Belarus Protests: आखिर दुश्मन देश के 'तानाशाह' की मदद क्यों कर रही है रूस की मीडिया

Alexander Lukashenko: बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको के खिलाफ जारी हैं देश में प्रदर्शन, रूस को दुश्मन बताने वाले लुकाशेंको की पुतिन ने सहायता

Updated: Sep-24, 2020, 09:51 AM IST

Belarus Protests: आखिर दुश्मन देश के 'तानाशाह' की मदद क्यों कर रही है रूस की मीडिया
Photo Courtesy: The Star

दिल्ली से करीब पांच हजार किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम दिशा में एक शहर है। शहर का नाम है मिंस्क। यह शहर रूस के पड़ोसी बेलारूस की राजधानी है। बेलारूस को ठंडे तापमान वाले देश के रूप में जाना जाता है। लेकिन आजकल देश का माहौल बहुत गर्म है। 95 लाख की आबादी वाले इस देश में राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले करीब एक महीने से दो लाख लोग रोजाना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और राष्ट्रपति का इस्तीफा मांग रहे हैं।

लुकाशेंको की पुलिस और सेना प्रदर्शनकारियों पर ज्यादिती कर रही है। कई प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। हजारों जेल में बंद हैं। सैंकड़ों बुरी तरह से घायल हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने बेलारूस की इन दर्दनाक तस्वीरों को दुनिया के कोने कोने में पहुंचा दिया। पहले से ही बदनाम लुकाशेंको को दुनिया तानाशाह कहकर बुलाने लगती है। बेलारूस के पड़ोसी देश उसके ऊपर प्रतिबंध लगा देते हैं।

लुकाशेंको ने पत्रकारों को देश से निकाल दिया

अपनी छवि को मटियामेट होते देख लुकाशेंको पत्रकारों को देश से बाहर निकाल देते हैं। बेलारूस के पत्रकारों को धमकी देते हैं। एक पल को लगता है कि लुकाशेंको के सबसे बड़े दुश्मन पत्रकार ही हैं। लेकिन तभी रूस से कुछ पत्रकार बेलारूस आते हैं। लुकाशेंको उनका स्वागत करते हैं, उन्हें इंटरव्यू देते हैं। यह सब देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि यह वही लुकाशेंको हैं, जो अभी कुछ वक्त पहले चुनावी प्रचार में रूस के खिलाफ हुंकार भर रहे थे। रूस के उन पत्रकारों को भी देखकर नहीं लगता कि वे यही पत्रकार हैं जो लुकाशेंको के खिलाफ दिन रात मोर्चा खोले रहते थे।

आखिर ऐसा क्यों हुआ? रूसी मीडिया अपने दुश्मन देश बेलारूस के तानाशाह की मदद क्यों करने लगी? इसके पीछे एक बड़ी कहानी है। लेकिन उसे जानने से पहले जरा बेलारूस में जारी तनाव के बारे में जान लेते हैं।

अलेक्जेंडर लुकाशेंको पिछले 26 साल से बेलारूस की सत्ता पर काबिज हैं। इस बार अगस्त में हुए चुनाव में उन्हें फिर से विजेता घोषित किया गया। 80 प्रतिशत वोटों के साथ। तभी से उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विपक्षी उम्मीदवार स्वेतलाना शिखानौस्काया ने चुनावों में गड़बड़ी का आरोप लगायाती करती है।

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बीते एक महीने से दो लाख लोग रोजाना विरोध प्रदर्शन करते हैं और राष्ट्रप और लोगों से सड़कों पर आने की अपील की। देखते ही देखते लाखों लोग सड़कों पर आ गए। इन प्रदर्शनकारियों में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों के वे मजदूर भी शामिल हो गए, जिन्हें हमेशा से लुकाशेंको का समर्थक माना जाता था।

लुकाशेंको ने मांगी पुतिन से मदद

लुकाशेंको ने जब इन मजदूरों को सड़कों पर देखा तो उनकी रातों की नींद उड़ गई। इन मजदूरों के आने से चुनाव में गड़बड़ियों की बात भी सही साबित होने लगी। हताश परेशान लुकाशेंको को कोई रास्ता ना सूझा तो उन्होंने पुलिस और सेना को विरोध प्रदर्शन कुचलने के आदेश दे दिए। लेकिन प्रदर्शन फिर भी नहीं रुके। हर रोज प्रदर्शनकारियों का हुजूम बढता गया। देश की राजधानी मिंस्क में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन दूसरे शहरों में भी फैलने। अपनी गद्दी जाते हुए देख आखिर में लुकाशेंको को पुतिन से मदद मांगनी पड़ी। उन्हीं पुतिन से जिन्हें वे बेलारूस का सबसे बड़ा दुश्मन बता रहे थे।

