सिगरेट नहीं पीते फिर भी खतरे में हैं आप, भारत में पैसिव स्मोकिंग से हर साल 3.25 लाख मौतें

भारत में सेकंड हैंड स्मोक से हर साल 3.25 लाख लोगों की मौत हो रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पैसिव स्मोकिंग जानलेवा है और सार्वजनिक स्थानों को धूम्रपान मुक्त बनाना बेहद जरूरी है।

Updated: Oct 06, 2026, 07:13 PM IST

दूसरों के सिगरेट के धुएं से बचना भी उतना ही जरूरी है जितना खुद धूम्रपान से दूर रहना। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 3.25 लाख लोगों की मौत सेकंड हैंड स्मोक यानी दूसरों के तंबाकू के धुएं के संपर्क में आने से हो रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सार्वजनिक स्थानों को पूरी तरह धूम्रपान मुक्त बनाने के लिए मौजूदा प्रयासों को और सख्त करने की जरूरत है।

टोबैको फ्री इंडिया की ओर से आयोजित एक वेबिनार में देश के वरिष्ठ डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पैसिव स्मोकिंग से जुड़े आंकड़ों और इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की। विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान करने वाला व्यक्ति ही नहीं बल्कि उसके आसपास मौजूद लोग भी जहरीले धुएं के कारण गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का सामना करते हैं।

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नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वी.के. पॉल ने द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि भारत में पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में आने वाली आबादी का अनुपात 1990 के करीब 43 प्रतिशत से घटकर अब लगभग 31 प्रतिशत रह गया है। हालांकि, आबादी बढ़ने के कारण प्रभावित लोगों की कुल संख्या अभी भी करीब 44.4 करोड़ है।

देश में सेकंड हैंड स्मोक से होने वाली करीब 3.25 लाख वार्षिक मौतों में लगभग 1.5 लाख महिलाएं और 1.75 लाख पुरुष शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत सेकंड हैंड स्मोक के संपर्क से होने का अनुमान है। डॉ. पॉल के मुताबिक, केवल अलग-अलग स्मोकिंग जोन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। सार्वजनिक स्थानों को पूरी तरह धुएं से मुक्त करने के साथ-साथ चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल पर भी प्रभावी रोक जरूरी है।

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एम्स नई दिल्ली के रूमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. उमा कुमार ने महिलाओं और बच्चों पर पैसिव स्मोकिंग के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि घर, कार्यस्थल या यात्रा के दौरान कई बार लोगों के पास यह विकल्प नहीं होता कि वे धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से दूरी बना सकें। इस तरह वे खुद धूम्रपान न करने के बावजूद लगातार तंबाकू के धुएं के संपर्क में आते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक ऐसा संपर्क स्वास्थ्य पर गंभीर और स्थायी असर डाल सकता है।

पद्मभूषण से सम्मानित वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. के.के. तलवार ने कहा कि तंबाकू पर टैक्स बढ़ाना और लोगों को इसके नुकसान के प्रति जागरूक करना जरूरी है लेकिन इसके साथ सार्वजनिक जगहों को पूरी तरह धुआं-मुक्त बनाना भी अहम है। उनके मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति खुद सिगरेट नहीं पीता लेकिन उसके आसपास कोई लगातार धूम्रपान करता है तो उसके शरीर पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। पैसिव स्मोकिंग से हृदय और रक्त वाहिकाओं को होने वाला नुकसान भी चिंता का बड़ा कारण है।

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आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक डॉ. वी.एम. कटोच ने कहा कि सेकंड हैंड स्मोक का प्रभाव केवल फेफड़ों या सांस की नली तक सीमित नहीं रहता। तंबाकू के धुएं में मौजूद हानिकारक तत्व शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन जैसे स्थानों पर भी लोग अनजाने में धुएं के संपर्क में आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, घर और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान को पूरी तरह रोकने की दिशा में प्रभावी कदम उठाना ही उन लोगों को बचाने का रास्ता है जो खुद तंबाकू का सेवन नहीं करते।