Digvijaya Singh: अहमद भाई को हमने ऐसे वक़्त में खो दिया जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अहमद पटेल को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपनी दशकों पुरानी दोस्ती और उनकी बेमिसाल खूबियों को बेहद अपनेपन के साथ याद किया है

Updated: Nov 26, 2020, 02:12 AM IST

Digvijaya Singh: अहमद भाई को हमने ऐसे वक़्त में खो दिया जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी
Photo Courtesy: Punjab Kesari

अहमद भाई नहीं रहे। कोविड-19 टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद से ही वे काफ़ी अस्वस्थ थे और अस्पताल में उनका इलाज़ चल रहा था। मैंने निजी तौर पर एक ऐसे दोस्त और साथी को खो दिया है, जिन पर मुझे भरोसा था और जिनके राजनीति मूल्यांकन और फ़ैसलों पर मैं गहरा यक़ीन रखता था। वे एक बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जो कभी नमाज़ पढ़ना नहीं भूलते थे। इसके साथ ही वे बहुलतावादी विचारों में पक्का यक़ीन रखने वाले एक आधुनिक और उदारवादी व्यक्ति भी थे।

1977 की ज़बरदस्त कांग्रेस विरोधी लहर में भी वे लोकसभा में चुनकर आए। मैं भी तभी चुनाव जीतकर मध्य प्रदेश विधानसभा में पहुंचा था। तब वे 28 साल के थे और मैं 30 का। हमारा आपसी परिचय युवा कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ताओं के तौर पर हुआ था। तब संजय गांधी हमारे नेता थे, जो अपनी टीम से काम लेने के मामले में बेहद सख़्त हुआ करते थे! अहमद भाई तब गुजरात में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष थे और मैं मध्य प्रदेश में युवा कांग्रेस का महासचिव हुआ करता था।

1984 में लोकसभा में चुनकर जाने के बाद मैंने उन्हें और क़रीब से जाना। तब वे प्रधानमंत्री राजीव जी के संसदीय सचिव बनाए गए थे। वे बेहद खुशमिज़ाज़ और कम बोलने वाले थे। लोगों से दोस्ती करने और उन्हें प्रभावित करने का उनमें स्वाभाविक गुण था। हालांकि मैंने उनसे कभी नहीं पूछा कि क्या उन्होंने डेल कारनेगी की किताब  “दोस्त बनाने और लोगों का दिल जीतने की कला” पढ़ी है या नहीं! उनकी राजनीतिक सूझबूझ क़माल की थी और साथ ही वे परस्पर विरोधी हालात के बीच सामंजस्य बिठाने और संतुलन बनाने में भी माहिर थे।

आधी रात के बाद वे सबसे ज़्यादा सक्रिय रहते थे और तभी उनका दिमाग़ सबसे तेज़ी से काम करता था। दुर्भाग्य से मैं उनके आधी रात के बाद वाले दरबार का हिस्सा कभी नहीं बन पाया, क्योंकि मुझे सुबह जल्दी उठने की आदत थी, जिसके कारण मुझे वहां से जल्दी आना पड़ता था। अहमद भाई संगठन के आदमी थे, जिन्होंने मंत्रिमंडल में शामिल होने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जबकि अगर वे चाहते तो कांग्रेस की अगुवाई वाली किसी भी सरकार में अपनी पसंद का कोई भी मंत्रालय हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हमेशा पर्दे के पीछे रहकर काम करना ही पसंद किया। और यक़ीन मानिए मैं आज तक किसी ऐसे शख़्स से नहीं मिला जो यह काम उनसे बेहतर और ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से कर सकता हो।

