BJP Politics : प्रतिप्रश्‍न उत्तर नहीं होता

मुख्य बात यह है कि मूल सवालों या समस्याओं से ध्यान बंटाने वाली कबूतरी संस्कृति अपनाने से किसी को भी लाभ नहीं होगा।

Publish: Jul 01, 2020 09:59 PM IST

BJP Politics : प्रतिप्रश्‍न उत्तर नहीं होता
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जैसे दीवारों को खा जाती है नोना (नमक भरी सीलन)

व्यथा धैर्य को खा जाती है।

इससे बचना कठिन दिखाई देता है। - त्रिलोचन

भारतीय राजनीति का वर्तमान स्वरूप बेहद बचकाना नजर आ रहा है। चीन-भारत सीमा विवाद को लेकर विपक्ष खासकर, राहुल गांधी द्वारा पूछे जा रहे सवालों और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की टिप्पणियों के जवाब यह बता रहे हैं कि, देश में तार्किक बहस की संभावनाओं को जानबूझकर खत्म किया जा रहा है। हम सभी जानते हैं कि किसी प्रश्‍न का उत्तर प्रतिप्रश्‍न नहीं हो सकता। परन्तु आज यही हो रहा है। चीन द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे की जानकारी चाहने का जवाब यह तो कतई नहीं हो सकता कि राजीव गांधी फाउंडेषन ने चीन से चंदा लिया था। अब तो यह भी सामने आ रहा है कि प्रधानमंत्री केयर फंड में चीनी कंपनियों ने बड़ी मात्रा में आर्थिक योगदान दिया है। मुख्य बात यह है कि मूल सवालों या समस्याओं से ध्यान बटाने वाली कबूतरी संस्कृति अपनाने से किसी को भी लाभ नहीं होगा। चीन नामक बिल्ली का मुकाबला खुली आँखों से ही किया जा सकता है।

भारतीय राजनीति में जो कुछ चल रहा है, उसे समझते हुए, अपने काॅलेज के दिनों में प्रचलित एक चुटकुला याद हो आया। हम लोग इसे दुनिया का सबसे घटिया चुटकला कहते थे। इसे एक बेतुका, असंगत व विवेकहीन चुटकुला भी कह सकते हैं। यह कुछ इस प्रकार है, ‘‘एक व्यक्ति सुबह-सुबह मुॅंह अंधेरे घूमने जा रहा था। एकाएक उसने धुंधलके में देखा कि एक आदमी अपनी साइकिल की चेन चढ़ा रहा है। पहले व्यक्ति ने दूसरे से पूछा, क्यों भाई इतनी सुबह? साइकल ठीक करते हुए व्यक्ति ने झुंझलाते हुए जवाब दिया, तो क्या हुआ पिछले साल तेरी लड़की की भी तो भाग गई थी। अब इस पूरे वार्तालाप में कहीं कोई संगति दिखती है? बात पूछी जा रही है, वर्तमान में चीन द्वारा की गई घुसपैठ की और जवाब में सन् 1962 की याद दिलाई जा रही है।
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बात इतनी सी ही नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि राजनीतिक तौर पर जोखिम उठाने और सच्चाई का सामना करने के साथ ही साथ जनता पर विश्‍वास करने में भी सत्ता पक्ष को डर लगता है और इस डर के पीछे राजनीतिज्ञों का लोकतंत्र पर घटता विश्‍वास है। न मालूम क्यों इक्कीसवीं शताब्दी के अधिकांश राजनीतिज्ञों को आम जनता से डर लगने लगा है। वे यह भूल रहे हैं कि तानाशाही का मुकाबला तानाशाही या अघोषित तानाशाही से नहीं किया जा सकता। तानाशाही को सिर्फ और सिर्फ लोकतंत्र ही पराजित कर सकता है। चीन में तानाशाही है इसलिए वह हमला करने में नहीं सकुचाया। परन्तु दूसरी तरफ हमें यह भी देखना होगा कि भारत में लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति क्या है? कैसी है? गौरतलब मई के पहले हफ्ते से प्रारंभ हुई घुसपैठ को अकारण छुपाया गया। यह एक ऐसा रहस्य बन गया जिसकी सूचना आम थी। तमाम सारे समाचार माध्यम व सेटेलाइट छवियां बता रहे थे कि घुसपैठ हो रही है, परन्तु अधिकारिक तौर पर उसे नकार दिया गया। आज हम निगरानी के ऐसे युग में रह रहे हैं जहां जासूसी सेटेलाइट यह तक बता सकते हैं कि हमने अपनी रसोई में छौंक सरसों से लगाई है या राई से, तो ऐसे समय में कुछ भी छुपाने का क्या अर्थ है?

