किराए की जनता से सरकारी जश्न की तैयारी, वर्तमान आदिवासी गौरव स्ट्रीट लाइट में पढ़ने को मजबूर

भोपाल में जब जनजाति गौरव दिवस का महोत्सव मनाया जा रहा है, ठीक उसी वक़्त मंदसौर में राष्ट्रीय स्तर की आदिवासी हॉकी खिलाड़ी की झोपड़ी तोड़ने की तैयारी चल रही है, परीक्षा के एक हफ्ते पहले घर की लाइट भी काटी जा चुकी है

Updated: Nov 14, 2021, 08:25 PM IST

किराए की जनता से सरकारी जश्न की तैयारी, वर्तमान आदिवासी गौरव स्ट्रीट लाइट में पढ़ने को मजबूर

मंदसौर। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आदिवासी गौरव दिवस की तैयारियां जोरों पर हैं। सोमवार को बिरसा मुंडा की जयंती पर पीएम मोदी भोपाल आ रहे हैं। पीएम मोदी के इस कार्यक्रम में प्रदेशभर से आदिवासी समाज के लोगों को भोपाल लाया जा रहा है। उधर भोपाल से करीब 300 किलोमीटर दूर मंदसौर में नेशनल हॉकी खिलाड़ी व आदिवासी समाज की बेटी से उसका आशियाना छीनने की तैयारी चल रही है।

मध्य प्रदेश जूनियर हॉकी की खिलाड़ी सागू डाबर अपनी मां के साथ मंदसौर स्टेडियम परिसर में एक झोपड़ी बनाकर रहती हैं। आदिवासी समुदाय से आने वाली सागू एक दो नहीं बल्कि 10 बार नेशनल लेवल पर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। सागू जब नेशनल खेलों में प्रदेश का नेतृत्व करती हैं तो 'झोपड़ी से निकला हुनर' जैसे अखबारों के हेडलाइन बनते हैं लेकिन उनकी झोपड़ी अंधेरे में डूबी है और प्रदेश उनके समाज के गौरव दिवस से जगमग हो रहा है। यह ऐसा समय है जब 19 नवंबर से सागू की प्री बोर्ड परीक्षाएं शुरू होनी हैं। मजबूरी में सागू स्ट्रीट पर लगी एक लाइट के नीच बैठकर पढ़ाई कर रही हैं। लेकिन अब सरकारी फरमान आया है कि झोपड़ी भी तोड़ दी जाए।

दरअसल सागू की झोपड़ी सरकारी जमीन पर है, जिसे प्रशासन अवैध मानकर तोड़ रहा है। मंदसौर में प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत सरकारी जमीन पर रहना अतिक्रमण की श्रेणी में आता है और प्रशासन की नजर में यह एक अपराध है। मंदसौर तहसीलदार ने सागू के घर एक नोटिस भेजा है जिसमें 7 दिन के भीतर घर छोड़कर कहीं और व्यवस्था करने का फरमान है। इस नोटिस के अगले ही दिन बिजली विभाग ने घर का कनेक्शन भी काट दिया जिसके बाद से पूरा परिवार अंधेरे में बैठता है।

सागू के पिता की 18 साल पहले मौत हो चुकी है। एक भाई जो कमाने वाला था दो साल पहले उसकी भी करंट लगने से मौत हो गई। इन दुखों के पहाड़ के साथ भी सागू की मां मेघा डाबर ने सागू का हौसला कभी कम न होने दिया। उनकी मां आस–पड़ोस के घरों में झाड़ू, पोछा और बर्तन माँजती हैं। इसमें सागू भी कभी कभी मां की मदद करती हैं। सागू कार भी धुलकर कुछ पैसे कमाती हैं। उनके पास रहने का घर तो दूर ढंग की झोपड़ी भी नहीं है। लेकिन खेल के प्रति सागू की निष्ठा ने प्रदेशभर में उनकी पहचान बनाई है।  

 सागू का जीवन संघर्षों की पूरी दास्तान है, लेकिन इन सबके बीच उन्होंने देश में अपना नाम बनाया है। लेकिन प्रदेश सरकार उन्हें सम्मानित करने की बजाय उनका ठिकाना उजाड़ रही है। ऐसे में युवा आदिवासी नेता विक्रांत भूरिया ने सागू की इस हालत के लिए शिवराज सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। विक्रांत ने कहा, 'BJP का आदिवासी प्रेम बेनकाब हो गया है। आदिवासी समाज का नाम रौशन करनेवाली सागू अंधेरे में रात गुजार रही है। इतने से शिवराज प्रशासन के कलेजे पर ठंडक नहीं पड़ी तो उन्होंने घर तुड़वाने का फरमान जारी कर दिया। कल भोपाल में एक ढोंगी के कार्यक्रम के लिए करोड़ों रुपए फूंके जाएंगे। लेकिन यह फर्जी मामू एक भांजी जो नेशनल खिलाड़ी है उसे घर नहीं दे सकता। इनकी कल्पना में तो सुखी और समृद्ध आदिवासी है ही नहीं, इनके मन में आदिवासियों के लिए सिर्फ नफरत भरा है।'

दरअसल प्रदेश में लगभग इक्कीस फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय से है और यह वर्ग हमेशा से कांग्रेस का बड़ा जनाधार रहा है। लेकिन अब  मोदी और शिवराज की भाजपा सरकार उन्हें अपना वोट बैंक बनाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। बीते उपचुनाव और उसके बाद लगातार हो रहे केंद्र के बड़े नेताओं के कार्यक्रम यह तय बताते हैं कि बीजेपी का फोकस सवर्ण से आदिवासी और दलित की तरफ जा रहा है। हालांकि आदिवासी इलाकों से आए दिन अत्याचार की खबरें आम हैं। घर तोड़ना, जमीनें हड़पना, मारपीट और महिलाओं के साथ दुराचार एमपी में एक नियमित घटना बनती जा रही है।