बेहद ईमानदार और भरोसेमंद शख़्सियत के धनी अहमद भाई ने कांग्रेस कोषाध्यक्ष के रूप में बड़ी कुशलता से सीताराम केसरी जी की जगह को भर दिया। उनके ख़िलाफ जितने भी केस हैं, सब  राजनीति से प्रेरित हैं। वे कांग्रेस के ऐसे नेता थे, जिन पर देश भर के कारोबारी और कॉरपोरेट्स भी भरोसा करते थे। उनके बाएं हाथ को भी पता नहीं चलता था कि दाहिना हाथ क्या कर रहा है।

उनकी इसी खूबी ने सोनिया जी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अहमद भाई को अपना राजनीतिक सचिव बना लिया। दो दशक से भी ज़्यादा वक़्त तक उन्होंने सोनिया जी बेहद निष्ठापूर्वक सेवा की। वे उनके साथ एक चट्टान की तरह खड़े रहे। यूपीए चेयरपर्सन के राजनीतिक सचिव के तौर पर उनका कार्यकाल उनके राजनीतिक करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था। दिल्ली में यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल के दौरान वे लगातार कांग्रेस अध्यक्ष और गठबंधन में शामिल बीस से ज़्यादा राजनीतिक दलों के बीच संपर्क सूत्र का काम करते रहे।

कांग्रेस के अलावा उस गठबंधन में लेफ़्ट फ़्रंट, एनसीपी, समाजवादी पार्टी, बीएसपी, आरजेडी, डीएमके, नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीडीपी, टीएमसी, एलजेपी, टीआरएस और कुछ अन्य दल भी शामिल रहे। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक साथ इतने मज़बूत क्षेत्रीय क्षत्रपों की ज़रूरतों और ख्वाहिशों को संतुष्ट करने में किस तरह के राजनीतिक कौशल की ज़रूरत पड़ती होगी, ख़ास तौर पर उन्हें संतुष्ट करने में जिनका सरोकार किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, सिर्फ़ सत्ता में बने रहने से जुड़ा था!! 

मेरे ख़्याल से इनमें बाहर से समर्थन दे रहे लेफ़्ट फ़्रंट को हैंडल करना सबसे आसान था, क्योंकि उन्हें सिर्फ़ यूपीए के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लागू किए जाने से मतलब रहता था। उस दौर में सबको रोज़-रोज़ हैंडल करने और एक साथ बनाए रखने का काम सिर्फ़ वही व्यक्ति कर सकता था, जिसमें कमाल का कौशल और ग़ज़ब का धैर्य हो। सोनिया जी उस दौर में अहमद भाई पर काफ़ी भरोसा करती थीं। मैं तब ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का महासचिव था और मुझे अहमद भाई को अद्भुत राजनीतिक कौशल के साथ उन सभी को सफलतापूर्वक हैंडल करते हुए क़रीब से देखने का सौभाग्य मिला। चाहे कैबिनेट में प्रतिनिधित्व देने की बात हो, पोर्टफ़ोलियो के बंटवारे का मसला या हर दिन सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने का सवाल, वे हर वक़्त तमाम अड़चनों को दूर करके गठबंधन को बनाए रखने और सफलता के साथ चलाने के लिए तत्पर रहते थे।

सबसे चुनौतीपूर्ण वक़्त वह था, जब यूपीए सरकार ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया और लेफ़्ट फ़्रंट ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तब अहमद भाई और स्वर्गीय अमर सिंह ही थे, जिन्होंने बिल को संसद में सफलतापूर्वक पारित करवा लिया। ये जगज़ाहिर है कि यूपीए सरकार के उस सख़्त और मज़बूती भरे रुख़ की बदौलत ही हम 2009 में सत्ता में वापस लौट सके।

कांग्रेस पार्टी में अहमद भाई की कमी हमेशा खलेगी। कांग्रेस पार्टी ने अपने बेहद भरोसेमंद और दिग्गज नेता को खो दिया है, वो भी ऐसे वक़्त में जब उन जैसी शख़्सियत की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। उनके परिवार के प्रति हम दिल की गहराइयों से संवेदना प्रकट करते हैं।