परन्तु राजनीतिज्ञों व नौकरशाहों की अपनी ही दुनिया है, अपने ही तर्क हैं और हमें उन्हें स्वीकारना ही होता है। चीन-भारत का यह गतिरोध किस स्तर पर पहुंचेगा यह अंदाजा लगाना अभी कठिन है। साथ ही इस घटना के पीछे चीन के क्या निहितार्थ है, यह भी अभी तक स्पष्ट नहीं हैं। कुछ मामलों, खासकर पड़ोस से संबंधों को लेकर भारत व चीन में काफी समानता भी है। चीन के अधिकांश पड़ोसी उसकी विस्तारवादी नीतियों से त्रस्त हैं। वहीं दूसरी ओर भारत की नीतियां कभी भी विस्तारवादी नहीं रहीं, इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से हमारे संबंध पड़ोसियों से बहुत अच्छे नहीं रह पा रहे हैं। नेपाल इसका नवीनतम उदाहरण है। इस अविश्‍वास की नींव हमारी आंतरिक राजनीति की वजह से डली है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का आपसी व्यवहार बेहद अशालीन नजर आता है, भाषा और व्यवहार दोनों स्तर पर। यह अजीब बात है कि विपक्ष की शालीन टिप्पणी का जवाब अक्सर अशालीन ढंग से दिया जाने लगा है।

हमें याद करना होगा कि चीन ने पिछले चार दशकों से भी ज्यादा से किसी भी प्रकार के युद्ध में भागीदारी नहीं की है। वहीं न चाहते हुए भी भारत को कम से कम तीन युद्धों का सामना इस अवधि में करना पड़ा है और उसमें से एक तो सियाचीन में लड़ा गया है जो कि वर्तमान घुसपैठ स्थल के कमोबेश समकक्ष ही बैठता है। यहीं पर यह उल्लेख करना भी आवश्‍यक है कि युद्ध के उन दिनों में लोकतंत्र को अधिक मजबूत बनाने के प्रयत्न किए गए थे। आज सरकार बिला वजह सारे मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्‍न बना रही हैं। इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा।

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हमें समझना होगा कि युद्ध मानव सभ्यता के लिए कोई नई चीज नहीं है। छोटे रूप में इसकी शुरुआत (ऐतिहासिक तथ्यों के हिसाब से) ईसा पूर्व 7000 से 5000 के बीच यानी करीब 10 हजार वर्षों पहले पश्चिमी एशिया में हुई थी। तब कुछ घुमंतु शिकारियों ने आदिम कृषि क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया और वहां स्थायी निवास की शुरूआत कर दी। वहां पर ऐसे लोग बसे हुए थे, जो जुताई करना जानते थे। घुमंतु शिकारियों ने उन उपजाऊ जमीनों और खाद्यान्नों पर कब्जा कर लिया। इस तरह संगठित लड़ाई या युद्ध की शुरुआत हुई। धीमे-धीमे इसका आकार बढ़ता गया। यह शुरुआती युद्ध गोफन और पत्थर व धनुष और बाण से लड़े गए थे। याद रखिए उन युद्ध के उद्देश्‍य शुद्धतः आर्थिक थे। ये उद्देश्‍य थे खाद्य संसाधनों व रहने के स्थानों का बलात् अधिग्रहण। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि युद्ध का एकमात्र आयाम हमला नहीं था। इतना ही महत्वपूर्ण था रक्षा या डिफेंस। इसे भी ईसा पूर्व 7000 वर्ष पहले पहचान लिया गया था। तभी तो मृत सागर (डेड सी) के पास पुरातन जेरीचो समुदाय ने दस एकड़ का एक नगर बनाया था और उसकी किलेदारी अनगढ़ पत्थरों की विषाल दीवार और एक चौड़ी व गहरी खाई से की थी। यह फौजी किलेबंदी का पहला उदाहरण है।

