अधिकार, प्रतिनिधित्व और रोजगार पर जोर, भोपाल डिक्लेरेशन-2 मंथन में उठे ये बड़े मुद्दे

साल 2002 में आया भोपाल डिक्लेरेशन दलित-आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में एक अहम दस्तावेज़ माना गया था। 25 साल बाद बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में इसे नए सिरे से रिवाइव की जा रही है।

Updated: Jan 13, 2026, 07:25 PM IST

भोपाल। भोपाल डिक्लेरेशन-2 को लेकर आयोजित मंथन कार्यक्रम में दलित-आदिवासी अधिकारों, संविधान, आरक्षण और प्रतिनिधित्व से जुड़े कई अहम मुद्दों पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम में नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कहा कि “भोपाल डिक्लेरेशन-2” एक लंबे संघर्ष की शुरुआत है।

इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि यह पूरा कैंपेन ST-SC वर्ग के समग्र उत्थान को लेकर है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के युवाओं को रोजगार और उद्योग के अवसर दिए जाने चाहिए तथा उन्हें शासकीय कॉन्ट्रैक्ट मिलना चाहिए। सिंह ने कहा कि संवाद के माध्यम से भोपाल डिक्लेरेशन-2 के एजेंडे को आम जनमानस तक ले जाया जाएगा और इसे और अधिक मजबूत किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सत्ता में बैठे लोगों की नीयत साफ नहीं होगी, तो नीतियां कितनी भी बन जाएं, बदलाव संभव नहीं है।

कांग्रेस नेता के. राजू ने कहा कि IIT-IIM जैसे संस्थानों में दलित-आदिवासी छात्रों की आत्महत्याओं की संख्या बढ़ रही है। ऐसी घटनाएं उच्च शिक्षा में व्याप्त भेदभाव को उजागर करती हैं। उन्होंने राहुल गांधी द्वारा रोहित वेमुला एक्ट लागू करने की प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए कहा कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस सरकारों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

यह भी पढ़ें: न्यायपालिका में SC-ST वर्ग की हिस्सेदारी की मांग, 21 बिंदुओं के साथ भोपाल डिक्लेरेशन-2 का ड्राफ्ट तैयार

संविधान सभा की चर्चा का हवाला देते हुए के. राजू ने कहा कि जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था “अगर लोकतंत्र को समझना है तो आदिवासियों को पढ़िए,” लेकिन शेड्यूल-5 और शेड्यूल-6 के क्रियान्वयन में आज भी भारी कमी है। मनरेगा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में मनरेगा से SC-ST वर्ग को बड़ा लाभ मिला है, आय बढ़ी है और पलायन में कमी आई है, लेकिन आज मनुवादी ताकतें इसे खत्म करना चाहती हैं। उन्होंने न्यायपालिका में आरक्षण और संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के भीतर SC-ST वर्ग को शामिल करने की मांग भी उठाई।

डोमा परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदित राज ने भोपाल डिक्लेरेशन को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जब तक यह जनता की आवाज नहीं बनेगा, तब तक सरकार पर दबाव नहीं बनेगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने SC-ST वर्ग को सबसे अधिक अधिकार दिए, लेकिन हमने ही कांग्रेस का विरोध किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि मनुवादी ताकतें सत्ता में आ गईं। निजी क्षेत्र में आरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जब तक भाजपा सत्ता में है, यह संभव नहीं है, लेकिन निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के मुद्दे पर सबसे अधिक दबाव बनाया जाना चाहिए।

ट्राइबल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि भोपाल डिक्लेरेशन-2 का मुख्य उद्देश्य दलित-आदिवासियों के अधूरे अधिकारों और बढ़ते अन्याय के खिलाफ एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना है। उन्होंने कहा कि जब तक लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा, तब तक मंज़िल तक पहुंचना संभव नहीं है। डॉ. भूरिया ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2002 में भोपाल डिक्लेरेशन के माध्यम से देश को जो रास्ता दिखाया था, आज मध्य प्रदेश फिर पूरे देश को दिशा दिखा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि माइनिंग आदिवासियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। जंगल तेजी से खत्म किए जा रहे हैं। उन्होंने मांग की कि खनन के लिए जमीन लीज पर दी जाए और जंगलों पर पूर्ण अधिकार आदिवासियों का हो।

यह भी पढ़ें: भोपाल में दलित-आदिवासी संगठनों का साझा मंथन, समावेशी परामर्श से भोपाल डिक्लेरेशन-2 बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ

गौरतलब है कि साल 2002 में सामने आया भोपाल डिक्लेरेशन दलित-आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में एक अहम दस्तावेज़ माना गया था। 25 साल बाद बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में इसे नए सिरे से रिवाइव करने की ज़रूरत महसूस की गई। आयोजकों का कहना है कि आज संविधान, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, भूमि और वन अधिकार जैसे मुद्दों पर नए सिरे से संघर्ष की ज़रूरत है। "भोपाल डिक्लेरेशन 2" इस संघर्ष को नई धार देगा।