस पर हरियाली कैसे आए? यह हम सबकी चिंता का विषय होना चाहिए। यह भी लगातार कहा जाता है कि इतनी नकारात्मकता ठीक नहीं। देश में बहुत कुछ सकारात्मक भी तो हुआ है। विकास भी तो हुआ है। परंतु देश सड़क, बिजली या कारखानों से ज्यादा अपने निवासियों से बनता है, उनके आपसी मेल मिलाप से बनता है, हर हाथ को काम मिलने और हर मुंह को निवाला मिलने से बनता है, हर एक को शिक्षा मिलने से और हर एक को इलाज मिलने से बनता है, स्त्री पुरुष बराबरी से बनता है, सामाजिक न्याय से बनता है, सबको कानूनी न्याय मिलने से बनता है। गौरतलब है हमारा संविधान ऐसी हर बात को बेहद स्पष्टता से रखता है जिसमें प्रत्येक नागरिक को एक न्यायपूर्ण व्यवस्था में भागीदारी मिल सके। परंतु संविधान को पढ़ना तो दूर अब कोई उलटना-पलटना भी नहीं चाहता | इसकी खास वजह यह है कि इतनी हिम्मत ही नहीं बची है कि संविधान से आँख मिला सकें।

बात गांधी से शुरु की थी। खत्म भी उन्हीं से, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरु के शब्दों मेन | ‘‘और फिर गांधी आए जैसे जलप्रपात से गिरती ताकतवर पानी की धारा हो, जिससे हम निर्भय होकर श्वांस लेने लगे। जैसे एक जबरदस्त रोशनी हो, ऐसी रोशनी जिसने अंधकार को शिकस्त दी हो, एक तूफान जो सब कुछ तितरबितर कर देता है, गांधी किसी भी स्थिति में समझौता न करने की इच्छा शक्ति के प्रतीक हैं।’’ गांधी को दोहराने का यानी निर्भय होने का समय पुनः आ गया है। जारी....

(एक स्वतंत्र लेखक के बतौर चिन्मय मिश्र के ये निजी विचार हैं)