ईरान के प्रस्ताव से थमा युद्ध, दुनिया पर संकट बरकरार

सीजफायर के प्रस्ताव में शामिल शर्तें जैसे प्रतिबंधों का हटना, परमाणु कार्यक्रम की स्वीकृति, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य वापसी इतनी जटिल और विवादास्पद है कि उनका पूर्ण क्रियान्वयन आसान नहीं होगा।

Updated: Apr 08, 2026, 12:42 PM IST

विगत 28 फरवरी से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चले युद्ध में डेडलाइन से डेढ़ घंटा पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर(संघर्ष विराम) का ऐलान कर दिया है। ईरान ने आधिकारिक तौर पर युद्धविराम स्वीकार कर लिया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट पर सीजफायर का ऐलान करते हुए कहा है कि ईरान के साथ सभी विवादित मुद्दों पर सहमति बन गई है और दो हफ्ते के अंदर समझौते के प्रस्ताव को आखिरी रूप दिया जाएगा। 

ट्रम्प ने कहा है कि उन्हें ईरान की तरफ से 10 सूत्रीय प्रस्ताव मिला है जो बातचीत के लिए एक व्यवहारिक आधार है। ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोल देगा। ये भरोसा उन्हें पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने दिया है। पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच 10 अप्रैल को बातचीत होगी। इसका ऐलान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने किया है। दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक समाधान तक पहुंचाने की कोशिश में पाकिस्तान की भूमिका एक मध्यस्थ के तौर पर अहम रही है।

यह भी सच है कि पिछले एक साल में ईरान और अमेरिका के बीच दो बार बातचीत हुई है। दोनों ही बार बातचीत के बीच में युद्ध शुरू हो गया। अमेरिका ने हाल ही में ईरान के पुलों, पावर प्लांट और अन्य प्रमुख ठिकानों को तबाह करने की जो चेतावनी और ईरान की "सभ्यता समाप्त" करने की धमकी दी थी।इस चेतावनी और धमकी के बाद ईरान ने कहा है कि एक सभ्य राष्ट्र की संस्कृति, तर्क और अपने सही उद्देश्य पर विश्वास, बलपूर्वक दबाव की नीति पर भारी पड़ेगा।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि ईरान अपने अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा। ईरान ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर उसके खिलाफ कोई कार्रवाई होती है तो वह जवाबी कदम उठाएगा। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस टकराव को लेकर चिंता बढ़ गई, क्योंकि इसका असर वैश्विक सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता था। 

ईरानी सरकार और सरकारी मीडिया अमेरिका के साथ हुए समझौते को वहां के शासन की एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं। क्योंकि वे अमेरिका और इजरायल के साथ 30 से अधिक दिनों तक चले इस युद्ध में टिके रहे और बच गए। इसलिए ईरान के इस बयान और ईरान के खुद को विजेता के रूप में पेश करने को अहम माना जा रहा है। युद्ध की शुरुआत में ही इस्लामिक रिपब्लिक के नेता अली खामेनेई और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ जनरलों की अमेरिकी-इसराइली हमलों में मौत हो गई थी। यह लड़ाई वहां के शासन के लिए अस्तित्व के लिए खतरा था और एक अस्तित्व की लड़ाई थी। 

ईरानी मीडिया के अनुसार, इस प्रस्ताव में 10 बिंदु शामिल हैं, जिसमें अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता और भविष्य में ईरान पर आक्रमण नहीं करने की मजबूत अंतरराष्ट्रीय गारंटी मिले। होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण जारी रहेगा और होर्मुज को खुला रखने पर ईरान अपनी शर्तें तय करेगा। कोई भी विदेशी ताकत (खासकर अमेरिका) इसके इस्तेमाल पर दबाव नहीं डाल सकेगी। यूरेनियम संवर्धन की स्वीकृति। ईरान पर अमेरिका सभी प्राथमिक प्रतिबंधों को हटाएगा। इजरायली अटैक रोकने की मांग। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सभी प्रस्तावों को समाप्त करना। ईरान को युद्ध में ईरान हुए सभी तरह के बुनियादी नुकसान का मुआवजा (क्षतिपूर्ति) दी जाए। क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू बलों की वापसी और खाड़ी क्षेत्र में सभी अमेरिकी सैन्य अड्डों को बंद करना। लेबनान और गाजा में भी युद्ध की समाप्ति और लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ लड़ाई समेत सभी मोर्चों पर युद्ध विराम की शर्तें शामिल हैं।

ईरान युद्ध के कारण अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे "वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान" बताया है। इस संघर्ष ने 1970 के दशक के ऊर्जा संकट की याद दिला दी है, जिसमें आपूर्ति की गंभीर कमी, मुद्रा अस्थिरता, मुद्रास्फीति और मंदी तथा आर्थिक संकट का खतरा बढ़ गया है। युद्ध ने खाङी सहयोग परिषद के आर्थिक माॅडल को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। इस युद्ध ने यूरोप के लिए दूसरा बङा ऊर्जा संकट और उसके बाद आर्थिक संकट पैदा कर दिया है, मुख्य रूप से कतर देश के द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के निलंबन और होमुर्ज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण उत्पन्न हुआ है। 

इस संकट ने यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ में औद्योगिक उत्पादन को और भी प्रभावित किया है, जहां रसायन और इस्पात निर्माताओं ने बिजली और कच्चे माल की बढ़ती लागत की भरपाई के लिए 30% तक अधिभार लगाया है। दुनिया के बाकी हिस्सों में अफरा-तफरी मची हुई है और पेट्रोलियम के वितरण में भारी व्यवधान उत्पन्न हो गया है। दुनिया की जीडीपी को अब तक करीब 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इस तबाही से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक हर तरफ हाहाकार मचा है। सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) वाशिंगटन के मुताबिक, इस युद्ध में अब तक अमेरिका को 7.49 लाख करोड़ रुपये (80.4 बिलियन डॉलर) स्वाहा हो चुका है।

युद्ध शुरू होने के बाद से भारतीय निवेशकों के करीब 37 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं। कच्चे माल और ऊर्जा की लागत बढ़ने से दुनिया भर में वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे मंदी का खतरा पैदा हो गया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं था, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की जड़ों को हिला देने वाला घटनाक्रम साबित हुआ है।ईरान द्वारा इस समझौते को अपनी “कूटनीतिक जीत” के रूप में प्रस्तुत करना और अमेरिका द्वारा इसे एक व्यवहारिक समाधान के रूप में स्वीकार करना यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष लंबे संघर्ष के बाद किसी मध्य मार्ग की ओर बढ़ने को मजबूर हुए हैं। 

हालांकि, प्रस्ताव में शामिल शर्तें जैसे प्रतिबंधों का हटना, परमाणु कार्यक्रम की स्वीकृति, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य वापसी इतनी जटिल और विवादास्पद है कि उनका पूर्ण क्रियान्वयन आसान नहीं होगा। अंततः, यह संघर्ष एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि युद्ध भले ही शक्ति का प्रदर्शन करता हो, लेकिन स्थायी समाधान केवल संवाद, आपसी विश्वास और संतुलित कूटनीति से ही संभव है।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)