दफ्तर दरबारी: डायरेक्ट आईएएस का गुनाह और दोषी प्रमोटी आईएएस
MP News: प्रदेश में राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर आदिवासियों की जमीन औने-पौने दाम पर खरीदने की कई शिकायतें हैं। ऐसे मामलों में चार आईएएस के घिर जाने से लगता है कि अफसरों पर सख्त कार्रवाई हो रही है। मगर, वास्तव में यहां डायरेक्ट और प्रमोटी आईएएस के बीच का अंतर समझा जाना चाहिए। क्यों प्रमोटी आईएएस दोषी माने जा रहे हैं और डायरेक्ट आईएएच बच रहे हैं?
तीन पर केस, एक पूर्व आईएएस अंजू सिंह बघेल के खिलाफ चालान पेश होगा
प्रदेश में आदिवासी की जमीन औनेपौने दाम पर बेचने की अनुमति देने का मामला गरमा रहा है। आदिवासियों को जमीन बेचने की अनुमति देने के मामले में कुछ दिनों पहले जबलपुर लोकायुक्त ने ग्वालियर संभायुक्त दीपक सिंह, आबकारी आयुक्त ओपी श्रीवास्तव और अपर सचिव बसंत कुर्रे के खिलाफ मामला दर्ज किया है। अब एक रिटायर्ड आईएएस अंजू सिंह बघेल के खिलाफ चालान पेश होने जा रहा है।
ईओडब्ल्यू ने जांच के बाद सेवानिवृत्त आईएएस अंजू सिंह बघेल के खिलाफ दो मामले दर्ज किए हैं। लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त आईएएस बघेल पर दर्ज मामलों में चालान पेश करने की अनुमति दे दी है। सेवानिवृत्त आईएएस बघेल पर आरोप है कि उन्होंने कटनी में कलेक्टर रहते हुए आदिवासी की जमीन पहले किसी और के नाम करने तथा उस जमीन को फिर अपने बेटे के नाम करने की अनुमति दी थी। इस आर्थिक घोटाले को लेकर ईओडब्ल्यू ने मामले दर्ज किए हैं। 2009 में निलंबित की गई आईएएस अंजू सिंह बघेल अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं।
प्रदेश भर में आदिवासियों की जमीन की औने-पौने दाम पर खरीदी तथा इन मामलों में राजनीतिक रसूख के इस्तेमाल की कई शिकायतें की गई हैं। इस तरह आदिवासियों की जमीन खरीदने की अनुमति देने के मामलों में चार आईएएस के घिर जाने से लगता है कि अफसरों पर सख्त कार्रवाई हो रही है। मगर, वास्तव में यहां सीधी भर्ती यानी डायरेक्ट आईएएस और प्रमोटी आईएएस के बीच का अंतर समझा जाना चाहिए। जिन चार आईएएस पर कार्रवाई की तलवार लटकी हैं वे चारों राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर हैं तथा प्रमोट हो कर आईएएस बने हैं।
अंजू सिंह बघेल के अलावा जिन तीन आईएएस पर मामला दर्ज हुआ है वे उस वक्त जिले के कलेक्टर नहीं थे। 2007 से 2012 के बीच कुंडम तहसील अंतर्गत लगभग दो दर्जन आदिवासियों को नियम विरूध्द तरीके से जमीन बेचने की अनुमति प्रदान की गई थी। यह अनुमति तत्कालीन एडीएम दीपक सिंह, ओपी श्रीवास्तव और बंसत कुर्रे द्वारा प्रदान की गई थी।
भू-राजस्व आचार संहिता में तय है कि आदिवासियों को जमीन बेचने के अनुमति देने के अधिकार जिला कलेक्टर के पास हैं। जिला कलेक्टर जानते हैं कि इन मामलों में वे आगे जा कर फंस सकते हैं इसलिए वे अपने अधिकार एडीएम को स्थानांतरित कर देते हैं। हुआ भी ऐसा ही। दस साल बाद जब मामला दर्ज होने और कार्रवाई की बारी आई तो सीधी भर्ती के आईएएस तो बच गए, दोष तीन प्रमोटी आईएएस पर आ गया।
सीएम के एजेंडे के लिए राष्ट्रपति का सम्मान ताक पर
राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होना फख्र का विषय माना जाता है। इस मौके कौन भला हाथ से जाने देगा मगर मध्य प्रदेश के आठ कलेक्टरों को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के हाथों सम्मानित होना रास नहीं आया। इन कलेक्टरों ने अपनी जगह अपने अधीनस्थों को दिल्ली भेज दिया।
दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम के अंतर्गत देश के 75 जिलों के कलेक्टर को भूमि सम्मान दिया। इसमें मध्य प्रदेश के 15 जिलों के कलेक्टरों को भाग लेना था। इंदौर, गुना, हरदा, सीधी, अनूपपुर, उज्जैन और विदिशा का सम्मान तो जिला कलेक्टर ने ग्रहण किया लेकिन प्रदेश के 8 जिलों के कलेक्टरों ने नई दिल्ली की जरूरत नहीं समझी। कि किसी ने संयुक्त कलेक्टर को तो किसी ने उपनिरीक्षक या एसएलआर यानी अधीक्षक भू अभिलेख को सम्मान लेने के लिए भेज दिया। आगर मालवा का पुरस्कार संयुक्त रजिस्ट्रार राजेंद्र सिंह रघुवंशी, अलीराजपुर का अपर कलेक्टर अनुपमा निनामा, भोपाल का पुरस्कार अपर कलेक्टर माया अवस्थी, खरगोन का पुरस्कार डिप्टी कलेक्टर प्रताप कुमार अगासिया, नीमच का पुरस्कार अपर कलेक्टर नेहा मीणा, सिंगरौली का पुरस्कार डिप्टी कलेक्टर ऋषि पवार, टीकमगढ़ का पुरस्कार संयुक्त कलेक्टर संजय कुमार जैन, उमरिया का पुरस्कार अधीक्षक भू अभिलेख सतीश सोनी ने ग्रहण किया।
असल में, राज्य सरकार सभी जिलों में 16 जुलाई से 14 अगस्त तक विकास पर्व मना रही है। विकास पर्व के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश भर का दौरा कर निर्माण एवं विकास कार्यों का लोकार्पण और भूमिपूजन कर रहे हैं। विकास पर्व के दौरान सीएम कई जिलों में रात्रि विश्राम भी करेंगे। चुनाव सिर पर हैं और राज्य सरकार की प्राथमिकता वाले कार्यक्रम में किसी तरह की चूक न रह जाए इसलिए कलेक्टरों ने राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने का मौका छोड़ कर जिले में रहने में ही भलाई समझी।
एक कलेक्टर आखिर क्या करें?
