दफ्तर दरबारी: अफसरों के लिए दिल्ली से आई चिट्ठी और बीजेपी नेताओं की दादागिरी
MP Politics: मध्य प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक जगत में दिल्ली से आई एक चिट्ठी की चर्चा है। बीते दिनों हुए विवादों के बाद आए इस पत्र को नेताओं के लिए राहत माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह पत्र दादागिरी का मौका देगा।
ज्यादा दिन नहीं हुए जब मध्य प्रदेश के बीजेपी विधायक प्रीतम सिंह लोधी द्वारा आईपीएस को धमकाने के वीडियो वायरल हुए थे। इसी समय मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई भी एक महिला अफसर के साथ दुर्व्यवहार के कारण चर्चा में आए। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी किया। इसी दौरान मंत्री राकेश सिंह का आईएएस अरविंद शाह से विवाद सामने आ गया।
इन सब घटनाक्रमों के बाद दिल्ली से आई एक चिट्ठी ने नई बहस खड़ी कर दी। केंद्र सरकार के डीओपीटी विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी जीके रजनीश द्वारा मुख्य सचिव अनुराग जैन को भेजे गए इस पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के साथ व्यवहार, प्रोटोकॉल और जिम्मेदारियों का पालन सुनिश्चित कराया जाए। पत्र में यह भी कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों के पत्रों का समय पर जवाब देना अनिवार्य है और जवाब देते समय भाषा शालीन व विनम्र होनी चाहिए।
चार माह में केंद्र ने दूसरी बार ऐसा पत्र भेज कर अफसरों को हिदायत दी है। इसके पहले भी केंद्र सरकार नियमित रूप से ऐसे पत्र भेजता रही है? मगर मैदान में अजीब स्थिति है। कई अफसर बीजेपी नेताओं, उनके रिश्तेदारों के बुरे बर्ताव से परेशान हैं। बीजेपी नेता अफसरों को खुले आम धमका रहे हैं। ऐसे अफसरों की सहायता के लिए आईएएस एसोसिएशन सहित अन्य कर्मचारी संगठनों को आगे आना पड़ा है। ऐसे में माना जा रहा है कि सत्ता की ताकत के दम पर अफसरों को धमका रहे नेताओं के लिए केंद्र का पत्र दादागिरी का सहारा साबित हो सकता है।
दूसरी तरफ, ऐसे नेता भी हैं जिनकी अफसर सुनते नहीं हैं। ऐसे नेताओं में कुछ मंत्री, बीजपी के विधायक और विपक्ष के विधायक शामिल हैं। इन नेताओं की अनसुनी करने की ताकत अफसरों को सत्ता से ही मिलती है। अब देखना होगा कि केंद्र के पत्र से बीजेपी के बेलगाम नेता कितनी ताकत पाते हैं और राज्य सरकार जन प्रतिनिधियों को नजरअंदाज करने वाले पावरफुल नेताओं व उनके रिश्तेदारों पर कैसे सख्ती करती है?
इधर, अफसरों को हिदायत, उधर टीआई पर कार्रवाई
जब केंद्र ने नेताओं के प्रोटोकॉल पालन पर चिट्ठी भेजी उसी सप्ताह इन्दौर में बीजेपी नेताओं व पुलिस के बीच विवाद का नया मामला सामने आ गया। इंदौर में महू नाके पर ट्रैफिक चैकिंग के दौरान बीजेपी विधानसभा-4 प्रभारी वीरेंद्र शेडगे और ट्रैफिक पुलिस के बीच हेलमेट चालान को लेकर विवाद हो गया। बात इतनी बड़ गई कि ट्रैफिक टीआई राधा यादव ने बीजेपी नेता को थप्पड़ मार दिया। कुछ ही देर में बीजेपी कार्यकर्ताओं की भीड़ महू नाका पर पहुंच गई। सड़क जाम कर दी गई, टीआई मुर्दाबाद के नारे लगाए गए। यात्री बसें रुकवा दी गईं। तपती दोपहर में हजारों आम नागरिक घंटों जाम में फंसे रहे।
पुलिस विभाग ने बीजेपी नेताओं के दबाव के आगे घुटने टेक दिए। ट्रैफिक टीआई राधा यादव को फील्ड से हटाकर कार्यालय अटैच कर दिया गया जबकि कॉन्स्टेबल शेखर और सूबेदार लक्ष्मी धुर्वे को तत्काल निलंबित कर दिया गया। आम जनता की तकलीफ से पूरी तरह अनजान बना रहने वाला पूरा सिस्टम सत्ता से जुड़े लोगों के लिए ही संवेदनशील साबित हुआ। इस बार मामला बीजेपी से जुड़ा था इसलिए पुलिस झुकी और कार्रवाई भी बिजली की रफ्तार से हुई। अगर ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों की कार्रवाई गलत थी तो बीजेपी नेताओं की तरह आम जनता को भी राहत मिलनी चाहिए। अगर बीजेपी नेता गलत थे तो ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों को निलंबित कर क्या संदेश दिया गया?
