जी भाईसाइब जी: बीजेपी नेताओं को प्रियंका गांधी के ग्वालियर आने का बेसब्री से इंतजार
Priyanka Gandhi in Gwalior: ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद 21 जुलाई को पहला मौका होगा जब गांधी परिवार का कोई सदस्य उस ग्वालियर क्षेत्र में चुनावी सभा करेगा जो सिंधिया का गढ़ कहा जाता है। उनके दौरे से कांग्रेस में तो उत्साह है ही बीजेपी ने भी खास प्रबंधन किए है। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को मिली जिम्मेदारी से भी सिंधिया के समीकरण गड़बड़ा गए हैं।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी 21 जुलाई को ग्वालियर आ रही है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस दौरे को लेकर जोश है। 2018 के विधानसभा चुनाव तो ठीक कमलनाथ सरकार जाने के बाद हुए उपचुनाव में भी क्षेत्र में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है। कांग्रेस इस सफलता को दोहराने की कोशिश कर रही है। यही कारण है कि कांग्रेस नेता उम्मीद कर रहे हैं कि प्रियंका गांधी का दौरा ग्वालियर क्षेत्र में बूस्टर की तरह काम करेगा। प्रियंका गांधी के दौरे का जितना इंतजार कांग्रेस को है उतनी ही बल्कि उससे ज्यादा बेसब्र बीजेपी है। बीजेपी प्रियंका के भाषण पर नजर रखे हुए है। इस नजर रखने के पीछे खास तरह की राजनीतिक रणनीति है।
असल, में कांग्रेस ने मिशन 2023 के लिए चुनाव अभियान का खाका तैयार कर लिया है। पिछले माह जबलपुर आई प्रियंका गांधी ने भ्रष्टाचार पर शिवराज सरकार को घेरा था। प्रियंका गांधी ने कहा था कि 'पीएम मोदी को दी गई गालियों से लंबी तो एमपी बीजेपी सरकार के घोटालों की लिस्ट है। तकरीबन हर महीने एक घोटाला हो ही रहा है। 220 माह में 225 घोटाले हुए हैं।' उसके बाद ही कांग्रेस ने बीजेपी को भ्रष्टाचार पर घेरना शुरू किया था। बीजेपी ने भी प्रियंका गांधी के इशारे के अनुसार कांग्रेस की तैयारी को भांपते हुए पहले ही पोस्टर वॉर शुरू कर दिया था।
अब भी बीजेपी टीम प्रियंका गांधी के दौरे पर नजर रखे हुए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद ये पहला मौका होगा जब गांधी परिवार का कोई सदस्य उस ग्वालियर चंबल में बड़ी सभा करेगा जो सिंधिया का गढ़ कहा जाता है। प्रियंका गांधी ने जबलपुर की रैली में भी सिंधिया पर निशाना साधते हुए जनता से अपील की थी कि इस बार गद्दारों को सबक सिखाएं।
बीजेपी में सिंधिया की स्थिति को देखते हुए उनके समर्थक कांग्रेस में वापसी कर रहे हैं। अब गढ़ में सिंधिया को आईना दिखाने के साथ ही यदि प्रियंका गांधी चुनाव के लिए कांग्रेस की कोई दिशा तय करती है तो बीजेपी की तैयारी है कि तुरंत हमलावर हो कर कांग्रेस के अभियान को कमजोर किया जाए। इसीलिए बीजेपी की टीम पूरी मालोअसबाब के साथ जवाबी हमले के तैयार है।
नरेंद्र सिंह तोमर कितना बिगाड़ेंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया का खेल?