भोपाल कलेक्टर बनने के बाद आईएएस आशीष सिंह ने सबसे पहले जो काम किए उनमें शहर भ्रमण का सिलसिला आरंभ करना भी है। बीते कुछ सालों से भोपाल के कलेक्टर रहे अधिकारियों ने औचक निरीक्षण तथा भ्रमण की परंपरा को भूला दिया था। आईएएस आशीष सिंह ने पदभार संभालते ही मई में शहर की व्यवस्था को समझने का काम किया।
अधिकारियों के साथ भ्रमण कर उन्होंने 13 ब्लैक स्पॉट खोजे जहां अव्यवस्थित पार्किंग, अतिक्रमण, यातायात समस्या, दुकान तथा हाट लगने से कई तरह की दिक्कतें पेश आ रही थीं। इन ब्लैक स्पॉट को तीन माह में खत्म करने का लक्ष्य रखा गया। साथ ही उन्होंने स्कूल और जेपी अस्पताल का औचक निरीक्षण कर गायब शिक्षकों और डॉक्टरों पर कार्रवाई भी की। जेपी अस्पताल की व्यवस्था में सुधार की कलेक्टर आशीष सिंह की कोशिशों की तारीफ पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने ट्वीट कर की।
बेहतर पहल और सुधार की इन कोशिशों की तारीफ के बाद भी अपनी कोशिशों में कलेक्टर आशीष सिंह अकेले पड़ते दिखाई दे रहे हैं। न्यू मार्केट के हाट बाजार को हटाने और यातायाता सुगम बनाने की उनकी कोशिशों पर व्यापारियों की समस्या तथा राजनीतिक हस्तक्षेप भारी पड़ रहा है। आजाद मार्केट, दस नंबर मार्केट, बंसल अस्पताल के सामने यातायात में सुधार की पहल अभी सुस्त कदम से चल रही है। कलेक्टर द्वारा तय की गई तीन माह की समय सीमा में कितना सुधार होगा कहना मुश्किल है।
कहां है रौनके महफिल सभी ढूंढ़ते हैं
2013 बैच के आईएएस विकास मिश्र को नवंबर में डिंडौरी जिले कलेक्टर बनाया गया था। कभी मुख्य सचिव के डिप्टी सेक्रेटरी रहे विकास मिश्र जब पहली बार कलेक्टर बनाए गए तो उन्होंने डिंडोरी में सुबह भ्रमण शुरू किया। उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें वे एक आदिवासी महिला के हाथ पर अपना मोबाइल नंबर लिखते दिखाई रहे हैं। महिला की समस्या देख वे परेशान हो गए थे और जब कोई कागज नहीं मिला तो उन्होंने महिला के हाथ पर ही अपना फोन नंबर लिख दिया था।
इतना नहीं उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी सार्वजनिक कर दिया था ताकि किसी भी समस्या पर सीधे कलेक्टर से संपर्क किया जा सके। इस नवाचार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भी तारीफ मिली थी। सीएम शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अफसरों को कलेक्टर विकास मिश्र का अनुसरण करना चाहिए।
अब कुछ माह बाद प्रशासनिक गलियारों में कलेक्टर विकास मिश्र की चर्चा है। यह चर्चा उनके किसी नवाचार को लेकर नहीं बल्कि 'गायब' होने को लेकर हैं। वे किसी नए कार्य के साथ खबरों में दिखाई नहीं दे रहे हैं। सूचना तो यही है कि उनका नंबर इतना बांटा गया कि लोगों ने फोन लगा-लगा कर उन्हें परेशान कर दिया। रात-दिन, असमय फोन से परेशान हुए कलेक्टर विकास मिश्र ने सोशल मीडिया पर चमकने की जगह बुनियादी कामों पर ध्यान लगा दिया है।