आखिर कौन हैं कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले कथित किसान

सोमवार को कृषि कानूनों के समर्थन में 20 किसान नेताओं के कृषि मंत्री से मिलने का दावा किया गया, लेकिन क्या वे सचमुच किसान थे जो नरेंद्र सिंह तोमर से मिले थे, जवाब इस खबर में है

Updated: Dec 10, 2020, 01:41 AM IST

आखिर कौन हैं कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले कथित किसान
Photo Courtesy : New Indian Express

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के ज़बरदस्त आंदोलन के बीच जब कुछ किसान नेताओं के सरकार का समर्थन करने की खबर आई तो बीजेपी के नेताओं और समर्थकों ने उसका बढ़-चढ़कर स्वागत किया। लेकिन अब खुलासा हो रहा है कि कृषि कानूनों के समर्थन में कृषि मंत्री तोमर से मुलाकात करने वाले दरअसल कोई किसान नेता नहीं, बल्कि बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता-समर्थक, वकील या छोटी-मोटी कृषि उत्पादक कमेटी से जुड़े लोग हैं। इनकी प्रोफाइल का खुलासा अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है।

किसान नेता बताए गए इन 20 लोगों ने सोमवार को न सिर्फ कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की, बल्कि बाकायदा अपने हस्ताक्षर के साथ कृषि मंत्री को एक ज्ञापन भी दिया, जिसमें कृषि कानूनों को रद्द न करने की अपील की गई थी। इंडियन एक्सप्रेस ने इन लोगों से बातचीत की तो अधिकांश का कुछ और ही परिचय सामने आया। क्या है वो परिचय आइए जानते हैं :   

1. पुष्पेंद्र चौहान 
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पुष्पेंद्र चौहान दिल्ली की अदालतों में प्रैक्टिस करते हैं। पुष्पेंद्र 1985 से दिल्ली में रह रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने जो जानकारी दी है उसके मुताबिक पुष्पेंद्र हरियाणा से सटे, उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के रहने वाले हैं। पुष्पेंद्र के पास साढ़े तीन एकड़ कृषि भूमि है। पुष्पेंद्र चौहान ने कहा कि वे किसी भी संगठन से जुड़े हुए नहीं हैं लेकिन 1985 में भारतीय भाषाओं से जुड़े एक आंदोलन में उन्होंने हिस्सा लिया था। चौहान ने कहा कि उन्होंने कृषि कानूनों को समर्थन कुछ शर्तों के आधार पर दिया है। 

2. कँवल सिंह चौहान 
कँवल सिंह चौहान ने जिन्होंने प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया, वे हरियाणा के सोनीपत ज़िले के अटेरना गाँव के निवासी हैं। 2019 में मोदी सरकार के कार्यकाल में इन्हें पद्मश्री के सम्मान से सम्मानित भी किया जा चुका है। पेशे से वकील कँवल सिंह चौहान 1996 में हरियाणा की राय विधानसभा सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। 1999 के लोकसभा चुनावों में कँवल सिंह चौहान कांग्रेस के विरोध में एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। हालांकि चौहान का दावा है कि उनका एक किसान क्लब भी है, जिसमें 50 की भारी-भरकम संख्या में किसान जुड़े हुए हैं।  

3. विनोद गुलिया 
विनोद गुलिया भड़सा गाँव के रहने वाले हैं। यह गाँव हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष ओम प्रकाश धनकड़ की विधानसभा सीट बदली के अंतर्गत आता है। विनोद गुलिया कृषक उत्पादक संगठन चलाते हैं ( यही दावा तोमर से मिले ज़्यादातर लोगों ने किया है )। गुलिया ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उनकी एक जैविक आहार कंपनी है, जिसमें तकरीबन 550 शेयर होल्डर हैं। उनकी कंपनी किसानों को खाद्य, मशीन और बीज जैसी ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध कराती है। गुलिया ने कहा कि अगर मोदी जी कुछ कहते हैं तो हमें भरोसा करना चाहिए। गुलिया ने यह बात एमएसपी के संदर्भ में कही। विनोद गुलिया ने कहा कि किसानों की समस्या को सुलझाने के लिए एक अलग कोर्ट की व्यवस्था होनी चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस ने अपने सूत्रों के हवाले से इस बात की पुष्टि की है कि विनोद गुलिया सीधे तौर पर बीजेपी से ताल्लुक रखते हैं। 