लंबे समय से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की प्रदेश में वापसी के कयास लगाए जा रहे थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय नरेंद्र सिंह तोमर की जोड़ी को बीजेपी का शुभंकर माना जाता है। दोनों ने विधानसभा चुनावों में बेहतर तालमेल का प्रदर्शन किया है। माना जा रहा था कि चुनाव आते आते संगठन उन्हें फिर से प्रदेश की कमान सौंपेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
यह निर्णय प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वीडी शर्मा के लिए इस लिहाज से राहत भरा रहा कि फिलहाल उनकी कुर्सी को खतरा नहीं है। मगर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह को चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बना दिया है। उनकी आमद से खुद तोमर के समर्थक तो खुश हुए ही हैं, सीएम शिवराज खेमा भी राहत महसूस कर रहा है साथ ही नाराज बीजेपी के नेता भी खुश है।
नाराज बीजेपी यानी केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके समर्थकों को अधिक तवज्जो मिलने से हाशिए पर चले गए बीजेपी नेता। इन नेताओं की संख्या ग्वालियर क्षेत्र में ज्यादा है क्योंकि जयभान सिंह पवैया, प्रभात झा, अनूप मिश्रा, माया सिंह जैसे बड़े नेता जीवन भर सिंधिया और महल की राजनीति के विरूद्ध लड़े हैं। अब जब ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में आ गए हैं तो इन नेताओं के सामने धर्म संकट है। पार्टी के निर्णय का विरोध नहीं कर पाए ये नेता निष्क्रिय हो गए हैं।
इसके अलावा ग्वालियर क्षेत्र में वर्चस्व को लेकर खुद तोमर और सिंधिया भी आमने-सामने रहे हैं। बीजेपी ने सिंधिया की पसंद को ध्यान में न रखते हुए मंत्री तोमर के समर्थक को ग्वालियर शहर अध्यक्ष बनाया था। अब नाराज नेता खुश हैं कि केंद्रीय मंत्री तोमर के आने के बाद सिंधिया और उनके समर्थक संकट से घिरेंगे। सिंधिया सर्मथकों की जमावट पर असर तय है।
मध्य प्रदेश के हाथ से गई बीजेपी की कमान
बीजेपी का चुनाव अभियान दिलचस्प हो गया है। गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव की कमान अपने हाथ में ले ली है। नेतृत्व परिवर्तन का इंतजार कर रहे बीजेपी नेताओं को केवल इतनी राहत है कि अब कमान मध्य प्रदेश के नेताओं के हाथ में नहीं है। उन्हें बस इतनी ही राहत है, बाकि तो वरिष्ठ नेता इस बात से अफसोस जता रहे हैं कि संगठन की दृष्टि में जिस एमपी बीजेपी को देश का सबसे बेहतर संगठन बताया जाता रहा है,वही अब केंद्रीयकृत होती जा रही है।
एक दौर था जब एमपी बीजेपी के नेता केंद्रीय नेतृत्व को इंकार तक कर देते थे। एमपी बीजेपी के कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदरलाल पटवा जैसे नेताओं के रहते केंद्रीय संगठन एकतरफा कार्य नहीं कर पाता था। ऐसे नेताओं के जाने के बाद अब मध्य प्रदेश में केंद्रीय नेताओं का दखल बढ़ गया है।
अब जो केंद्रीय नेतृत्व ने पूरी तरह से एमपी बीजेपी पर नियंत्रण कर लिया है। दिल्ली से भेजे गए आधा दर्जन प्रभारी बीजेपी में विभिन्न दायित्व संभाल चुके हैं। टिकट वितरण ही नहीं, प्रचार-प्रसार का काम भी केंद्रीय नेतृत्व यानी गृहमंत्री अमित शाह के ही नियंत्रण में होगा। प्रदेश बीजेपी के नेताओं का दु:ख यह है कि वे असहाय हो कर आदेश मानने वाले कार्यकर्ता बन कर रहे गए हैं।
नर्मदा को रेत माफिया ने खत्म किया तो चुप क्यों उमा भारती?
पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के ट्वीट ने फिर राजनीति गर्मा दी है। उन्होंने एक के बाद एक ट़्वीट कर कहा है कि नर्मदाजी में सिंचाई, गोपालन और परिक्रमा का सतोगुण पर्यटन संभव है। क्रूज चलाने की सोच को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे क्योंकि नर्मदा जी सतोगुणी तरीके से भी बहुत रोजगार देती रही हैं और देती रहेंगी।
उमा भारती ने लिखा है कि नर्मदाजी को आधा तो अवैध उत्खनन ने निगल लिया है। अब और बची कसर क्या क्रूज से भी पूरी करे देंगे? यह विचारा हमारा तो हो ही नहीं सकता यदि यह कुविचार कुछ अधिकारियों के दिमाग में आया है तो इस सोच को ही हम जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। जब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती कह रही है कि आधी नर्मदा को रेत माफिया ने खत्म कर दिया है।
सवाल तो यह है है कि जब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को पता है कि रेत माफिया नर्मदा को खत्म कर रहे हैं, उसे निगल लिया है तो वे इस माफिया के खिलाफ अब तक चुप क्यों हैं? उमा भारती यूं भी निर्भिक नेता हैं, उन्हें किस बात का भय है? वे चाहती तो जब उन्हें पता चला कि तब ही रेत माफिया के खिलाफ मोर्चा खोल देती। वे इतने समय से चुप क्यों बैठी हैं और नर्मदा को छलनी क्यों होने दे रही हैं? या इस कहे के भी राजनीतिक निहितार्थ हैं।