Sri Lanka: छोटा भाई राष्ट्रपति अब बड़ा भाई चुना गया प्रधानमंत्री

Sri Lanka People's Party: महिंदा राजपक्षे की बड़ी जीत, आलोचकों को दोनों भाइयों से डर, संविधान बदलकर अपनी वंशवाद को दे सकते हैं विस्तार

Updated: Aug-08, 2020, 10:14 PM IST

Sri Lanka: छोटा भाई राष्ट्रपति अब बड़ा भाई चुना गया प्रधानमंत्री
Pic: Swaraj Express

महिंदा राजपक्षे नौ अगस्त को श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे। उनकी पार्टी श्रीलंका पीपल्स पार्टी (एसएलपीपी) ने आम चुनाव में सात अगस्त को भारी अंतर से जीत दर्ज की। इस जीत को महिंदा राजपक्षे की राजनीति में वापसी के तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे पहले यह चुनाव दो बार स्थगित हुए थे। चुनाव आयोग द्वारा जारी अंतिम परिणामों के अनुसार 225 सदस्यीय संसद में एसएलपीपी ने अकेले 145 सीटें जीती और सहयोगियों दलों के साथ कुल 150 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस तरह पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिला। पार्टी को 68 लाख यानी 59.9 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं।

इससे पहले राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने नवंबर में एसएलपीपी की टिकट पर ही चुनाव में जीत दर्ज की थी और निर्धारित समय ये छह महीने पहले ही चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी। गोटबाया राजपक्षे, महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई हैं। दोनों को तमिल विद्रोहियों को कुचलने और देश में लंबे समय से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए जाना जाता है।

आलोचकों को डर है कि दोनों भाई मिलकर संविधान में परिवर्तन कर सकते हैं। उनका कहना है कि दोनों भाई राष्ट्रपति कार्यकाल की सीमा खत्म करना चाहते हैं, वे न्यायपालिका और पुलिस को सीधे अपने नियंत्रण में लेकर वंशवादी सत्ता को बनाए रखना चाहते हैं।

पिछले चुनाव में श्रीलंका की जनता ने महिंदा राजपक्षे को नकार दिया था। पिछली सरकार बदलाव के वादे के साथ आई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पिछली सरकार ने खास कुछ काम नहीं किया और इस कारण महिंदा राजपक्षे की वापसी हो गई। वहीं वर्तमान राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे द्वारा कोरोना संकट का सामना करने के लिए उठाए गए कदमों को भी जनता ने पसंद किया और इसने महिंदा राजपक्षे के लिए सकारात्मक माहौल बनाया।

वहीं नतीजों के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी केवल एक सीट ही अपने नाम कर पाई। उसे केवल 2,49,435 यानी दो प्रतिशत वोट ही मिले। राष्ट्रीय स्तर पर वह पांचवे नंबर पर रही। 1977 के बाद ऐसा पहली बार है कि विक्रमसिंघे को संसदीय चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

आंकड़ों के अनुसार एसजेबी 55 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही, तमिल पार्टी टीएनए को 10 सीटे और मार्क्सवादी जेवीपी को तीन सीट हासिल हुई।

यहां 1.6 करोड़ से अधिक लोगों को 225 सांसदों में से 196 के निर्वाचन के लिए मतदान करने का अधिकार था। वहीं 29 अन्य सांसदों का चयन प्रत्येक पार्टी द्वारा हासिल किए गए मतों के अनुसार बनने वाली राष्ट्रीय सूची से होगा।

पहले यह चुनाव 25 अप्रैल को होने वाले थे लेकिन कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर इसकी तारीख बढ़ाकर 20 जून की गई। इसके बाद स्वास्थ्य अधिकारियों के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए चुनाव की तारीख आगे बढ़ाकर पांच अगस्त कर दी गई। करीब 20 राजनीतिक दलों और 34 स्वतंत्र समूहों के 7,200 से ज्यादा उम्मीदवार 22 चुनावी जिलों से मैदान में थे।