जी भाईसाहब जी: पद बचाने के लिए मंत्री विजय शाह को नई सुरक्षा
MP Politics: यूं तो मंत्री विजय शाह ने बीते सालों में कई बार विवादास्पद बयान दिए है। एक बार वे ऐसे बयान के कारण कुर्सी खो भी चुके हैं। लेकिन इस बार बात केवल राजनीतिक नहीं है। इसलिए पद बचाने के लिए नए-नए रास्ते खोजे जा रहे हैं।
अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण विवादास्पद बोल के बाद भी कुर्सी बचाने में कामयाब रहने वाले मंत्री विजय शाह एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मामला सुप्रीम कोर्ट में है और बार-बार बढ़ती तारीखों के कारण उनकी कुर्सी अब तक तो बची हुई है। विपक्ष कांग्रेस ने मोर्चा खोला हुआ है और वह मंत्री के इस्तीफे की बात कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों और विपक्ष के विरोध के बीच मंत्री विजय शाह के बचाव के नए-नए रास्ते सामने आ रहा है।
यूं तो मंत्री विजय शाह ने बीते सालों में कई बार विवादास्पद बयान दिए है। एक बार वे ऐसे बयान के कारण कुर्सी खो भी चुके हैं। लेकिन इस बार बात केवल राजनीतिक नहीं है। यह मामला मई 2025 में एक सार्वजनिक कार्यक्रम का है जब मंत्री विजय शाह ने 'ऑपरेशन सिंदूर' का उल्लेख करते हुए कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर ऐसी टिप्पणी कर दी थी। इसे सिर्फ सेना के सम्मान के खिलाफ ही नहीं बल्कि सांप्रदायिक और अपमानजनक भी माना गया। इस बयान के बाद जब राजनीतिक हंगामा हुआ लेकिन बीजेपी ने कुछ नहीं किया तो मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए। एफआईआर में भी हीलाहवाली की गई। बात सुप्रीम कोर्ट पहुंची। वहां भी फटकार ही मिली। सुप्रीम कोर्ट ने मोहन सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि वह दो सप्ताह में यह तय करे कि मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जाएगी या नहीं। कोर्ट ने इसे टालने से साफ इनकार कर दिया था।
इसके बाद सरकार बैकफुट पर है। आकलन किया गया है कि आदिवासी नेता होने के कारण बीजेपी मंत्री विजय शाह पर कार्रवाई करने से बच रही है। वह चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट ही कोई निर्देश दे ताकि बीजेपी राजनीतिक हानि से बचा जाए। एक तरफ, बीजेपी और बीजेपी सरकार मंत्री विजय शाह पर कार्रवाई से बच रही है वहीं अब मंत्री पद बचाने के लिए समर्थकों को आगे कर दिया गया है। अशोक नगर में आदिवासी समाज और छात्र संगठन खुलकर मंत्री के समर्थन में सड़क पर आ गए।
डॉ. कुंवर विजय शाह मित्र मंडल और अजा-जजा व अन्य पिछड़ा वर्ग छात्र संघ ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन दिया। समाज के युवाओं ने कहा कि मंत्री अपनी भाषाई त्रुटि के लिए चार बार सार्वजनिक रूप से माफी मांग चुके हैं, इसलिए उनकी जनसेवा और वरिष्ठता को देखते हुए अब इस प्रकरण को समाप्त होना चाहिए। उनके वंश और काम का हवाला देते हुए समर्थकों का कहना है कि अनजाने में हुई भाषाई त्रुटि के कारण विजय शाह के 35-40 वर्षों के त्याग और राष्ट्रप्रेम को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। बचाव करने वालों को इस बात से कोई लेनादेना नहीं है कि मंत्री ने अक्सर ही ऐसे बयान दिए हैं। ताजा मामले में भी बयान और फिर माफी के बाद भी उन्होंने बैठकों में बड़े बोल ही बोले हैं।
सिंधिया का नाम सुन मंत्री तुलसी सिलावट को क्यों आता है गुस्सा?
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण हुई मौतों पर सवाल पर खीज कर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा दिया गया बयान चर्चा में रहा। ऐसी ही एक प्रतिक्रिया जलसंसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने दी। मीडियाकर्मी हैरान हैं कि उन्हें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम लेते ही मंत्री तुलसीराम सिलावट को गुस्सा क्यों आया?