4. दीपक राजैन    
दीपक राजैन इंडियन एक्सप्रेस को पहले ऐसे व्यक्ति मिले जिन्होंने खुले तौर पर यह स्वीकारा कि वे बीजेपी से जुड़े हुए हैं। झज्जर ज़िले के रहने वाले दीपक ने यह भी कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रबल समर्थक हैं। दीपक राजैन के धौर किसान संगठन से भी 74 लोगों की विशाल संख्या में किसान जुड़े हुए हैं। दीपक ने बताया कि वे पेशे से वकील भी हैं और उन्होंने काफी समय तक झज्जर कोर्ट में प्रैक्टिस भी की है। दीपक ने कहा कि उनके पास चार एकड़ की भूमि है, और चाचा की भूमि को मिलकर वे 8 एकड़ की भूमि पर खेती करते हैं। दीपक ने खुले तौर पर कृषि कानूनों को किसानों के हित में बताया।

5. सतपाल सिंह 
बहादुरगढ़ के रहने वाले सतपाल सिंह बताते हैं कि वे नूना माजरा नामक कृषक उत्पादक संगठन के संचालक हैं। उनके संगठन से कुल 94 लोग जुड़े हुए हैं। सतपाल सिंह ने कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा कि वे ओपन मार्केट सिस्टम का समर्थन करते हैं। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एमएसपी का कायम रहना ज़रूरी है। सतपाल सिंह ने कहा कि किसानों से एमएसपी से कम दामों पर फसल खरीदने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए और किसानों के 'बेटों' को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलना चाहिए। हालांकि यहां पर यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि 'बेटियां पराया धन होती हैं और केवल ब्याहने के लिए होती हैं' वाला ट्रेडमार्क डायलॉग सतपाल सिंह ने नहीं मारा। उन्होंने स्पष्ट तौर पर किसानों के बेटों के लिए ही सरकारी नौकरी में कोटा निर्धारित करने की मांग की है। बता दें कि बहादुरगढ़ में सतपाल सिंह दस एकड़ भूमि के मालिक हैं और भाजपा से जुड़े हुए भी हैं।  

कमोबेश यही स्थिति तोमर से मिलने वाले बाकी कथित किसानों की भी थी। आर्थिक संपन्नता और भाजपाई समानता लगभग सभी किसानों की एक या एक सी ही थी। हालांकि इन कथित किसानों में कुछ एक ऐसे भी थे जिन्होंने कृषि कानूनों को लेकर विरोध कर रहे किसानों की मांग को जायज़ ठहराया। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों की बात मान लेनी चाहिए। 

दूसरी तरफ राजनीतिक हलकों में भाजपा समर्थित कथित किसानों और तोमर की मुलाक़ात को लेकर यह भी चर्चा है कि यह हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से प्रायोजित किया गया था। क्योंकि पिछले दिनों दिल्ली की सीमा पर शुरू हुआ किसान आंदोलन पंजाब और हरियाणा के रास्ते ही हो कर आया था। जिसको लेकर बीजेपी का केंद्र नेतृत्व खट्टर से नाराज़ है। उसे लग रहा है कि आखिर बीजेपी की सरकार होने के बावजूद हरियाणा में किसान आंदोलन को दबाया क्यों नहीं जा सका? यह चर्चा भी ज़ोरों पर है कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व इस मामले को लेकर खट्टर से इतना नाराज़ है कि आने वाले दिनों में राज्य की सत्ता में फेरबदल से भी इनकार नहीं किया सकता। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी खट्टर सरकार के अस्थिर होने का दावा कर चुके हैं।