नेता की तरह डीआईजी का स्वागत, खलनायक होने का गुमान
पत्रकारों को चेंबर में बुला कर पिटवाने के मामले में बुरी तरह बदनाम हुए भिंड एसपी आईपीएस डॉ. असित यादव को खुद के खलनायक होने पर गुमान है। तभी तो ग्वालियर डीआईजी पद पर तबादला हुआ तो विदाई पार्टी में डॉ. असित यादव ने ‘नायक नहीं, खलनायक हूं मैं' गाने पर जमकर डांस किया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।
इस पहले वीडियो के वायरल होने के तीन दिन बाद एक और वीडियो सामने आया। इसमें वे कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि “ग्वालियर में अपने स्टेनो से पूछूंगा कि कौन अपने आपको तीस मारखां समझता है। उसका नाम बताना, उसकी मैं सबसे ज्यादा ऐसी-तैसी करूंगा। जिसे अपने बारे में गलतफहमी हो, चाहे वह टीआई हो, डीएसपी हो, एएसपी हो। अगर, वह पुलिस अधीक्षक भी होगा तो उसको भी देखेंगे, सबसे पहले उसे ही टारगेट करूंगा।'
साहब यह भूल गए कि वे अभी ही एसपी से पदोन्नत हुए हैं और संभाग में डीआईजी के ऊपर एक आईजी भी होता है। मगर बात बड़बोलेपन तक ही सीमित नहीं है। वे ग्वालियर तक एक काफिले में पहुंचे। रास्ते में उनका स्वागत जेसीबी से पुष्प वर्षा कर हुआ। काफिले में कई गाडियों के साथ डीजे भी शामिल था। नेताओं की तरह आईपीएस असित कुमार यादव का यह व्यवहार उनकी राजनीतिक पहुंच व महत्वाकांक्षा बताने के लिए काफी है।
खत्म हुआ बड़े अफसरों का झगड़ा
ज्यादा दिन नहीं हुए तब मुख्यसचिव की बैठक में अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अफसरों का झगड़ा सामने आया था। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने सीएम हेल्पलाइन में आ रहीं शिकायत का मुद्दा उठाया तो एसीएस संजय शुक्ला ने कहा कि गांव में वन और राजस्व की जमीन अब तक स्पष्ट नहीं है। इसी के चलते विवाद बन रहे है। इस पर एसीएस अशोक वर्णवाल ने कहा कि वन विभाग की जमीन पोर्टल पर है। बात चल ही रही थी कि पंचायत विभाग की एसीएस दीपाली रस्तोगी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अधिकारियों के स्तर पर जो जानकारी सामने आ रही है, वह जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती। उन्होंने कहा कि आम लोगों के लिए जमीन के रिकॉर्ड तक पहुंचना अभी भी मुश्किल है और गांवों में राजस्व व वन भूमि की स्पष्ट स्थिति नहीं है। कई जगहों पर माप में अंतर भी सामने आता है, जिससे विवाद बढ़ते हैं। दीपाली रस्तोगी के इस कथन से बैठक में सन्नाटा खींच गया। अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के तीन अफसरों के इस कटु संवाद से मीटिंग में तल्खी आ गई।
इससे पहले पोस्टिंग को लेकर भी शीर्ष अफसरों की मायूसी साफ दिखाई दी थी। संजय कुमार शुक्ला को सामन्य प्रशासन विभाग में भेज दिया गया था जबकि पदोन्नति के बाद एसीएस शिवशेखर शुक्ला को गृह विभाग की कमान दे दी गई थी। दोनों ही अधिकारी इस पदस्थापना से खुश् नहीं थे? ताजा तबादलों में यह स्थिति बदल गई है। दो अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ला और शिव शेखर शुक्ला की जिम्मेदारी बदल दी गई है। संजय कुमार शुक्ला को एसीएस होम और शिवशेखर शुक्ला को सामान्य प्रशासन विभाग की कमान सौंपी गई है। इसके साथ ही शिवशेखर शुक्ला के पास उनके पसंदीदा संस्कृति विभाग का प्रभार भी रखा गया है। अब वे संजय कुमार शुक्ला की जगह मुख्यमंत्री कार्यालय से समन्वय का काम भी देखेंगे। इससे दोनों अधिकारियों का मन खिल गया है। माना जा रहा है कि इस कदम से शीर्ष अफसरों में फैली बेचैनी दूर हुई है।