वहीं बेहद संगठित युद्धों की शुरुआत काफी बाद में यानी ईसा पूर्व 4000 से 3500 के मध्य मेसापोटेमिया और मिस्र की सभ्यता के बीच हुए युद्ध से हुई थी। तब से युद्ध के पीछे के निहितार्थ भी परिवर्तित होते चले गए। वैसे दुनिया ने और कहीं ज्यादा तरक्की की हो या नहीं युद्ध के क्षेत्र में आदिम पाषाण युग से परमाणु और परमाणु से आगे जैविक व तकनीक आधारित युद्ध की ओर प्रगति सतत् होती रही है। परन्तु यह और भी दुखद है कि चीन-भारत का वर्तमान संघर्ष एक बार पुनः 10 हजार वर्ष पीछे पहुंचा। पत्थरों और लाठियों से आपसी संघर्ष हुआ। हमें यहां यह भी याद रखना होगा कि गलवान में हुआ यह वर्तमान संघर्ष जहां हमें पाषाण युग के युद्ध की याद दिला रहा है, वहीं दूसरी ओर यह मानव सभ्यता के भविष्य का भी सूचक है। हमें समझना होगा कि प्रत्येक सशस्त्र संघर्ष अंततः पाषाण युग की ओर बढ़ता कदम ही है।

महात्मा गांधी सन् 1925 में नवजीवन में लिखते हैं, ‘‘सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नहीं, बल्कि जब सत्ता का दुरुपयोग होता हो तब सब लोगों के द्वारा उसके प्रतिकार करने की क्षमता प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है।’’ गौर करिए भारत स्वतंत्रता के बाद कैसे संचालित होगा इसकी परिकल्पना बापू ने आजादी के 22 साल पहले और आज से करीब एक शताब्दी पहले तैयार कर ली थी। इसी के बाद सन् 1931 में वे लोकतंत्र के बारे में समझाते हैं, ‘‘मनुष्य की बनाई कोई भी संस्था ऐसी नहीं है, जिसमें खतरा न हो। संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरुपयोग की संभावनाएं भी उतनी ही बड़ी होंगी। लोकतंत्र एक बड़ी संस्था है, इसलिए उसका दुरुपयोग भी बहुत हो सकता है। लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरुपयोग की संभावना को कम-से-कम करना है।’’  चीन से उपजा संकट तो निपट ही जाएगा। आज नहीं तो कल। परन्तु हमें समझ जाना होगा कि भारत में लोकतंत्र पर जो खतरा मंडरा रहा है वह ज्यादा बड़ा और अधिक खतरनाक है। इसलिए विपक्ष को ही भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने का बीड़ा उठाना पड़ेगा। अन्य कई स्तरों पर कोषिष जारी है। मगर प्रयत्न अभी आधे-आधूरे हैं। आज जब हम सब देष की संप्रभुता के लिए एकजुट हैं तो इसी एकजुटता की निरंतरता लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए बनाए रखनी होगी।

आलेख की शुरूआत में त्रिलोचन जी की पंक्तियों में एक शब्द आया है, ‘‘नोना‘‘। यह एक विशेष प्रकार की सीलन होती है जो जमीन में नमक की मात्रा अधिक होने से उभरती है। इसका अर्थ जानने के लिए मैंने उनके सुपुत्र प्रसिद्ध पत्रकार अमित प्रकाश सिंह को फोन किया। उन्होंने अर्थ तो बताया ही साथ ही यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के आसपास (जहां के त्रिलोचनजी हैं) बड़ी मात्रा में ऐसी भूमि थी। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के सिंचाई मंत्री ने वहां नहरों का जाल बिछाकर पूरी भूमि सिंचित कर दी। आज वह क्षारयुक्त भूमि भारत की सबसे उपजाऊ भूमि में परिवर्तित हो गई है। भारतीय लोकतंत्र की जमीन में भी ‘‘नोना’’  लग गया है। बड़ी संख्या में जनसमुदाय की भागीदारी नामक नहर की सिंचाई ही भारतीय लोकतंत्र को पुनः उपजाऊ बना सकती है।