जीतेगी तो अहिंसा ही: ईरानी कौम जिंदाबाद
ईरान जिसे सन 1935 से पहले फारस के नाम से जाना जाता था, के पास पिछले कम से कम तीन हजार वर्षों का जीवंत इतिहास है और वह उस विरासत की ताकत को जानता समझता है।
"Tuesday will be Power Plant Day, and Bridge Day, all wrapped up in one, in Iran. There will be nothing like it!!! Open the Fuckin' Strait, you crazy bastards, or you'll be living in Hell — JUST WATCH! Praise to Allah."
TRUMP.
वैसे तो किसी भी सभ्य व शालीन व्यक्ति को इस तरह के संदेशों को दोहराना नहीं चाहिए, परंतु मुझे लगा कि हिंदी भाषा से जुड़े हमारे अधिकांश पाठकों को जो अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध की वकालत कर रहे हैं, को यह पढ़ना और समझना जरूरी है। इसका अनुवाद करने का साहस उठा पाना संभव नहीं था और उसे लिख पाना तो सर्वथा असंभव ही है। परंतु दुनिया के सबसे अमीर, सबसे ताकतवर और सबसे सभ्य देश का सबसे बड़ा अधिकारी यानी वहां का राष्ट्रपति इस तरह की भाषा का उपयोग कर रहा है। हथियारों का जवाब तो किसी न किसी तरह से दिया जा सकता है, परंतु गाली का जवाब क्या दें? क्योंकि बदले में गाली तो नहीं ही दी जा सकती।
ईरान ने अमेरिका को और बाकी दुनिया को बतला और समझा दिया कि वस्तुतः “सभ्यताएँ” और “सभ्यता” क्या होती हैं। दरअसल क्रिस्टोफर कोलंबस जो कि 12 अक्टूबर 1492 को अमेरिका पहुंचा था और वहां के मूल निवासियों की चुप्पी को उसने सहमति समझकर अत्याचार और अनाचार के जिस दौर की वहाँ से शुरुआत की थी, के करीब 634 वर्षों बाद भी वह दंभ अभी कायम है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्र के रूप में गठन की घोषणा 4 जुलाई 1776 यानी अब से ठीक 250 बरस पहले हो गई थी। अमेरिका की अकड़ भी नव धनाढ्य वर्ग जैसी ही है।
वहीं ईरान जिसे सन 1935 से पहले फारस के नाम से जाना जाता था, के पास पिछले कम से कम तीन हजार वर्षों का जीवंत इतिहास है और वह उस विरासत की ताकत को जानता समझता है। सात करोड़ की आबादी वाला यह देश पिछले करीब सात दशकों से बेहद ऊहापोह की स्थिति में है। लोकतंत्र से राजतंत्र और राजतंत्र से मुस्लिम गणराज्य तक का उसका सफर बहुत सुखद नहीं रहा है। परंतु ईरान एक सर्वभौम राष्ट्र है जहां के निवासी दुनिया के सबसे शिक्षित समाजों में से हैं।
परंतु सवाल अनैतिक, गैरकानूनी और गैरजरूरी युद्ध का है जो उस देश पर थोपा गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने धमकी दी थी कि वे ईरान को तहस नहस कर देंगे और पूरी तरह से बर्बाद कर उसे आदिमयुग में पहुंचा देंगे। सारे अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों और नैतिकता को परे रखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति प्रलाप कर रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। अपवादों को छोड़ दें तो अमेरिका के प्रत्येक राष्ट्रपति फिर वह चाहे डेमोक्रेट हो या रिपब्लिकन, इसी मानसिकता के साथ “राज” करते हैं। वे “शासन” नहीं, सम्राटों की तरह “राज” करते हुए ही दिखाई पड़ते हैं।
अरुंधति राय के लेख "वे युद्ध को शांति कहते हैं" की शुरुआत में लिखा है, “रविवार, 7 अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान पर अंधेरा गहरा रहा था। अमेरिकी सरकार ने “आतंकवाद के विरुद्ध विश्वमोर्चे (अर्थात संयुक्त राष्ट्र संघ के समानांतर एक और जी हुजूर गठबंधन) के समर्थन से वहां भारी हवाई हमले शुरू कर दिए। लगभग सारे टीवी चैनल क्रूज मिसाइलों, “स्टेल्थ” बमवर्षक विमानों, बंकर भेदी टाम हाक मिसाइलों और मार्क-012 उच्च खिंचाव बमों के कंप्यूटर के तैयार चित्रों तथा अन्य प्रकार के करतबों से भर गए। दुनिया भर में बच्चे वीडियो गेम के लिए ललचाना बंद कर फटी-फटी आंखों से युद्ध का खेल देखने में मगन हो गए।
