मध्यप्रदेश की यह राजनीतिक तासीर तो है नहीं - मनोज कुमार

मध्यप्रदेश की यह राजनीतिक तासीर तो है नहीं – मनोज कुमार 11 दिसम्बर की तारीख मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए अहम तारीख थी. इस दिन डेढ़ दशक बाद सत्ता में परिवर्तन हुआ तो साथ में राजनीतिक बेचैनी का आभास भी हुआ. हालांकि मध्यप्रदेश की यह तासीर नहीं है कि निर्वाचित सरकार को बेदखल करने की […]

Publish: Feb-28, 2019, 04:33 PM IST

मध्यप्रदेश की यह राजनीतिक तासीर तो है नहीं - मनोज कुमार
मध्यप्रदेश की यह राजनीतिक तासीर तो है नहीं – मनोज कुमार
div class= moz-text-html lang= x-unicode div dir= ltr div dir= ltr h1 style= text-align: center मध्यप्रदेश की यह राजनीतिक तासीर तो है नहीं /h1 div - strong मनोज कुमार /strong /div div /div div style= text-align: justify 11 दिसम्बर की तारीख मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए अहम तारीख थी. इस दिन डेढ़ दशक बाद सत्ता में परिवर्तन हुआ तो साथ में राजनीतिक बेचैनी का आभास भी हुआ. हालांकि मध्यप्रदेश की यह तासीर नहीं है कि निर्वाचित सरकार को बेदखल करने की चर्चा आम हो जाए. वह भी तब यह जानते हुए कि ऐसा होना पाना मुमकिन भले ही ना हो लेकिन इस बैचेनी से प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बन जाने का अहसास तो हो रहा है. देश का ह्दयप्रदेश कहलाने वाले मध्यप्रदेश की राजनीतिक तासीर का जो स्वरूप आज देखने में आ रहा है वह बीते छह दशक की बात करें तो कभी ऐसा नहीं हुआ. यकीनन डेढ़ दशक के लम्बे राजकाज के बाद भारतीय जनता पार्टी का सत्ता से बेदखल हो जाना उन्हें रूचिकर नहीं लग रहा हो. और तब जब वे सरकार बनाने से चंद कदम की दूरी पर ठहर गए हों. लेकिन सच यह भी है कि कुछ कदम आगे चलकर डेढ़ दशकों से सत्ता से बाहर विपक्ष की भूमिका में बैठी कांग्रेस आज सरकार में है तो वह एकदम सहज नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि छह दशक के इस सफर में राज्य में निर्वाचित सरकारें भंग ना की गई हों या ऐसी कोशिशें ना हुई हो लेकिन जो भी ऐसे वाकये हुए वह परिस्थितिजन्य थे. लेकिन आज की हालात में सरकार गिराने की जो चर्चा एक आम है वह मध्यप्रदेश की राजनीतिक तासीर से मेल नहीं खाती है. मध्यप्रदेश को शांति का टापू शायद इसलिए भी कहा जाता है कि असहिष्णुता उसके राजनीतिक तासीर में शामिल ही नहीं है. यदि ऐसा होता तो स्मरण कीजिए कि बिना किसी हंगामे और हिंसा के छत्तीसगढ़ को शांतिपूर्वक पृथक राज्य का दर्जा दे दिया गया. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify बहुमत का सम्मान करना मध्यप्रदेश राजनीति में पक्ष एवं विपक्ष दोनों को बराबर से आता है लेकिन ऐसा इस बार क्या हुआ कि एक निर्वाचित सरकार के स्थायित्व को लेकर कयासों का बाजार गर्म है. 11 दिसम्बर को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से लगातार अधिक सीटों को लेकर बनी सरकार के गिर जाने की भविष्यवाणी की जाने लगी. हालांकि इसके आधार में कुछ भी नहीं है क्योंकि विपक्ष के पास भी इतनी सीटें नहीं है कि वह सरकार बनाकर वापस सत्तासीन हो सके. ऐसा लगता है कि देश के कुछेक राज्यों में जो जोड़तोड़ के साथ सरकार बनाने का उपक्रम चला उसकी परछाई मध्यप्रदेश में भी पड़ी है. एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनौती देने की असफल कोशिश भी इसे कह सकते हैं. पूर्ववर्ती अनुभव यह भी रहा है कि जिन निर्वाचित सरकारों को एकाधिबार भंग करने की नौबत आयी तो वह कानूनसम्मत था. स्थितियों को काबू में करने के लिए ऐसे फैसले लिए गए. लेकिन ताजा स्थितियों में ऐसा कुछ भी नहीं है कि सरकार को पदच्युत किया जाए. