दिग्विजय सिंह ने संसद में पूछा सवाल, पर वित्त मंत्री ने नहीं बताया क्या है बैंकों के निजीकरण का आधार

दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा में पूछा, दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फ़ैसला किन मानकों के आधार पर किया गया है, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस सवाल का जवाब देने से साफ़ इनकार कर दिया

Updated: Mar 17, 2021, 10:56 AM IST

दिग्विजय सिंह ने संसद में पूछा सवाल, पर वित्त मंत्री ने नहीं बताया क्या है बैंकों के निजीकरण का आधार
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नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस साल के बजट में दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का एलान कर चुकी हैं, लेकिन देश की संसद में वो यह बताने को तैयार नहीं हैं कि बैंकों का निजीकरण किन मानकों के आधार पर किया जा रहा है। मोदी सरकार की वित्त मंत्री का यह चौंकाने वाला रवैया राज्यसभा में उस वक्त देखने को मिला, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने उनसे इस बारे में एक सीधा सवाल पूछ लिया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सवाल का जवाब देने की जगह झुंझलाती नजर आईं। 

दरअसल कांग्रेस सांसद ने मंगलवार को राज्यसभा में वित्त मंत्री से पूछा कि केंद्र सरकार ने सरकारी बैंकों के निजीकरण का जो एलान किया है, उससे लोगों में भारी आक्रोश है। इसलिए वित्त मंत्री बताएं कि आखिर सरकार ने बैंकों के निजीकरण का फैसला किन नीतियों और निर्धारित मानकों के आधार पर किया है। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सवाल का जवाब देने की जगह सिर्फ इतना कहकर बैठ गईं कि उनकी राय में यह सवाल प्रासंगिक नहीं है। इस पर दिग्विजय सिंह ने बार-बार ज़ोर देकर कहा कि वित्त मंत्री एक वाजिब सवाल से बचने की कोशिश कर रही हैं। लोगों में बैंकों के निजीकरण को लेकर भारी नाराज़गी है, लिहाजा उन्हें इसका जवाब देना चाहिए। लेकिन बार-बार कहे जाने पर भी वित्त मंत्री विपक्ष के वरिष्ठ सांसद के अहम सवाल का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी।

दरअसल केंद्र सरकार दो सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण करने की योजना बना रही है। इसकी जानकारी खुद सरकार ने बजट सरकार के दौरान दी है। इसके बाद से ही बैंक कर्मचारियों के बीच सरकार के इस फैसले का भारी विरोध हो रहा है। सोममवार और मंगलवार को देश भर के सरकारी बैंकों के लाखों कर्मचारियों ने सरकार के इस फैसले के विरोध में दो दिन की हड़ताल भी रखी। लेकिन वित्त मंत्री ने जिस तरह से संसद में सवाल पूछे जाने के बावजूद उसका जवाब नहीं दिया, उससे यह मसला और भी बड़े सवालों में घिर गया है।

वित्त मंत्री के रवैये से उठे अहम सवाल

बैंकों के निजीकरण के बारे में अगर सरकार की नीतियां और मानदंड स्पष्ट और पारदर्शी हैं, तो दिग्विजय सिंह के सवाल ने तो वित्त मंत्री को अपना पक्ष और मजबूती के साथ देश के सामने रखने का एक मौका ही दिया था। फिर भला उन्होंन इसका जवाब क्यों नहीं दिया? क्या इसका मतलब है कि इतने बड़े फैसले के बारे में सरकार की नीति और मानदंड साफ नहीं हैं? या फिर सरकार उन्हें सबके सामने पेश करने से हिचकिचा रही है? एक गंभीर सवाल यह भी है कि अगर सरकार संसद में पूछे गए सवालों के जवाब भी नहीं देगी तो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति सरकार की जवाबदेही पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था का क्या मतलब रह जाएगा?