पुतिन को भी लुकाशेंको की मदद करने में अपना फायदा दिखा। पुतिन ने प्रदर्शनकारियों को धमकी दे डाली कि अराजकता फैलाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। शुरुआती तौर पर पुतिन ने अपने वफादार पत्रकारों को बेलारूस के लिए रवाना कर दिया।

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पुतिन को लुकाशेंको की मदद करने में जो फायदा दिखा, उसपर हम बाद में आएंगे। पहले ये जानते हैं कि आखिर रूसी मीडिया ने कैसै नैरेटिव को पलटने की कोशिश की। लुकाशेंको की क्रूर तानाशाह वाली छवि को किस तरह सुधारने का प्रयास किया।

क्रूर तानाशाह से 'अच्छे नेता' बने लुकाशेंको

रूस का एक बहुत बड़ा मीडिया नेटवर्क है। नाम है आरटी। मार्गरीटा सिमोन्या इसकी मालकिन हैं। सिमोन्या के पास एक और बड़ी न्यूज एजेंसी स्पुतनिक का भी मालिकाना हक है। इन दोनों ही मीडिया संस्थानों पर आरोप है कि ये पुतिन के इशारे पर काम करते हैं।

आठ सितंबर को सिमोन्या अपने और दूसरे न्यूज चैनलों के एंकरों और रिपोर्टरों के साथ मिंस्क पहुंचती हैं। पहले दिन ही लुकाशेंको एलेक्जेंडर उन्हें अपना इंटरव्यू दे देते हैं और इसके बाद शुरू होता है नैरेटिव बदलने का काम।

जिस मिंस्क की सड़कों पर विदेशी पत्रकारों का नामोनिशान तक नहीं था, वहां अचानक से रूस से आए पत्रकारों का जमावड़ा होने लगता है। प्रदर्शनकारियों को उनकी रिपोर्टिंग के अंदाज में बदलाव साफ नजर आने लगता है। रूस से आए पुतिन के पत्रकार लुकाशेंको को बेलारूस के बड़े पिता के समान बताने लगते हैं... और उनके खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को अमेरिका की चाल, जिसमें पोलैंड, चेक गणराज्य और लिथुआनिया जैसे देश शामिल हैं।

रूस के ये पत्रकार बेरहमी से पीटे जा रहे प्रदर्शनकारियों को दुश्मन देश के एजेंट घोषित कर देते हैं। लुकाशेंको ने चुनाव प्रचार के दौरान जब लगातार यह आरोप लगाए थे कि पुतिन बेलारूस को जबरन अपने देश में मिलाना चाहता है, तब इन पत्रकारों ने लुकाशेंको को विलेन के रूप में दिखाया था। लेकिन उनकी नई रिपोर्टिंग में लुकाशेंको के इस रूप का कोई जिक्र ही नहीं होता।

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कई पत्रकार जानबूझकर खाली स्थानों पर खड़े होकर रिपोर्टिंग करते हैं और कहते हैं कि देश के ज्यादातर लोग तो लुकाशेंको से खुश हैं... कहीं कोई प्रदर्शन नहीं हो रहा। हालांकि, इस बीच आरटी के दो रिपोर्टरों को पुलिस पकड़ लेती है। उन्हें मारती पीटती है। तीन दिन तक जेल में बंद रखती है। लेकिन उनकी मालकिन सिमोन्या को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

इस तरह से रूस की मीडिया लुकाशेंको की मदद करने की कोशिश करती है। लेकिन पुतिन को आखिर इसमें क्या फायदा नजर आता है। यह जानने के लिए हमें इतिहाल खंगालना होगा।

रूस, बेलारूस और सोवियत संघ की कहानी

बात पिछली सदी के अंतिम दशक की है। जब सोवियत संघ की टूटने की प्रक्रिया चल रही थी। रूस के साथ मिलकर जिन देशों ने बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में सोवियत संघ बनाया था, वे सब अब उसे छोड़ रहे थे। इसी क्रम में बेलारूस भी अलग हो गया था। लेकिन अलग होने का बाद भी वो एक तरह से रूस के ऊपर ही निर्भर था। और इस निर्भता को लुकाशेंको ने हद से ज्यादा आगे बढ़ा दिया था। सिर्फ अपने फायदे के लिए।

सोवियत संघ के टूटने के बाद बेलारूस के आर्थिक हालात बहुत खराब हो गए। ऐसे में रूस ने उसकी मदद की। रूस ने बेलारूस को सस्ता कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस भेजी। जिससे देश में  कारखाने चले। बदले में बेलारूस ने रूस को बहुत कम दामों पर जूते, ट्रैक्टर, अंडरवियर, गैस स्टोव और खाद्य पदार्थ दिए।