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify यहां स्मरण रखा जाना चाहिए कि लगातार 15 वर्षों तक मध्यप्रदेश में पहली बार किसी विपक्षी दल ने राज किया. इसमें भी लगातार 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री बने रहने का श्रेय शिवराजसिंह चौहान को जाता है. इनके पहले कांग्रेस के दिग्विजयसिंह एकमात्र मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने 10 साल तक मुख्यमंत्री बने रहने का गौरव हासिल किया था. हालांकि मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री भी बने और 15 दिनों के कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री का नाम मध्यप्रदेश की राजनीतिक इतिहास में दर्ज है. एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनने वाले अर्जुनसिंह थे जिन्हें सत्ता सम्हालने के दूसरे दिन ही पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया था तो 15 दिन वाले मुख्यमंत्री राजा नरेशचंद्र थे जिन्हें संविद शासन के समय यह अवसर मिला था. मध्यप्रदेश की सत्ता में वह दौर भी आया जब जनता पार्टी ने शासन किया लेकिन सभी का कार्यकाल संक्षिप्त रहा. श्यामाचरण शुक्ल अर्जुनसिंह मोतीलाल वोरा कांग्रेस के उन मुख्यमंत्रियों में रहे जिन्हें एक से अधिक बार सत्ता सम्हालने का अवसर मिला तो विपक्ष से सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी के बाद शिवराजसिंह चौहान को तीन बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला था. 2003 मध्यप्रदेश की राजनीति में इसलिए भी स्मरण में रखा जाएगा कि इस साल मध्यप्रदेश में विपक्ष ने न केवल भारी बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही. पहली बार महिला मुख्यमंत्री के रूप में विधानसभा चुनाव में भाजपा का परचम लहराने वाली उमा भारती ने शपथ ली. 70 के दशक में मध्यप्रदेश की सत्ता में काबिज होने वाली विपक्षी दल जनता पार्टी थी तो बाद के दशक में यही दल भारतीय जनता पार्टी में हस्तांतरित हो गई. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify 1993 में कांग्रेस का शासन था और दिग्विजयसिंह अपने नाम के अनुरूप दिग्विजयी मुख्यमंत्री बनें. 1998 के चुनाव में यह कयास लगाया जाने लगा था कि इस बार दिग्विजयसिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सत्ता में वापसी नहीं होगी तब दिग्विजयसिंह बहुमत के साथ सरकार में आए. लेकिन 2003 में विधानसभा चुनाव परिणाम की कल्पना किसी ने नहीं की थी. कांग्रेस का सूपड़ा साफ करते हुए भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में काबिज हो गई. कांग्रेस की पराजय को एंटीइंकबेंसी करार दिया गया. खैर भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं उमा भारती एक साल ही मुख्यमंत्री रह पाईं और दूसरे साल भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बनाये गए. एक वर्ष पूरा करते ना करते उन्हें भी रवाना कर दिया गया और शिवराजसिंह चौहान 2005 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनें. 2008 का चुनाव शिवराजसिंह की अगुवाई में लड़ा गया और भाजपा एक बार फिर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी. भाजपा की जीत के साथ कांग्रेस हाशिये पर जाती रही क्योंकि 2013 के चुनाव में कयास लगाया गया था कि 10 साल की सत्ता विरोधी लहर है और भाजपा के हिस्से में पराजय आएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. शिवराजसिंह की अगुवाई में फिर भाजपा सत्ता में थी और शिवराजसिंह का जादू सिर चढक़र बोल रहा था. