युद्ध के धमाकों पर वैश्विक सन्नाटा
इस वक्त की सबसे बड़ी उलझन है कि मनुष्यों में परस्पर विश्वास समाप्त होता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्थाएं भी जैसे डर के साये में हैं। वे कथित महाशक्तियों के वीटो पॉवर की आड़ में खुद को बचा रही हैं। ऐसा लग रहा है कि सं.रा. संघ अब एक शांति स्थापित करने वाली संस्था न रहकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में रूपांतरित हो गया है।
करीब 3,000 (तीन हजार) वर्ष पहले मिस्त्र में लिखी गई कविता की इन पंक्तियों पर गौर करिए,
"पड़ोसी देश में लूट मचाई,
खेत बाग सब दिये उजाड़,
नगर बस्तियां कर डालीं भस्म,
हजारों उतारे मौत के घाट,
साथ ले आए युद्ध बंदी असंख्य,
सेनाएं सकुशल लौट आई हैं,
राजा से मैंने वाहवाही पाई है।"
क्या पिछले तीन हजार सालों में दुनियां बिल्कुल नहीं बदली? ऐसा नहीं है कि बदलाव नहीं आया। बदलाव तो आया है! जैसे अब यह आवश्यक नहीं कि हम पड़ोसी देश पर ही आक्रमण करें। आज हजारों मील दूर बैठे अमेरिका और इज़राइल ईरान को ध्वस्त कर रहे हैं। बदले में इज़राइल भी कुछ हद तक नष्ट हो रहा है। यह तो है कि आज भी खेत, बाग उजाड़ रहे हैं। शहर और मोहल्ले नष्ट किए जा रहे हैं। परंतु अब युद्धबंदी बनाने की आवश्यकता नहीं रह गई है। अब तो पूरा राष्ट्र ही बंदी हो जाता है, जैसे इराक हो गया, वेनेज़ुएला हो गया या लीबिया हो गया। सेनाएँ अब युद्ध थोपे गए राष्ट्र में प्रवेश ही नहीं करतीं और राष्ट्र गुलाम हो जाता है। है ना मज़ेदार बात?
गांधी समझाते हैं, "मैंने देखा है, व्यक्तियों की तरह राष्ट्रों का निर्माण भी आत्म-बलिदान की पीड़ा सहने से ही होता है, दूसरे किसी मार्ग से नहीं। आनंद दूसरों को दुखी बनाने से नहीं मिलता, बल्कि स्वयं स्वेच्छापूर्वक दुख भोगने से मिलता है।" गौर करिए भारत एक परिपूर्ण राष्ट्र के रूप में उदय और आज़ादी के 80 वर्ष बाद एक अविभाजित राष्ट्र के रूप में बने रहना गांधी द्वारा सुझाई गई इसी भावना का प्रतीक ही है।
भारत ने पाकिस्तान विभाजन को स्वीकार कर स्वयं को गृहयुद्ध से बचाया और रियासतों का भारत में विलय एक तरह से आत्मबलिदान की श्रेणी में ही गिना जाएगा। इसी के साथ गांधी की एक गुहार कि, “अंग्रेज हमारे मित्र बनकर यहाँ से जाएँ” ने भी हमें बेहद संवेदनशील राष्ट्र के रूप में उदित और विकसित होने का मौका दिया था। वर्तमान के काले काल को ज़रा विस्मृत ही रहने दीजिए। तो लौटते हैं एक महाद्विप युद्ध में। यानी अमेरिका और एशिया महाद्वीप। युद्ध की वजह? न अमेरिका बता पा रहा है और न इज़राइल। महज़ आरोप लगाना युद्ध की वजह या कारण नहीं हो सकता।
दरअसल, मुख्य मामला आर्थिक है और इससे जुड़ा है प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जा। इस प्रक्रिया में नागरिक फिर चाहे वे बच्चे हो या बूढ़े, महिला या पुरुष मायने नहीं रखते। याद रखिए, अब युद्ध “वीरता” से नहीं बल्कि “क्रूरता” के साथ लड़े जा रहे हैं। ईरान के सर्वोच्च नेताओं की एक के बाद एक हत्या से हमें निष्कर्ष निकालना चाहिये कि अमेरिका और इज़राइल एक नेतृत्व विहीन राष्ट्र को हथियाना चाहते हैं। वे लोकतंत्र के नाम पर हिंसा को न केवल थोप रहे हैं, बल्कि उसे स्वीकार्य और अपरिहार्य भी घोषित कर रहे हैं। यह राष्ट्रवाद का नवीनतम स्वरूप रहेगा।