एक समय तो ऐसा आया जब रूस और बेलारूस के नागरिक बिना किसी रोक टोक के एक दूसरे के देश में आने जाने लगे। यह तब हुआ जब 1997 में दोनों देशों ने अपनी दोस्ती और मजबूत करने का फैसला लिया। इस साल लुकाशेंको   और तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत भविष्य में बेलारूस का रूस में विलय होना था।

रूस को लगा कि वो इस समझौते से दुनिया को दिखाएगा कि अभी उसके रुतबे में कोई कमी नहीं आई है, वहीं लुकाशेंको ने तो रूस का राष्ट्रपति बनने का सपना पाल लिया। इसके लिए उन्होंने रूस के अलग-अलग प्रदेशों में खूब दौरे किए। रूस के प्रभवाशली वर्ग को रिझाने की कोशिश की। लेकिन पुतिन के आने के बाद लुकाशेंका का सपना बस सपना रह गया। लेकिन इसके बाद भी लुकाशेंको रूस और बेलारूस को एक दूसरे का भाई बताते रहे। लुकाशेंको को उम्मीद बनी रही कि पुतिन के सत्ता से जाने के बाद उनका सपना पूरा हो सकता है।

हालांकि, पुतिन ने कभी इस तरह से नहीं सोचा। पुतिन ने हमेशा से ही यूक्रेन और बेलारूस को अपने ‘रसियन वर्ल्ड’ का एक छोटा हिस्सा माना, जिन्हें कभी ना कभी रूस का हिस्सा होना है। इसी नजरिए से पुतिन ने 2014 में क्रीमिया को जबरन रूस में मिला लिया।

दूसरी तरफ पुतिन अपनी सत्ता को मजबूत करते गए। पुतिन ने विपक्ष को लगभग खत्म कर दिया। लुकाशेंकों को पुतिन का यह रुख देखकर चिंता हुई और वे 1997 के समझौते से पीछे हट गए। पुतिन ने भी इसे अपनी साख का सवाल बना लिया और इसका प्रयोग अपने राजनीतिक फायदे के लिए भी किया।

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2019 में रूस की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई। सत्ता में बैठे नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। रूस के ऊपर कई प्रतिबंध लग गए। पुतिन की लोकप्रियता घट गई। ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए पुतिन को किसी बड़े मुद्दे की तलाश थी। परिणाम यह हुआ की पुतिन ने फिर से बेलारूस के विलय का मुद्दा उछाल दिया।

पुतिन की तानाशाही और लुकाशेंको का डर

दूसरी तरफ लुकाशेंको ने भी इसका जवाब दिया। लुकाशेंको ने कहा कि रूस जबरन बेलारूस का विलय करना चाहता है। लुकाशेंको ने पश्चिमी देशों से मुलाकात शुरू कर दी। यहां तक कि अमेरिका के रक्षा मंत्री माइक पोंपियों को अपने यहां बुला लिया। बदले में पुतिन ने बेलारूस को सस्ता तेल और कर्ज देना बंद कर दिया। इससे बेलारूस की अर्थव्यवस्था खराब हो गई।

इसी समय कोरोना वायरस का खतरा सामने आ गया। खराब अर्थव्यवस्था के चलते लुकाशेंको कोरोना वायरस के खिलाफ असमर्थ साबित हुए। लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं। उन्हें कोई राहत भी नहीं मिली। इसने लुकाशेंको के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को और भड़ाकाया। मजबूरन लुकाशेंको को पुतिन की शरण में जाना पड़ा और साथ ही विलय के लिए भी हामी भरनी पड़ी।

मीडिया रिपोर्ट्स में आया है कि पुतिन क्रीमिया की ही तरह बेलारूस को भी रूस के साथ मिलाने की योजना तैयार कर रहे हैं। इससे उन्हें राजनीतिक तौर पर बहुत फायदा होगा। उनकी स्ट्रांग मैन की छवि और मजबूत होगी।

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दूसरी तरफ पुतिन को यह भी आशंका है कि अगर बेलारूस में 26 साल से सत्ता में बैठे लुकाशेंको के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं, तो कल को उनके खिलाफ भी ऐसा हो सकता है। इसलिए पुतिन ने बिना किसी देरी के मीडिया को तुरंत बेलारूस भेज दिया। अगर लुकाशेंको की सरकार गिर जाती है तो ऐसे में पुतिन सबकुछ अपने हाथों में लेने की कोशिश करेंगे। पुतिन की आशंका को खुद लुकाशेंको ने सिमोन्या को दिए गए इंटरव्यू में पुष्ट किया था। लुकाशेंको ने कहा था- अगर आज बेलारूस का पतन होता है तो अगला नंबर रूस का होगा।