टाइगर स्टेट में चीतों की एंट्री: कूनो में आसान नहीं नामीबियाई चीतों का बसर, इंसानों से संघर्ष बड़ी चुनौती

पूर्व डकैत रमेश सिंह सिकरवार बनाए गए हैं चीता मित्र, वन क्षेत्र के बाहर स्थानीय लोगों को जागरूक करने के लिए चौपाल लगाकर चीता मित्र कैंपेन में दे रहे हैं जानकारी

Updated: Sep 17, 2022, 08:53 AM IST

टाइगर स्टेट में चीतों की एंट्री: कूनो में आसान नहीं नामीबियाई चीतों का बसर, इंसानों से संघर्ष बड़ी चुनौती

श्योपुर। "टाइगर स्टेट" मध्य प्रदेश में चीतों की एंट्री की तैयारियां पूरी हो चुकी है। शनिवार को पांच मादा और तीन नर अफ्रीकी चीते 20 घंटे की यात्रा तय करके ग्वालियर पहुंचेंगे। यहां से उन्हें कूनो अभ्यारण्य में ले जाकर छोड़ा जाएगा। बीजेपी सरकार द्वारा इसे "मेगा इवेंट" बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा जा रहा है। हालांकि एक्सपर्ट्स कूनो के जंगलों में चीतों के गुजर बसर को लेकर आशंकित हैं। सबसे बड़ा चैलेंज ग्रास लैंड को लेकर है। चीतों की रफ्तार में पेड़ बाधा बनेंगे क्योंकि विस्तृत ग्रास लैंड में ही चीते अपना शिकार करते हैं। उनकी रफ्तार और शिकार ही आकर्षण है जिसके लिए सैलानी उन्हें देखने जाते हैं। ऐसे में चीतों के शिकार और रफ्तार दोनों की समस्या बड़ी चुनौती बन सकती है। 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि एमपी में नामीबियाई चीतों को पग पग पर खतरों का सामना करना होगा। चीता अच्छा शिकारी है और उसकी रफ्तार का कोई सानी नहीं। लेकिन एक्सपर्ट्स इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर इन चीतों का ही शिकार हो गया तो? मध्य प्रदेश में पशु तस्करों के कारनामे किसी से छिपे नहीं हैं। टाइगर स्टेट में हर वर्ष दर्जनों बाघों की संदिग्ध मौत होती है। ऐसे में इन तस्करों से चीतों को बचाए रखना बड़ी चुनौती होगी।

चीतों के साथ दुनिया की टॉप एक्सपर्ट्स में शुमार डॉक्टर लॉरी मार्कर भी भारत आ रही हैं। उन्होंने भी इस बात को स्वीकार किया है कि भारत में मानव-पशु संघर्ष यानी Man-Animal Conflict का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती होने वाली है। सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज के डायरेक्टर उल्लास कारंथ ने भी इस प्रोजेक्ट को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अचानक से चीतों को इंसानों के बीच जंगल में लाकर छोड़ा जा रहा है। पिछले 70 साल में इंसानी आबादी लगातार बढ़ी है और जंगल का विस्तार घटता गया है। चीते ऐसे जानवर हैं जिन्हें सिर्फ कूनो में बांधकर नहीं रखा जा सकता है। जंगल के बाहर उनके लिए हर वक्त खतरा घात लगाए बैठा है।'

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कारंथ ने कहा कि, 'अगर वे रास्ता भटककर कहीं दूर निकल गए तो मुश्किल हो सकती है। उनपर 24 घंटे निगरानी रखना बड़ी चुनौती होगी। अगर चीते शिकार होने से बच भी गए तो भूख से मरने का खतरा बना रहेगा। तेंदुए जैसे जानवर हमेशा घात लगाए रहेंगे। क्योंकि जंगली जानवर अपने क्षेत्र में किसी प्रकार की चुनौती को खड़े होते देखना पसंद नहीं करते हैं। तेंदुए, लकड़बग्घे हमेशा फिराक में होते हैं और मौका पाते ही चीतों को मार डालते हैं।'

एक्सपर्ट्स के अनुसार जब चीते शावक होते हैं तो उन्हें जंगली कुत्ते तक खा जाते हैं। 90 फीसदी से ज्यादा चीते बचपन में ही जंगल में मार दिए जाते हैं। और 70 प्रतिशत चीते 3 महीने की उम्र तक पहुंचने से पहले ही मार दिए जाते हैं। इनकी आबादी कम होने की एक बड़ी वजह यह भी है। ऐसे में कूनो में आबादी बढ़ाना चीतों के लिए आसान नहीं होगा।

एक्सपर्ट्स की मानें तो चीतों को बसाने के लिए कम से कम 25-30 नर और मादा चीतों का होना जरूरी है। सरकार का तर्क है कि अगले पांच साल में और चीते नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए जाएंगे। एक बार चीते यहां सही तरीके से बस गए तो प्रजनन के जरिए धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ेगी। बता दें कि कूनो के जंगल को चीतों के लिए नेचुरल हैबिटेट भी नहीं है। चीते सिर्फ ग्रासलैंड में ही रह सकते हैं।

इधर प्रशासन द्वारा "चीता मित्र" नाम का एक कैंपेन भी लॉन्च किया गया है। इसके तहत बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की नियुक्ति की जा रही है। इनका काम 24 घंटे चीतों पर नजर रखना होगा। उन्हें 8-8 घंटे की ड्यूटी बांटी जाएगी। अधिकारी उन्हें स्थानीय भाषा में ट्रेनिंग दे रहे हैं।