गांधी अर्थव्यवस्था को व्याख्यायित करने वाले जे.सी. कुमारप्पा अर्थव्यवस्थाओं को पाँच जंतुओं से परिभाषित करते हैं। ये हैं— चीता, बंदर, चीटी, मधुमक्खी और (माँ) चिड़िया। हम पहली दो को समझते हैं। पहली अर्थव्यवस्था को वे “आदमखोर” की संज्ञा देते हैं। वे समझाते हैं कि चीता सबसे हिंसक और बेरहम है। चीता स्वयं कुछ भी पैदा नहीं करता। पैदावार नहीं करता। मगर पूरा हिस्सा उसी का होता है। तब वे इस श्रेणी में ब्रिटेन को रखते थे और आज अमेरिका का अध्ययन करें तो....! दूसरी अर्थव्यवस्था का प्रतीक है “बंदर।“ यह अपनी खुराक कैसे पाता है? यहाँ-वहाँ लूटपाट कर-कर। यहाँ से फल तोड़ता है, तो वहाँ से पत्ती। वह भी कुछ पैदा नहीं करता। बस लूटता है और नुकसान करता है। अमेरिका और इज़राइल या अन्य आक्रामक देशों की उपरोक्त उपमाओं के संदर्भ में विश्लेषित करने से ये स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी।
इस वक्त की सबसे बड़ी उलझन है कि मनुष्यों में परस्पर विश्वास समाप्त होता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्थाएं भी जैसे डर के साये में हैं। वे कथित महाशक्तियों के “वीटो” पॉवर की आड़ में खुद को बचा रही हैं। ऐसा लग रहा है कि सं.रा. संघ अब एक शांति स्थापित करने वाली संस्था न रहकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में रूपांतरित हो गया है और लगता है जैसे कि अब वहाँ नेता या नायक नहीं बल्कि सामान्य कर्मचारी कार्य कर रहे हैं और उन्हें संस्था के उद्देश्य आदि से नहीं बल्कि अपनी तनख्वाह भर से लेना-देना है। संयुक्त राष्ट्र संघ की कुल सदस्य संख्या 193 है और सिर्फ 2 देश आक्रमण कर रहे हैं। इसके बावजूद संघ सन्निपात में है।
जबकि इसके मुख्य उद्देश्य है “अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना” क्या यह संगठन इस युद्ध में ऐसी किसी भूमिका में नज़र आ रहा है? यहाँ ईरान के खिलाफ प्रस्ताव पारित होता है, लेकिन इज़राइल और अमेरिका के खिलाफ नहीं। अमेरिका ईरान में “लोकतंत्र” की स्थापना की बात करता है, परन्तु गौर करिए...खाड़ी (मध्यपूर्व) में उसके जितने भी मित्र हैं, फिर वह चाहे सऊदी अरब हो या कुवैत, या संयुक्त अरब अमीरात, ओमान या कतार, कहीं भी लोकतंत्र है? अधिकांश देशों में क्रूर राजशाही है या सीरिया जैसे देशों में अमेरिका समर्थित आतंकवादी सत्ता में है। ईरान कैसा भी हो पर वहाँ राजशाही तो नहीं है।
तो संयुक्त राष्ट्र संघ की दिशा में कार्य करता हुआ दिखाई ही नहीं दे रहा है। सफलता या असफलता तो दूर की बात है। उसका कोई जमीनी प्रयत्न ही नज़र नहीं आ रहा है। खाड़ी के देशों में सं.रा. संघ का एक भी प्रतिनिधिमंडल सक्रिय नज़र नहीं आ रहा है और न ही युद्ध के खिलाफ किसी तरह का वैश्विक जनमत तैयार करने संबंधी कोई गतिविधि नज़र आ रही है। ऐसी विकट परिस्थिति में अनायास विनोबा भावे याद आते हैं।
विनोबा ने सन 1960 में ही चीनी सीमा पर खतरे को भांप लिया था और कार्यकर्ताओं को सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्य करने की सलाह दी थी। याद रखिए, चीन ने सन 1959 में तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था। सन 1962 में चीन ने हमला कर दिया। इस आक्रमण ने अहिंसा के विचार को हिला सा दिया था। विनोबा का मानना था कि चीन का हमला केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि यह वैचारिक या विचारधारात्मक भी है। उस दौर में किसी भी अहिंसक प्रतिकार की तो बात ही नहीं हो सकती थी। परंतु कुछ सार्थक और मजबूत प्रयास की आवश्यकता भी थी।
