चार हजार साल पहले भी लोग खाते थे लड्डू, हड़प्पा सभ्यता की खुदाई स्थल से मिले लड्डुओं से हुआ खुलासा

चार साल पहले हड़प्पा संस्कृति की खुदाई में मिले 7 लड्डुओं पर रिसर्च हुई पूरी, वैज्ञानिकों ने कहा ये मल्टीग्रेन लड्डू हैं, इनमें जौ, गेहूं, छोले, मूंग और तिलहनों के मिले प्रमाण

Updated: Mar 27, 2021, 07:43 PM IST

चार हजार साल पहले भी लोग खाते थे लड्डू, हड़प्पा सभ्यता की खुदाई स्थल से मिले लड्डुओं से हुआ खुलासा
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लखनऊ। बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पलायोसाइंसेज, लखनऊ (बीएसआईपी) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के वैज्ञानिकों ने पश्चिमी राजस्थान के हड़प्पा खुदाई स्थल पर सात लड्डू जैसी आकृतियां के बारे में चौकाने वाले खुलासे किए हैं। उनका कहना है कि चार हजार साल पहले भी लोग लड्डुओं का उपयोग करते थे। इन लड्डुओं में जौ, गेहूं, छोले, मूंग और तिलहनों के होने के प्रमाण मिले हैं। इनमें कई मिनरल्स भी पाए गए हैं। दरअसल साल 2014 और 2017 के बीच पश्चिमी राजस्थान के बिंजोर जो में खुदाई हुई थी।

यह स्थान पाकिस्तान बार्डर के पास है। वहां हड़प्पा पुरातात्विक स्थल की खुदाई के दौरान सात लड्डुओं के बारे में पता चला था। जिसके बारे में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पलायोसाइंसेस सीनियर साइंटिस्ट राजेश अग्निहोत्री का कहना है कि यहां साल समान बड़े आकार के भूरे रंग के लड्डू मिले थे। यहीं से बैल की दो मूर्तियां और एक हाथ से पकड़े गए तांबे का एक कुल्हाड़ी के समान एक उपकरण मिला था। जिसे अज कहा जाता है। इसे लकड़ियां काटने और उसे आकार देने में काम में लाया जाता है।  

वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां मिले लड्डुओं में मूंग दाल की मात्रा भी देखने को मिली है। वैज्ञानिकों ने मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटेशियम भी पाया है। इन लड्डुओं में दालों, स्टार्च और प्रोटीन की उपस्थिति की पुष्टि हुई है। इनका परीक्षण जैविक भू-रसायन और बाद में लखनऊ में BSIP और राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI) द्वारा किया गया था। दोनों संस्थानों के नौ वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों की एक टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि हड़प्पा संस्कृति में विशिष्ट उपकरणों के साथ मिले ये लड्डू संभवत: प्रसाद के तौर पर बनाए गए होंगे। इसलिए उनकी मात्रा 7 मिली है। ये लड्डू पानी के संपर्क में आने की वजह से बैंगनी हो गए हैं।

करीब 2600 ईसा पूर्व के बने ये लड्डू  संरक्षित मिले हैं। इनपर कोई कठोर चीज गिर गई थी। मजबूत संरचना से ढ़के होने की वजह से वह उनके लिए छत का काम कर रही थी। जिसकी वजह से लड्डू टूटे नहीं और साबुत मिले हैं। कीचड़ में मिल जाने की वजह से इनमें पाया जाने वाला आंतरिक कार्बनिक पदार्थ संरक्षित रहा। केवल उनका रंग बदल गया। लड्डू में मूंग दाल का हरा रंग घटक की वजह से यह संरक्षित रहे। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन लड्डुओं  में खास बात यह नजर आई की पानी के संपर्क में आने पर ये बैंगनी रंग के हो गए। जिसे देखकर पहले तो लगा था कि यह नॉनवेज खाना रहा होगा। बाद में BSIP के वरिष्ठ वैज्ञानिक अंजुम फारूकी ने इसकी बारीकी से जांच की जिसमें पाया गया कि ये लड्डू जौ, गेहूं, छोले, मूंग और कुछ अन्य तिलहनों से बनाए गए थे।

दरअसल शुरुआती सिंधु घाटी के लोग किसानी करते थे। वे मुख्य रूप से शाकाहारी वस्तुओं का सेवन करते थे। इसलिए उन्होंने इन लड्डुओं को बनाया होगा। इन लड्डुओं में मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटेशियम स्टार्च और प्रोटीन की उपस्थिति की पुष्टि की गई। माना जा रहा है कि हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने प्रसाद बनाया होगा, इस्टेंट एनर्जी के लिए खाने के रूप में मल्टी ग्रेन कॉम्पैक्ट लड्डू बनाया होगा। इन सात खाद्य पदार्थो के आसपास के क्षेत्र में बैल की मूर्तिया, श्रृंगार और एक हड़प्पा की सील की मौजूदगी इस बात की पुष्टि  करती है कि तब के लोग इन सभी वस्तुओं को की पूजा करते रहे होंगे।