लोकतंत्र का नया शाहगंज मॉडल, समरस का सियासी ढोंग

शाहगंज मॉडल असल में लोकतंत्र का राजशाही स्वरूप है.. यह बहुत गंभीर प्रश्न है जो लोकतंत्र के सामने खड़ा हुआ है। यह एक गलत पहल है जो आने वाले समय में पूरे देश में अपनी जड़ें फैलाएगी। जहाँ-जहाँ, जिस-जिस सत्ता को अवसर मिलेगा वह अपने पक्ष में इसका उपयोग करेगी। राजनीति को हमेशा से लोकतंत्र में शामिल "लोक" परेशान करता रहा है, वह इसलिए कि पाँच साल बाद उसे लौट कर "लोक" के पास जाना होता है। वहाँ से आगे अपना कार्यकाल जारी रखने का फ़ैसला प्राप्त करना होता है। यह प्रक्रिया राजनीति और सत्ता के इगो को सबसे ज़्यादा ठेस पहुँचाती है। "दो कौड़ी की जनता" के सामने जाकर उनको हाथ जोड़ना पड़ता है, पैर पड़ने होते हैं, विनम्रता का प्रदर्शन करना होता है। शायद इसी कारण राजनीति और सत्ता ने यह "शाहगंज मॉडल" तलाश कर लिया है।

Updated: Jul 03, 2022, 05:34 PM IST

लोकतंत्र का नया शाहगंज मॉडल, समरस का सियासी ढोंग
Photo Courtesy: bhaskar

शाहगंज एक छोटे से क़स्बे का नाम है, जो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में स्थित है। यह क़स्बा क्षेत्रीय सांसद, जो मुख्यमंत्री के सबसे क़रीबी माने जाते हैं, का अपना गृह​ क़स्बा भी है। फिलहाल मध्यप्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनाव चल रहे हैं। नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत तथा ग्राम पंचायत के चुनाव इन दिनों चल रहे हैं। शाहगंज क़स्बा नगर पंचायत श्रेणी में आता है। यहाँ भी चुनाव होने थे मगर नहीं हुए। क्यों नहीं हुए, उसकी कहानी लोकतंत्र के नए मॉडल "समरस" की कहानी है। "समरस" यही नाम दिया है प्रदेश की सत्ता ने लोकतंत्र की देह में प्रविष्ट हुए नए वायरस को।

क्या है यह समरस ? समरस का अर्थ है कि लोकतंत्र में से लोक को शून्य कर दो, तथा सब कुछ तंत्र के हाथों में दे दो। मतलब यह कि मतदान जैसी प्रक्रिया को बायपास करते हुए, सीधे ही चयन प्रक्रिया संपन्न कर ली जाए। अब यह कैसे संभव होगा ? तो इसको मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष द्वारा नाम दिया जा रहा है समरस। समरस का अर्थ यह है कि यदि आपकी सत्ता है तो "साम-दाम-दंड-भेद" का उपयोग करते हुए इस प्रकार की व्यवस्था कर दी जाए कि आपके सामने कोई दूसरा चुनाव में खड़ा होने की हिम्मत ही नहीं करे। यही शाहगंज में हुआ है, वहाँ पूरे पन्द्रह वार्डों में सत्ताधारी दल के पार्षद निर्विरोध चुन कर आ गए हैं। वहाँ किसी दूसरे दल या व्यक्ति को खड़ा ही नहीं होने दिया गया है। प्रश्न यह उठता है कि यदि इसका नाम समरस है, तो इसमें केवल एक ही दल, वह भी सत्ताधारी दल के ही लोग पूरी पन्द्रह सीटों पर कैसे जीत कर आए हैं ? यदि यह वास्तविक समरसता होती, तो सभी दलों के तथा निर्दलीय भी जीत कर आते। एक ही दल, और वह भी सत्ताधारी दल के ही लोगों का चुन कर आना बताता है कि इस समरसता के लिए क्या किया गया है। और उसी के साथ यह भी प्रश्न उठता है कि यह समरसता क्यों ? लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह अपने जनप्रतिनिधि स्वयं चुने, वह तय करे। लेकिन यह समरसता तो नागरिक अधिकारों का हनन है। यह समरसता जनता ने नहीं तय की है, यह तो सत्ता ने तय की है, अपने लाभ के लिए तय की है। यह समरसता असल में लोकतंत्र को समाप्त करने के लिए उठाया गया अगला क़दम है। लोक को जब तक भरमा कर अपने पक्ष में मतदान करवाया जा सकता है, तब तक वैसा और उसके बाद ऐसी व्यवस्था करना कि लोक ही विलोपित हो जाए। क्योंकि लोक की बारी तो तब आएगी, तब चुनाव के लिए एक से अधिक विकल्प सामने होंगे, जब एक ही विकल्प होगा तो चयन की पूरी प्रक्रिया स्वत: ही समाप्त हो जाएगी, चयना तो पहले ही हो चुका है। कल्पना कीजिए उस स्वयंवर की, जिसमें केवल एक ही राजकुमार खड़ा है, और राजकुमारी वरमाला लेकर चली आ रही है जीवन साथी का चयन करने के लिए।

