पक्षपातपूर्ण विचार से लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है मीडिया, CJI रमना की तल्ख टिप्पणी

मीडिया के गिरते स्तर पर CJI रमना की तल्ख टिप्पणी, बिना जांचे परखे मीडिया चला रहा है कंगारू कोर्ट, प्रिंट मीडिया में अभी भी कुछ हद तक जवाबदेही है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शून्य जवाबदेही है

Updated: Jul 23, 2022, 03:19 PM IST

पक्षपातपूर्ण विचार से लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है मीडिया, CJI रमना की तल्ख टिप्पणी

नई दिल्ली। भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमना शनिवार को अपने एक दिवसीय दौरे पर झारखंड पहुंचे। यहां एक कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया के गिरते स्तर पर नाराजगी जताई। चीफ जस्टिस ने रांची में कहा कि हम देख रहे हैं कि मीडिया द्वारा कंगारू कोर्ट चलाया जा रहा है। इसके चलते कई बार तो अनुभवी न्यायाधीशों को भी सही और गलत का फैसला करना मुश्किल हो जाता है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि, 'गलत जानकारी और एजेंडा से चलने वाली डिबेट लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित होती हैं। मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे पक्षपातपूर्ण विचार लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं और सिस्टम को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अपनी जिम्मेदारी से भागकर आप हमारे लोकतंत्र को दो कदम पीछे ले जा रहे हैं।'

जस्टिस रमना ने आगे कहा कि, 'प्रिंट मीडिया में अभी भी कुछ हद तक जवाबदेही है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जवाबदेही शून्य है। सोशल मीडिया का हाल और बुरा है। न्यू मीडिया टूल्स में व्यापक विस्तार करने की क्षमता होती है, लेकिन वे सही और गलत, अच्छे और बुरे और असली और नकली के बीच अंतर करने में असमर्थ होते हैं। न्यायाधीशों के खिलाफ सोशल मीडिया में सक्रियता से कैम्पेन चल रहे हैं। न्यायाधीश तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सकते हैं। कृपया इसे कमजोरी या लाचारी समझने की गलती ना करें।'

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न्यायिक ढांचे को सुधारने की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि, 'लोग अक्सर लंबे समय से लंबित मामलों की शिकायत करते हैं। कई मौकों पर खुद मैंने लंबित मामलों के मुद्दों को उजागर किया है। मैं न्यायाधीशों को उनकी पूरी क्षमता से कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए भौतिक और व्यक्तिगत दोनों तरह के बुनियादी ढांचे को सुधारने की जरूर की पुरजोर वकालत करता हूं। लोगों ने एक गलत धारणा बना ली है कि जजों का जीवन बहुत आसान है। इस बात को निगलना काफी मुश्किल है।'

उन्होंने आगे कहा कि, 'इन दिनों हम न्यायाधीशों पर शारीरिक हमलों की बढ़ती संख्या देख रहे हैं। बिना किसी सुरक्षा या सुरक्षा के आश्वासन के न्यायाधीशों को उसी समाज में रहना होगा, जिस समाज में उन्होंने लोगों को दोषी ठहराया है। लोकतांत्रिक जीवन में न्यायाधीश का स्थान विशिष्ट होता है। वह समाज की वास्तविकता और कानून के बीच की खाई को पाटता है, वह संविधान की लिपि और मूल्यों की रक्षा करता है।'