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify भाजपा के बढ़ते ग्राफ के कारण राजनीतिक विश£ेषकों ने यह मान लिया था कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी लगभग ना के बराबर है. ऐसे में कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई. इसी के साथ अलसायी सी कांग्रेस में ऊर्जा आ गई. जमीनी स्तर पर कांग्रेस सक्रिय हो गई और दिग्विजयसिंह समन्वयक की भूमिका में दिखने लगे. ना तो चुनाव लडऩे की मंशा दिखाई और ना हस्तक्षेप किया लेकिन सक्रियता पर्दे के पीछे थी. इधर भाजपा भी सक्रिय थी और शिवराजसिंह का जादू खत्म नहीं हुआ था. टक्कर कांटे की थी और 11 दिसम्बर को जो परिणाम आया उसमेंं शिवराजसिंह सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का कोई बड़ा असर नहीं दिखा लेकिन मंत्री-विधायकों के प्रति उपजे असंतोष ने भाजपा को जीत से कुछ कदम पहले रोक दिया. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify इस परिणाम के बाद राजनीतिक बैचेनी बढ़ गई. कर्नाटक गोवा और दूसरे राज्यों में जिस तरह सत्ता समीकरण बदले या बदलने की कोशिश हुई वह कवायद मध्यप्रदेश में किए जाने का अनुमान लगाया जाने लगा या लगाया जा रहा है. कांग्रेस को लंगड़ी सरकार का संबोधन दिया गया और उम्मीद जाहिर की गई कि यह सरकार कभी भी गिर सकती है लेकिन कैसे इस पर कोई चर्चा या विश£ेषण पढऩे में नहीं आया. इसे हवा में लढ्ढ चलाना मान सकते हैं. राज्य में कांग्रेस की नाथ सरकार गिरेगी या नहीं यह कोई पक्के तौर पर नहीं कह पा रहा है क्योंकि एक निर्वाचित सरकार को अकारण गिरा पाना थोड़ा मुश्किल सा ही है. लेकिन इस चर्चा और अनुमानों के बाजार से आम आदमी में बैचेनी है. वह अकुलाहट और कहीं कहीं बौखलाहट के साथ अनिश्चिय की स्थिति में है. प्रशासनिक तंत्र में भी बैचेनी का माहौल है. क्या करें और क्या ना करें कि हालात बन चुका है और प्रशासनिक कसावट तो दिख रही है लेकिन परिणामोन्नुमुखी तंत्र की रफ्तार अपेक्षित धीमा है. बदलाव की जो परिदृश्य बनना चाहिए था अब तक नहीं बन पाया है. हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और उनके कद्दावर नेता एकाधिक बार कह चुके हैं कि उनकी रूचि नाथ सरकार को गिराने की नहीं है. इसके बावजूद आश्वस्ति का कोई मुकम्मल चेहरा देखने को नहीं मिल रहा है. इसके पीछे भी अखबारों की हेडलाइंस बनती वो खबरें भी हैं जो कांग्रेस के मतभेद को सामने ला रही हैं. मंत्रियों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करने के बाद जो मतभेद की स्थिति बनी है उससे सरकार की छवि को आंशिक नुकसान तो हो रहा है. इधर ताजा खबरों में इस बात की चर्चा है कि उनके विश्वस्त सलाहकार मिगलानी श्रीवास्तव और गुप्ता इस्तीफा देकर लोकसभा के लिए दावेदारी करने जा रहे हैं. इन्हें चुनाव लडऩा ही था तो सलाहकार बनने या नियुक्त होने के पहले ऐसा फैसला लिया जाना राज्य सरकार और कांग्रेस के हित में होता. इससे भी राजनीतिक हवा गर्म हो जाती है. /div div style= text-align: justify /div div style= text-align: justify 15 वर्षों के लम्बे सत्ता सुख के बाद सत्ता से बेदखल होने की अपनी पीड़ा हो सकती है लेकिन 15 वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद सत्तासीन हो जाने का सुख प्राप्त करने के लिए कांग्रेस को अभी लम्बा इंतजार करना होगा. पहले कांग्रेस को इस बात को स्थापित करना होगा कि वह स्थायी सरकार देने में सक्षम है और जनकल्याणी सरकार की भूमिका में रहेगी. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और प्रदेश कांग्रेस के मुखिया के नाते कमल नाथ टारगेट लेकर चल रहे हैं. इस टारगेट को हासिल कर लिया तो मध्यप्रदेश की राजनीतिक हवा ठंडी हो चलेगी. इस बात को जस का तस मान लेना चाहिए कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक तासीर ऐसी नहीं है कि निर्वाचित सरकार को अकारण गिराया जाए और जो बयानबाजी हो रही है उसे राजनीतिक मानकर अनदेखा किया जा सकता है. कशकमश बेचैनी और बौखलाहट से गर्म होती हवा के लिए बस दो महीने की प्रतीक्षा करनी होगी. /div /div /div /div