एक प्रश्न उठता है, जिसका उत्तर शायद विधि विशेषज्ञ दे सकते हैं, प्रश्न यह कि यदि ऐसी कोई स्थिति बनती है, तब क्या "नोटा" को एक विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है ? वह एक ही व्यक्ति जो अकेला चुनाव में खड़ा है उसके सामने "नोटा" को दूसरे विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ? क्योंकि "नोटा" असल में विकल्पहीनता को दर्शाने के लिए ही उपयोग में लाया जाता है। और निर्विरोध वाली स्थिति में तो नोटा का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। यदि निर्विरोध चयन की ​स्थिति बन रही है, तो भी उम्मीदवार को नोटा से मुकाबला करना पड़े। एक बार फिर उस स्वयंवर की कल्पना कीजिए जहाँ राजकुमारी के सामने एक ही राजकुमार को खड़ा किया गया है, लेकिन वहाँ दूसरे विकल्प के रूप में एक पत्थर की मूर्ति भी रखी गई है कि राजकुमारी यदि उस एकमात्र राजकुमार को अस्वीकार करना चाहे, तो माला पत्थर की मूर्ति के गले में डाल कर अपनी असहमति व्यक्त कर दे।  

यह "शाहगंज मॉडल" लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है। लोक के पास जाने से पहले ही चयन प्रक्रिया पूर्ण हो जाना तो राजशाही की व्यवस्था रही है, जहाँ जनता के केवल बताया जाता था कि निर्विवाद रूप से फलाँ राजकुमार को अब महाराजा के रूप में चुन लिया गया है। यह शाहगंज मॉडल असल में लोकतंत्र का राजशाही स्वरूप है। यह बहुत गंभीर प्रश्न है जो लोकतंत्र के सामने खड़ा हुआ है। यह एक गलत पहल है जो आने वाले समय में पूरे देश में अपनी जड़ें फैलाएगी। जहाँ-जहाँ, जिस-जिस सत्ता को अवसर मिलेगा वह अपने पक्ष में इसका उपयोग करेगी। राजनीति को हमेशा से लोकतंत्र में शामिल "लोक" परेशान करता रहा है, वह इसलिए कि पाँच साल बाद उसे लौट कर "लोक" के पास जाना होता है। वहाँ से आगे अपना कार्यकाल जारी रखने का फ़ैसला प्राप्त करना होता है। यह प्रक्रिया राजनीति और सत्ता के इगो को सबसे ज़्यादा ठेस पहुँचाती है। "दो कौड़ी की जनता" के सामने जाकर उनको हाथ जोड़ना पड़ता है, पैर पड़ने होते हैं, विनम्रता का प्रदर्शन करना होता है। शायद इसी कारण राजनीति और सत्ता ने यह "शाहगंज मॉडल" तलाश कर लिया है। घर-घर जाकर हाथ जोड़ने से अच्छा अपने सामने खड़े होने वाले के सामने या तो हाथ जोड़ लो, या उसका गला पकड़ लो। और फिर जनता को सूचित कर दो कि आपकी कोई आवश्यकता नहीं है, सब कुछ आम सहमति से हो गया है। 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने शाहगंज के निवासियों को समरस नगर पंचायत होने पर मुबारकबाद दी है। असल में उनको यह मुबारकबाद शाहगंज के अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को देनी थी, जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर समरसता क़ायम की, लेकिन चूँकि लोकतंत्र है, इसलिए अंत में जनता को यह आभास तो देना ही था कि सब कुछ उसके ही कारण हुआ है, इसलिए उन्होंने जनता को ही मुबारकबाद दी है। प्रश्न यह उठता है कि क्या वे तब भी मुबारकबाद देते, जब उनके अपने विधानसभा क्षेत्र के क़स्बे शाहगंज में समरसता से विपक्षी दल के सारे पार्षद निर्विरोध रूप से चुन कर आ जाते ? नहीं देते, और चुन कर आते भी नहीं, क्योंकि समरसता के लिए सत्ता की आवश्यकता होती है, समरसता असल में उस भैंस का नाम है, जो उसी के पीछे चलती है जिसके हाथ में सत्ता रूपी लाठी होती है। यह भैंस कभी भी लाठीहीन के पीछे नहीं चलती। 

कुल मिलाकर बात यह कि लोकतंत्र का यह एक नया रूप है, जो आने वाले समय में बहुत विकृत रूप रख कर आपके शहरों, क़स्बों में भी आने वाला है। पाँच साल बाद आपको केवल यह बताया जाएगा कि सत्ताधारी दल को आपने एक बार फिर से पाँच साल काम करने का आदेश प्रदान कर दिया है। आपने ? मतलब जनता ने। आप पूछेंगे कि हमने कब आदेश प्रदान किया ? तो उत्तर मिलेगा, आपसे आदेश लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, हमने और हमारे विरोधी ने समरसता से यह तय कर लिया है कि हम ही आने वाले पाँच साल और काम करेंगे। लेकिन चूँकि देश में लोकतंत्र है और आप चूँकि "लोक" हैं इसलिए यह क्रेडिट तो आपको ही जाता है, इसीलिए हम आपको सूचना देने और मुबारकबाद देने आए हैं, कुछ भी मत सोचिए हमारी मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए.... मुबारक हो... लोकतंत्र को पचहत्तरवें वर्ष में शाहगंज में बच्चा हुआ है, जिसका नाम है "समरस"।

 

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