बात ग्वालियर की है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कट्टर समर्थक मंत्री तुलसीराम सिलावट विकास कार्यों की मीटिंग के लिए ग्वालियर पहुंचे थे। इंदौर के निवासी तुलसीराम सिलावट इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी मामले में मृत्यु पर पूरी तरह मौन साधे रहे लेकिन ग्वालियर में विकास और समस्याओं को लेकर पत्रकार ने सवाल किया तो वे भड़क गए। पत्रकारों ने उनसे पूछ लिया था कि जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का दौरा होता है, तभी आप ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। जर्जर सड़क, बदहाल अस्पताल व्यवस्था पर कुछ क्यों नहीं करते हैं।
पत्रकार ने ज्यों ही केंद्रीय मंत्री सिंधिया का नाम लिया मंत्री तुलसीराम सिलावट तिलमिला गए। मंत्री तुलसीराम सिलावट ने कड़क स्वर में जवाब देते हुए कहा कि यह पूछने का अधिकार मैं किसी को नहीं देता। मेरा पूरा कामकाज पार्टी और सरकार के पास दर्ज है। सालभर का रिकॉर्ड देख लीजिए, फिर बात कीजिए।
पत्रकार अक्सर असहज कर देने वाले सवाल पूछ लेते हैं और नेतागण संयम से जवाब टाल भी जाते हैं लेकिन सिंधिया के नाम लेकर पूछे गए सवाल पर मंत्री तुलसीराम सिलावट संयमित नहीं रह पाए। उन्हें आक्रोशित होता देख उनके साथ के अफसरों और कार्यकर्ताओं ने स्थिति संभालने की कोशिश की। असल में इस गुस्से का कारण केवल एक सवाल नहीं है। बल्कि ग्वालियर की राजनीति है। ग्वालियर बीजेपी की अंदरूनी राजनीति के कारण मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया विकास कार्यों से कभी दूरी बना लेते हैं, कभी समीक्षा कर निर्देश देते हैं।
मंत्री तुलसीराम सिलावट सिंधिया के करीबी हैं इसलिए ग्वालियर का प्रभार उन्हें दिया गया है। सिंधिया खेमे के सभी नेता महल की राजनीति को स्थापित करने में जुटे रहते हैं। इस कारण उनकी गतिविधियां सिंधिया परिवार के इर्दगिर्द और उनके मुताबिक ही होती है। इसी पर पत्रकार ने सवाल पूछा था जिस पर मंत्री सिलावट बिफर गए।
बीजेपी के सबसे सीनियर एमएलए गोपाल भार्गव नहीं लड़ेंगे चुनाव
क्या एमपी बीजेपी में एक नया मार्गदर्शक मंडल बन रहा है? क्या मध्य प्रदेश में बीजेपी के सीनियर लीडर नौ बार के विधायक गोपाल भार्गव का मन राजनीति से उचाट हो रहा है? क्या अब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे? यह सवाल बीजेपी ही नहीं मध्यप्रदेश के राजनीतिक जगत में तैर रहे हैं। इस सवालों को किसी ओर ने नहीं बल्कि खुद गोपाल भार्गव ने हवा दी है।
सबसे वरिष्ठ और सुलझा हुआ नेता होने के बाद भी बीजेपी ने उन्हें साइड लाइन कर रखा है। मंत्री पद तो दिया नहीं क्षेत्रीय राजनीति में भी वे अपने क्षेत्र तक सीमित हैं। यह अपमान उनके भीतर आक्रोश में बदल रहा है। पार्टी के लिए पूरा जीवन खपा देने वाले नेता गोपाल भार्गव के मन का गुबार अब सार्वजनिक रूप से जाहिर भी हो रहा है। बीते दिनो उन्होंने ब्राह्मणों को हाशिए पर रखने पर बयान दिया था। इस बयान पर चर्चाएं थमी भी नहीं थी कि आलोचकों को जवाब देते हुए उन्होंने कह दिया कि अगर हमने सेवा की होगी तो मैं लड़ूं या मेरी ओर से कोई और, जनता आशीर्वाद देगी। अगर काम नहीं किया होगा तो मौका किसी दूसरे को मिल जाएगा।
गोपाल भार्गव यहां तक कह गए कि उनके द्वारा उपलब्ध करवाई गई सुविधाओं का लाभ लेने वाले लोग ही आलोचना भी करते हैं। ऐसा है तो उन सुविधाओं का उपयोग मत करो। यहां बैठे-बैठे आलोचना करते रहना आसान है, लेकिन काम कराने के लिए पूरा जीवन झोंकना पड़ता है। घर-परिवार को समय नहीं मिल पाता। दिन और रात जनता के बीच रहना पड़ता है। बीजेपी सरकार में सैकड़ों और हजारों काम हुए हैं, लेकिन किसी ने धन्यवाद का एक शब्द तक नहीं लिखा।
गोपाल भार्गव की पार्टी से नाराजगी जाहिर है लेकिन उनके काम को देख कर ही जनता ने धन्यवाद स्वरूप उन्हें 9 बार चुनाव जितवाया है। उनका आक्रोश जनता को लेकर नहीं पार्टी को लेकर होना चाहिए। पार्टी ही उनके उत्तराधिकारी के टिकट का फैसला लेगी।
विधानसभा के अंदर संयम और बाहर शक्ति प्रदर्शन की चुनौती
कांग्रेस बीते कुछ माह से मोहन सरकार को घेरने के लिए अलग-अलग मोर्चों पर जुटी हुई है। विधानसभा के बजट सत्र में कांग्रेस को दोहरे स्तर पर ताकत दिखानी है। पार्टी ने तय किया है कि वह सदन के अंदर और बाहर मुखर विरोध करेगी। इंदौर भागीरथपुरा में हुई मौतों, कफ सिरप के कारण हुई बच्चों की मौतों तथा सेना को लेकर टिप्पणी के कारण कांग्रेस तीन मंत्रियों कैलाश विजयवर्गीय, राजेंद्र शुक्ला और विजय शाह का इस्तीफा मांग रही है। पार्टी ने तय किया है कि विधानसभा में इन मंत्रियों का विरोध किया जाएगा। इसी तरह किसानों के मुद्दे पर सड़क पर प्रदर्शन होगा। 24 फरवरी को होने वाले विधानसभा के घेराव में प्रदेश भर से किसानों के भोपाल एकत्रित किया जाएगा।
बाहर जहां शक्ति प्रदर्शन के लिए किसानों को जुटाने की जिम्मेदारी है तो सदन के अंदर विरोध दर्ज हो सके इसलिए जरूरी है कि विधानसभा की कार्यवाही पूरी अवधि तक चले। सदन को पूरी अवधि तक चलाने के लिए कांग्रेस के लिए जरूरी होगा कि वह अपने विरोध को संयमित रखे और सरकार को सदन की कार्यवाही टालने का मौका न दे।




