बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: 31 सीटों के नतीजों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची TMC, लगाए चुनाव प्रभावित करने के आरोप

सुप्रीम कोर्ट में बंगाल चुनाव के दौरान 91 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने पर अहम सुनवाई हुई। TMC ने दावा किया कि कई सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर हटाए गए वोटरों से कम था।

Updated: May 11, 2026, 07:18 PM IST

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मुद्दे पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अदालत में दावा किया कि राज्य की 31 विधानसभा सीटों पर भाजपा और टीएमसी उम्मीदवारों के बीच जीत हार का अंतर उन वोटरों की संख्या से कम था जिनके नाम स्पेशल इंटेंसिव रिविजन प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए थे। मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने की।

सुनवाई के दौरान टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि कई सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती थी। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक सीट पर उनकी पार्टी का उम्मीदवार केवल 862 वोटों से हारा था। जबकि, वहां 5 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि वोट डिलीशन से जुड़ी 35 अपीलें अभी भी लंबित हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कहा कि पश्चिम बंगाल में हुई SIR प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य नेता नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। अदालत फिलहाल बंगाल में SIR प्रैक्टिस को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

चुनाव आयोग ने टीएमसी के आरोपों का विरोध किया है। आयोग की ओर से कहा गया कि मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े विवादों के समाधान के लिए चुनाव आयोग के समक्ष याचिका दाखिल करना ही उचित प्रक्रिया है। आयोग ने अदालत को बताया कि इसी व्यवस्था के जरिए जवाबदेही तय की जा सकती है।

टीएमसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि मौजूदा स्थिति में अपीलीय ट्रिब्यूनल्स को इन मामलों का निपटारा करने में करीब चार साल लग सकते हैं। उन्होंने कहा कि इतनी लंबी प्रक्रिया चुनावी न्याय के उद्देश्य को प्रभावित कर सकती है।

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हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 294 में से 207 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि, टीएमसी को 80 सीटें मिली थी। चुनाव में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था। वोट शेयर के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा को कुल 2 करोड़ 92 लाख 24 हजार 804 वोट मिले थे। जबकि, तृणमूल कांग्रेस को 2 करोड़ 60 लाख 13 हजार 377 वोट प्राप्त हुए थे। इस तरह भाजपा को टीएमसी से करीब 32 लाख 11 हजार 427 अधिक वोट मिले थे।

राज्य में SIR प्रक्रिया के दौरान लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए थे। औसतन हर विधानसभा सीट पर करीब 30 हजार वोटर कम हुए थे। कुल 293 सीटों में से 176 सीटें ऐसी रहीं जहां जीत का अंतर 30 हजार वोटों से कम था। जबकि, 117 सीटों पर यह अंतर 30 हजार से अधिक रहा था।

इन 176 सीटों में भाजपा ने 128 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, 117 सीटों में जहां जीत का अंतर 30 हजार से ज्यादा रहा। उनमें भाजपा की 79 सीटें शामिल थी। टीएमसी की 44 सीटों पर जीत का मार्जिन 30 हजार से कम और 36 सीटों पर इससे अधिक रहा था।

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अदालत में यह भी बताया गया कि भाजपा की 25 सीटें ऐसी थी जहां हटाए गए या अयोग्य घोषित मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी। इससे पहले 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि बड़ी संख्या में मतदाता मतदान से वंचित हुए हों और वह संख्या जीत के अंतर को प्रभावित करती हो तो अदालत इस मामले में दखल दे सकती है।

जस्टिस जॉयमल्या बागची ने उस दौरान कहा था कि यदि किसी सीट पर जीत का अंतर केवल 2 प्रतिशत हो और 15 प्रतिशत मतदाता वोट नहीं डाल पाए हों तो यह गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि बाहर किए गए मतदाताओं का मुद्दा न्यायालय के विचाराधीन है।

पश्चिम बंगाल में अक्टूबर 2025 तक कुल 7.66 करोड़ मतदाता थे। SIR प्रक्रिया के बाद अब तक करीब 90.83 लाख नाम हटाए जा चुके हैं। इससे राज्य में मतदाताओं की संख्या घटकर लगभग 6.76 करोड़ रह गई है। सबसे ज्यादा नाम बांग्लादेश सीमा से सटे जिलों में हटाए गए। नॉर्थ 24 परगना जिले में 5.91 लाख में से 3.25 लाख नाम हटे। जबकि, एक अन्य जिले में 8.28 लाख में से 2.39 लाख मतदाता सूची से बाहर किए गए।

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