गौरतलब है कि हमलों की घोषणा करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था “हम एक शांतिप्रिय राष्ट्र हैं।" इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने कहा, “यह हमारा आह्वान है, अमेरिका का आह्वान है। विश्व के सबसे आजाद देश का। यह राष्ट्र उन मूल्यों पर स्थापित हुआ है जो घृणा को अस्वीकार करता है, हिंसा को अस्वीकार करता है, हत्यारों को अस्वीकार करता है और बुराइयों को अस्वीकार करता है। और हम थकेंगे नहीं।" सचमुच अमेरिका कभी नहीं थकता। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका अब तक करीब 25 देशों पर हमला कर चुका है। जाहिर है वह सबसे “आजाद” देश ही है, क्योंकि किसी और देश ने ऐसा करने की आजादी नहीं ली। अफगानिस्तान के बाद अब ईरान की बारी आई। करीब 25 बरस बाद राष्ट्रपति बदल गए और भाषा थोड़ी और वीभत्स हो गई। परंतु मानसिकता और मिजाज वही बना रहा। अमेरिका अफगानिस्तान में करीब 20 बरस रहा। वह अगस्त 2021 में वहां से लौटा, कमोवेश हताश और हारकर। इतना ही नहीं, इस पर उसके तीन ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा राशि खर्च भी हुई। (भारतीय मुद्रा में इसकी गणना नहीं हो पा रही है। यह राशि है 27,000,000,000,000,0 रुपये है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है।) परंतु ईरान के सामने 20 वर्ष तो दूर 20 महीने या यूं कहें तो 20 दिन भी युद्ध चलाना अमेरिका को भारी पड़ने लगा था।
तो ऐसा कैसे संभव हो पाया? इसके लिए हमें एक बार “ईरानी कौमें जिंदाबाद” तो कहना ही पड़ेगा। ईरान की जनता ने यह दिखा दिया कि अंततः जीत तो “अहिंसा” की ही होगी। महात्मा गांधी भारत में औपनिशिक अंग्रेजी शासन को बेदखल करने के लिए इसका अभूतपूर्व उपयोग कर चुके हैं। महात्मा गांधी ने कहा है, “हम अपने मित्रों और अपनी बराबरी के लोगों से प्रेम करते हैं, परंतु एक निर्दय तानाशाह के प्रति हमारे मन में प्रतिक्रिया हिंसात्मक होने पर भय की और अहिंसात्मक होने पर दया की होती है। अहिंसा भय नहीं जानती। यदि मैं सच्चा अहिंसावादी हूँ तो मुझे तानाशाह पर दया आएगी और मैं कहूँगा कि उसे ज्ञान नहीं है कि मानव को कैसा होना चाहिए।"
अमेरिकी राष्ट्रपति वास्तव में दया के पात्र ही हैं। ईरान में तबाही की धमकी के विरुद्ध ईरान की 7 करोड़ की आबादी में से 1.40 करोड़ लोग यानी 20 प्रतिशत लोग आत्मबलिदान के लिए अपनी स्वीकृति भेज चुके हैं, उन्होंने अपने बिजलीघरों आदि के बाहर मानव श्रृंखला तैनात कर दी है। वहां के संगीतकार भी उनके साथ बैठे हैं और ईरान ने “बलिदान को एक समारोह” में बदल दिया है। दुनिया के देशों के पास कितने भी हथियार हो जाएं वे करोड़ों लोगों को मारने की मानसिक क्षमता विकसित नहीं कर सकते। सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान में अब सिर्फ सेना युद्ध नहीं लड़ रही, आम नागरिक इस युद्ध में शामिल हो गए हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। गांधी ने तो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी यह सुझाव दिया था कि हमें जर्मनी (हिटलर) की ओर पैदल कूच कर देना चाहिए। किसी सेना में इतनी मानसिक ताकत नहीं होती कि वे लाखों लाख लोगों की एकमुश्त हत्या करने की हिम्मत जुटा सके।
अमेरिका किस तरह दूसरे देशों में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया को संचालित करता है, इसे जान परकिंन्स की पुस्तक “कन्फेशन ऑफ ए इकोनॉमिक हिट मेन” के दो आलेखों, Iran king of king और The Fall of a King से समझा जा सकता है। पहला लेख शाह को गद्दीनशीन करने का और दूसरा उन्हें हारने के लिए हुए जनता के विद्रोह से जुड़ा है। जाहिर है युद्ध में जीत तो सामान्यतया किसी भी पक्ष की नहीं होती। कुछ को लगता है कि वह जीत गए हैं। परंतु वास्तव में ऐसा होता नहीं है।
अमेरिका और इजराइल चाहे कितना भी दंभ भरें कि वे जीत गए हैं, परंतु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। वे ईरान और वहाँ के निवासियों के आत्मविश्वास को डिगा नहीं पाए। कहते हैं न कि “मन के हारे हार है।" ईरान पहले दिन से ही निश्चिंत था क्योंकि वह अपने घर और अपने लोगों के बीच में था। राष्ट्र के नागरिक ही उसकी ताकत होते हैं। गोला बारूद आदि तो बाद की बात है।
