खरीफ सीजन में पैतृक बीज के सत्यापन की दोबारा बढ़ी अवधि, विवादों में घिरा राज्य सरकार का आदेश

मध्यप्रदेश राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था ने खरीफ सीजन 2021 के अंतर्गत समस्त फसलों के पैतृक बीज के प्रमाणीकरण की अवधि 20 जुलाई तक बढ़ा दी है, जिस वजह से संस्था का यह आदेश विवादों में घिर गया है

Updated: Jul 14, 2021, 11:34 AM IST

खरीफ सीजन में पैतृक बीज के सत्यापन की दोबारा बढ़ी अवधि, विवादों में घिरा राज्य सरकार का आदेश

भोपाल। खरीफ सीजन की प्रमुख फसल सोयाबीन की बुआई हुए एक महीने का समय बीतने को आया है। लेकिन मध्य प्रदेश राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था ने इसके पैतृक बीज के लिए भौतिक सत्यापन की अवधि को बढ़ाकर 20 जुलाई कर दिया है। संस्था के एमडी का दावा है कि ये सभी खरीफ फसलों के लिए है लेकिन डिमांड सिर्फ सोयाबीन के पैतृक बीज का दिखाया गया है। विवाद इसलिए है क्योंकि दावे और हकीकत एक दूसरे से मेल नहीं खाते।  

मध्यप्रदेश बीज प्रमाणीकरण संस्था के उपरोक्त आदेश के मुताबिक जिन बीज उत्पादक संस्थाओं ने पैतृक बीज का भौतिक सत्यापन अब तक नहीं कराया है, उन्हें 20 जुलाई तक का और समय दिया गया है। राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था ने अपने आदेश में इस बात का ज़िक्र किया है कि बीज उत्पादक संस्थाओं के अनुरोध के बाद ही पैतृक बीज के प्रमाणीकरण की अवधि को बढ़ाया गया है। गौरतलब है कि पैतृक बीज के सत्यापन हेतु केवल रतलाम स्थित सागर एग्रो इनपुट्स और जबलपुर स्थित हरिओम सीड्स नामक बीज उत्पादक संस्था ने ही अनुरोध किया था। दोनों पत्रों में सोयाबीन के बीज हेतु प्रमाणीकरण अवधि की छूट मांगी गई है और एमडी साहब कह रहे हैं कि आदेश सोयाबीन के लिए नहीं है। 

क्यों विवादों में है आदेश? 

राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा बीज उत्पादक संस्थाओं को दी गई यह छूट विवाद का कारण इसलिए बनी है क्योंकि खरीफ की फसल की बुआई एक महीने पहले ही समाप्त हो चुकी है। हम समवेत ने इस बाबत जब राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था के एमडी केएस टेकाम से बात की तो उन्होंने बताया कि "हमने बीज उत्पादक संस्थाओं के अनुरोध के बाद ही भौतिक सत्यापन की अवधि बढ़ाई है। बीज सत्यापन की अवधि बढ़ाने का अनुरोध करने वाली बीज उत्पादक संस्थाओं ने कोरोना का हवाला देकर अवधि बढ़ाए जाने की मांग की थी। जिसके बाद हमने भौतिक सत्यापन की अवधि बढ़ाई है।" लेकिन 

केएस टेकाम से जब हमने पूछा कि जब खरीफ सीजन की प्रमुख फसल सोयाबीन की बुआई हुए एक महीने का समय बीतने को आया है, तब सोयाबीन के पैतृक बीज का सत्यापन कैसे किया जाएगा? इस सवाल के जवाब में उन्होंने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि "आदेश को लेकर भ्रम इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि इसमें समस्त फसलों की बात कही गई है।" टेकाम ने कहा कि सोयाबीन के पैतृक बीज का सत्यापन पहले ही किया जा चुका है। अरहर, उड़द इत्यादि फसलों के पैतृक बीज का सत्यापन किया जाना बाकी है। टेकाम ने कहा कि आदेश से पैदा हुई भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए जल्द ही राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था फसलवार तरीके से आदेश निकालने वाली है।