विनोबा की सलाह पर तब एक “मैत्री यात्रा” शुरू की गई, जो दिल्ली से बीजिंग (तब पीकिंग) तक जाने वाली थी और इसका उद्देश्य था दोनों देशों के मध्य शांति और मैत्री का वातावरण तैयार करना। यात्रा 1 मार्च 1963 को दिल्ली से शुरू हुई और महान विचारक बर्ट्रेंड रसेल ने इसे आशीर्वाद दिया। इसमें भागीदारी करने वालों का मानना था कि अंतरराष्ट्रीय विवादों के निपटारे में युद्ध की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। चीन ने इसे सैर करने वालों का समूह और अमेरिकी तथा भारतीय साम्राज्यवादियों और अलगाववादियों का समूह कहा। यह यात्रा करीब 3000 किलोमीटर तक गई। परन्तु पाकिस्तान और म्यांमार (तब बर्मा) ने आगे जाने की अनुमति नहीं दी। परन्तु यात्रा ने करीब 200 सभाएं की और लाखों-लाख लोगों ने अहिंसा के बारे में चर्चा की। विनोबा स्वयं मानते थे कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में शायद ऐसी यात्राएँ सफल न भी हों, लेकिन हिंसा और युद्ध के खिलाफ जनमत तैयार करने में यह हर हाल में सहायक होगी।
इसी दौरान वे सत्याग्रह को और व्यापकता के साथ परिभाषित करते हुए कहते हैं, “जीसस ने सिर्फ इतना कहा था, “बुराई का विरोध न करो।” हमने इसे आत्मसात किया, “बुराई का विरोध, बुराई से न करो।” गांधी जी का भी यही मानना था। वह ठीक भी था। परंतु वर्तमान संदर्भों (संघर्षों) में जब वैचारिक संघर्षों में हथियारों का सहारा लिया जा रहा हो, तो हम सिर्फ बुराई का विरोध करने तक सीमित नहीं रह सकते। साथ ही सिर्फ अहिंसक प्रतिकार की ही बात तक भी सीमित नहीं रह सकते। हमें इससे आगे “सही सोच हेतु अहिंसक मदद या सहायता” की बात भी करनी होगी। इस तरह की मदद के प्रस्ताव का विरोध और असहयोग दोनों हो सकता है। कुछ लोग ऐसे विचारों के विरोध में जा भी सकते हैं, लेकिन हमें मदद की भावना को बनाए रखना होगा। उनका कहना था कि गांधी जी का भी मानना था कि लोकतंत्र में सत्याग्रह का स्वरूप थोड़ा भिन्न होगा। परंतु आज भारत जो कि दुनिया में सर्वाधिक आबादी वाला देश है, चीन और रूस जो कि ईरान के मित्र हैं और नाटो देश जो कि एक तरह से अमेरिका के सहायक ही हैं किसी भी तरह की सुलह की पहल क्यों नहीं कर रहे? सब सिर्फ इस बात पर एकमत हैं कि अपने-अपने देश में तेल-गैस की आपूर्ति सामान्य बनी रहे। ईरान या अन्य देश के नागरिक भाड़ में जाएं! तो क्या ऐसी मानसिकता से दुनिया चल सकती है?
एक पुराना आयरिश कानून बड़ी महत्वपूर्ण स्थापना करता है। वह समझाता है कि तीन ऐसे लम्हे होते हैं, जब दुनिया विक्षिप्त हो जाती है,
पहला, महामारी के दौर में,
दूसरा, युद्ध की स्थिति में,
तीसरा, मौखिक वादे को तोड़ देने की स्थिति में।
कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक विक्षिप्तता हमारे सामने आई थी। आज जो युद्ध हमारे सामने हो रहा है, उससे वैश्विक सोच उजागर हो रही है तथा हमें ओमान के मंत्री का वह वक्तव्य याद करना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी मध्यस्थता में ईरान समझौते को तैयार हो गया था लेकिन अमेरिका ने उस मौखिक समझौते को तोड़ा और स्थितियां आज हमारे सामने हैं। सोचिए हम किस ओर बढ़ रहे हैं। रास्ता बेहद जटिल और भूलभुलैया वाला है।
आलेख की शुरुआत करीब 3000 वर्ष पुरानी कविता से की थी और अंत में करीब 2700 वर्ष पुरानी एक सलाह जो चीनी दार्शनिक कन्फ्युशस ने दी थी, पर गौर करिये! “समाज की गलतियों या खराबी को सिर्फ समाज की भाषा को ठीक करके ही दूर (खत्म) किया जा सकता है। क्योंकि भाषा अगर गलत हो जाए तो गलत बोला जाएगा, गलत बोला जाएगा तो गलत सुना जाएगा और गलत कहकर जो गलत सुनाया गया है, उस पर जो अमल किया जाएगा वह भी गलत ही होगा और गलत अमल का परिणाम हमेशा गलत ही हुआ करता है। इसलिए गलत समाज की गलत बुनियाद हमेशा गलत भाषा ही डालती है।" आप क्या सोचते हैं?