प्रसिद्ध लेखक फॉकनर ने कहा था, “उपन्यास में समय बर्फ की तरह जमा रहता है, लेकिन जैसे ही हम उसे बुक शेल्फ से निकालकर पढ़ना शुरू करते हैं, वह दोबारा से पाठक के जीवन में बहना शुरू कर देता है।" अमेरिका ने अपनी अलमारी से एक बम निकाला और उसे ईरान की तरफ फेंका और ईरान ने नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर दिया। ईरान स्वयं तो लड़ाई में नहीं शामिल हुआ, मगर युद्ध खत्म तो उसकी शर्तों पर ही होगा। पाकिस्तान या अन्य मध्यस्थता करने वाले देश भी इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं। हम सब भी जानते हैं कि जो भी दुनिया जीतने निकलते हैं, वे बेहद लाचार अंत का शिकार होते हैं। फिर वह चाहे सिकंदर हो, हिटलर हो या मुसोलिनी। वे अपने साथ राष्ट्र-राज्य को भी घृणा का पात्र बना देते हैं।
वैसे भारतीयों ने वर्तमान में यह मान लिया है कि उसका अतीत मात्र राजाओं के इर्दगिर्द ही विचरण करता था। नए शासकों ने भारत के अतीत को केवल राजा-महाराजाओं या भारत में आकर बसे मुस्लिम शासकों के इर्दगिर्द लाकर खड़ा कर दिया है। साम्प्रदायिकता की बढ़ती लपट में हम यह याद ही नहीं करना चाहते कि अंततः हमारा वास्तविक अतीत है क्या। ईरान से ही इसे जोड़ें तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं।
विलियम हण्टर जिन्होंने इंडियन गजेटियर तैयार किया था के पृष्ठ 932 पर उल्लेख है, “विश्व इतिहास इस बात को स्वीकारता है कि शास्त्र के रूप में संगीत प्रथमतः भारतीय देन है। यहीं से वह अन्य देशों में फैला था। भारतीय संगीत शास्त्रियों ने रागों की जो स्वर लिपियां तैयार की थीं, वे पहले ईरान गई, वहां से अरब और अरब से यूरोप पहुँची थीं।" वहीं गौरीशंकर हीरालाल ओझा - राजपुताने का इतिहास (भाग-1 पृ. 29) में लिखते हैं, “इतिहासकार तो मानते हैं कि एक बार तो ईरान के शाह बहराम ने 6ठी शताब्दी में भारत से एक साथ बीस हजार गायक ईरान बुलवाए थे। युद्ध के इस दौर में संगीत का जिक्र इसलिए ज़रूरी हो जाता है क्योंकि हमें समझना होगा कि दुनिया आपस में जुड़ती कैसे है और उसे हजारों वर्षों पहले भी किसने वैश्विक बनाया। वह जोड़ कला का था, व्यापार का था, भक्ति का था। युद्ध ने कभी किसी को जोड़ा नहीं है। अपने राज्य में दूसरे राज्य को मिला भी लें तो वो मिल तो जाता है, लेकिन कभी “जुड़ता” नहीं है। पाकिस्तान और बांग्लादेश इसके उदाहरण हैं।"
अमेरिका-इज़रायल बनाम ईरान युद्ध में अभी दो हफ्ते के युद्धविराम की घोषणा हो गई है। इस अवधि का उपयोग शांति की स्थापना में होगा या नाखून पैना करने के लिए? मध्यपूर्व एशिया या पश्चिम एशिया पिछले करीब 8 दशकों से युद्ध की आग में झुलस रहा है। कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही।
प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज ने सन 1980 में अपने बैरुत प्रवास के दौरान फिलिस्तीन पर दो रचनाएं लिखी थीं। उसमें से एक है “फलिस्तानी बच्चों के लिए लोरी” इसमें से एक लोरी प्रस्तुत है…
"मत रो बच्चे रो-रो के अभी तेरी अम्मी की आँख लगी है,
मत रो बच्चे कुछ ही पहले तेरे अब्बा ने अपने गम से रुखसत ली है,
मत रो बच्चे तेरा भाई अपने ख़्वाब की तितली के पीछे दूर कहीं परदेस गया है,
मत रो बच्चे तेरे बाज़ी का डोला पराये देश गया है,
मत रो बच्चे तेरे आँगन में मुर्दा सूरज नहला के गए हैं चन्दरमा दफना के गए हैं,
मत रो बच्चे अगर तू रोयेगा तो ये सब अम्मी, अब्बा, बाज़ी, भाई, चाँद और सूरज
और भी तुझको रुलवायेंगे तू मुस्कराएगा तो शायद सारे एक दिन भेस बदलकर तुझसे खेलने लौट आएंगे।
आपको कविता शायद लंबी लगी हो। मगर फैज़ साहब ने जिस बच्चे के लिए यह लिखी होगी, उससे खेलने तो कोई नहीं आया। बहरहाल वह अपनी आँखों की उम्मीद अब अपने बच्चों की आँखों में उतार रहा है। अस्सी साल से चल रहा यह मातम जल्दी ही खत्म होगा, इसी उम्मीद में हम रोज नया सवेरा देख पाते हैं।