संस्था के आदेश का बचाव करते हुए एमडी टेकाम कहते हैं कि "आदेश में सोयाबीन की फसल का कहीं भी उल्लेख नहीं है। यह आदेश दूसरी फसलों के पैतृक बीज के सत्यापन के लिए है, जिनकी बुआई अभी जारी है।" लेकिन मध्य प्रदेश में खरीफ की ंमुख्य फसल सोयाबीन ही है जो लाखों हेक्टेयर ज़मीन पर पैदा की जाती है, ऐसे में सोयाबीन की अनदेखी कर अन्य फसलों के पैतृत बीज के लिए समयावधि बढ़ाने की दलील किसानों के गले नहीं उतर रही।

आदेश पर क्या कहते हैं कृषि जानकार 

हम समवेत ने जब पैतृक बीज के सत्यापन के लिए आवेदन करने वाली संस्था हरिओम सीड्स और सागर एग्रो इनपुट्स से संपर्क करना चाहा तो कोई जवाब नहीं हासिल हो सका। राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था के इस आदेश पर कृषि जानकार केदार शंकर सिरोही कहते हैं कि जब सत्यापन की अवधि बढ़ाने के लिए केवल दो समितियों ने ही अनुरोध किया था तब आदेश को सभी संस्थाओं के लिए किस आधार पर ओपन कर दिया गया। वह भी तब जब खुद राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था को यह मालूम है कि सभी जगह फसल की बुआई हो चुकी है। सिरोही ने आगे कहा कि मध्य प्रदेश के किसानों को बर्बाद करने में बीज प्रमाणीकरण संस्था का हाथ रहा है। उन्होंने इसकी CBI जाँच की मांग कर दी। 

सिरोही ने कहा कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर निष्पक्ष जाँच हो जाए तो प्रमाणीकरण में ड्राइवर के अलावा कोई भी नहीं बचेगा। यहां पर खुलेआम हेराफरी होती है जिसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ रहा है। इस विभाग पर बड़े अधिकारियों के साथ मंत्री की छतरी लगी होती है जिस कारण कंपनियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

बीते साल राज्य में सोयाबीन की फसल खराब हो गई थी और इसकी बीमा राशि करीब 5000 करोड़ से ज्यादा की बनी है। और अब इस साल सरकारी कदमों ने किसानों के बीच बेहद निराशा का भाव पैदा किया है। नकली बीज और बीज की गुणवत्ता घटाने के विवादों के बीच यह आदेश एक और प्रयास लगता है कि किसान सोयाबीन से दूर हो जाएं। आंकड़ों के मुताबिक एमपी में अबतक 60 से 65 लाख हेक्टेयर जमीन पर सिर्फ सोयाबीन की खेती होती रही है तो सवाल उठता है कि सोयाबीन की अनदेखी कर दूसरी फसलों के लिए सरकार इतनी चिंतित क्यों हो रही है।

गुजरात और राजस्थान से बड़ी मात्रा में लाए जा रहे हैं पैतृक बीज 

इस पूरे विवाद के इतर मध्यप्रदेश में पड़ोसी राज्यों राजस्थान और गुजरात से बड़ी मात्रा में सोयाबीन के पैतृक बीज भी लाए जा रहे हैं। जिस वजह से बीज उत्पादक संस्थाओं की मंशा सवालों के घेरे में आ गई है। केदार शंकर सिरोही ने कहा है कि मध्य प्रदेश सोया स्टेट कहा जाता है और यहाँ बीज उत्पादक संस्थाएं/कम्पनियों द्वारा पैतृक बीज गुजरात और राजस्थान से बड़ी मात्रा में लाया जा रहा है जो शंका पैदा करता है। मुख्यमंत्री को इसकी जाँच निष्पक्ष संस्था द्वारा करना चाहिए।