टीचर्स के मीम बनाने पर स्कूल से निकाला, सुप्रीम कोर्ट ने ICSE बोर्ड से मांगा जवाब

इंस्टाग्राम पर शिक्षकों के मीम्स शेयर करने पर इंदौर के छात्र को स्कूल से निकालने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया है। जस्टिस नागरथना ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।

Updated: Feb 07, 2026, 06:44 PM IST

इंदौर। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर शिक्षकों से जुड़े मीम्स शेयर करने के आरोप में स्कूल से एक्सपेल किए गए इंदौर के 14 वर्षीय छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मामले में हस्तक्षेप करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी परिस्थिति में बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार, आईसीएसई बोर्ड और संबंधित स्कूल प्रबंधन को नोटिस जारी कर 13 फरवरी 2026 तक जवाब मांगा है।

जस्टिस बी.वी. नागरथना और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामला केवल स्कूल अनुशासन तक सीमित नहीं है बल्कि एक नाबालिग छात्र के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से यह भी पूछा है कि छात्र को बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने के लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी संबंधित संस्थाएं अपने जवाब में स्पष्ट करें कि छात्र की शिक्षा जारी रखने की जिम्मेदारी किसकी होगी।

यह भी पढ़ें:इंदौर के बाद भोपाल में भी नाले का पानी सप्लाई, गायत्री नगर के रहवासियों ने अफसरों को दिखाया काला पानी का सैंपल

यह मामला इंदौर के लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल से जुड़ा है। आरोप है कि 9वीं कक्षा के छात्र ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर इंस्टाग्राम पर एक प्राइवेट अकाउंट बनाया था। जहां वह शिक्षकों से जुड़े कथित आपत्तिजनक मीम्स शेयर करता था। स्कूल प्रबंधन को इसकी जानकारी मिलने के बाद इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए छात्र को निष्कासित कर दिया गया।

स्कूल से निकाले जाने के बाद छात्र के परिवार ने इंदौर हाईकोर्ट का रुख किया था लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट में छात्र की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने दलील दी कि कथित गलती के बदले छात्र को स्कूल से निकालना असंगत और अत्यधिक कठोर कार्रवाई है। 

उन्होंने कहा कि 13-14 साल के बच्चे में किसी को अपमानित करने की आपराधिक मंशा तलाशना उचित नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि ऐसी कार्रवाई को वैध माना गया तो स्कूलों को छात्रों के मोबाइल फोन और निजी डिजिटल गतिविधियों पर असीमित निगरानी का अधिकार मिल सकता है जो निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

यह भी पढ़ें:इटारसी–पथरोटा मार्ग पर दर्दनाक हादसा, अनियंत्रित होकर नहर में जा गिरी तेज रफ्तार कार, 3 युवकों की मौत

इससे पहले इंदौर हाईकोर्ट ने छात्र को राहत देने से इनकार करते हुए कहा था कि समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए इस प्रकार के मामलों में सख्त संदेश जाना आवश्यक है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब अनुशासन और शिक्षा के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की दिशा में पहल की है।

अब इस मामले में 13 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई अहम मानी जा रही है। अदालत यह तय कर सकती है कि छात्र को उसी स्कूल से परीक्षा देने की अनुमति दी जाए या फिर आईसीएसई बोर्ड किसी वैकल्पिक परीक्षा केंद्र से छात्र को परीक्षा में शामिल होने की विशेष अनुमति प्रदान करे। सुप्रीम कोर्ट का इस बात पर जोर दिया कि छात्र का शैक्षणिक सत्र प्रभावित न हो और उसकी पढ़ाई निरंतर जारी रहे।

यह भी पढ़ें:पटना पुलिस ने आधी रात सांसद पप्पू यादव को किया गिरफ्तार, तबियत बिगड़ने के बाद PMCH में भर्ती