होशंगाबाद में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के नाम पर ठगी, ज़हर का हवाला देकर फसल ख़रीदने से कंपनी का इनकार

होशंगाबाद के पिपरिया प्रखंड में सैकड़ों किसानों के साथ कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के नाम पर ठगी का मामला सामने आया है, जबकि कंपनी ने किसानों के साथ अनुबंध किया था

Updated: Dec 24, 2020, 01:24 AM IST

होशंगाबाद में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के नाम पर ठगी, ज़हर का हवाला देकर फसल ख़रीदने से कंपनी का इनकार
Photo Courtesy: News Click

होशंगाबाद। मध्य प्रदेश में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के दुष्परिणाम आने शुरू हो गए हैं। होशंगाबाद के पिपरिया विकास खंड में किसानों की फसल में ज़हर का हवाला देकर फॉर्च्यून कंपनी ने फसल खरीदने से मना कर दिया है। कंपनी ने किसानों के साथ किया करार भी निरस्त कर दिया है। पिपरिया के एक स्थानीय वेबपोर्टल की मानें तो पिपरिया के गाड़ाघाट गांव में किसानों ने डीलर के माध्यम से धान खरीदने वाली कंपनियों से अनुबंध किया था। लेकिन बाद में कंपनी ने किसानों की फसल में हैक्सा कीटनाशक की मात्रा अधिक होने का हवाला देकर फसल खरीदने से इनकार कर दिया। अब डीलर किसानों से उनकी फसल का दोबारा टेस्ट कराने के लिए 8 हज़ार रुपए मांग रहे हैं।

पिपरिया विकास खंड के गाड़ाघाट निवासी बृजेश पटेल ने अपनी आपबीती सुनाई है। बृजेश पटेल ने हिन्दी न्यूज चैनल एडीटीवी को बताया कि उन्होंने 20 एकड़ में धान लगाया था। लेकिन अब वे अपनी फसल को अपने खलिहान में ही छोड़ने के लिए मजबूर हैं। पटेल ने बताया कि कंपनी ने धान उठाने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि राइस कंपनी के मुताबिक धान में हैक्सा (एक किस्म के कीटनाशक) की मात्रा आ गई है। बृजेश पटेल के अनुसार उन्होंने 2 बार लैब टेस्ट करवाया लेकिन एक बार भी उन्हें अपनी फसल की रिपोर्ट नहीं दी गई। पटेल का आरोप है फसल की रिपोर्ट देने के बदले उनसे 8 हज़ार मांगे जा रहे हैं। 

 ऐसे ही गाँव के घनश्याम पटेल, गोवर्धन पटेल ने भी वीटी नामक कम्पनी से धान बेचने का अनुबंध किया था लेकिन अब वह कंपनी भी सैंपल के फेल होने की बातकर धान नहीं ख़रीद रही है। पिपरिया टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से पीड़ित किसानों की संख्या सैकड़ों में हैं। 

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डीलर कंपनी तो कंपनी डीलर की बता रही है ज़िम्मेदारी 

इस पूरे प्रकरण में कंपनी डीलर की ज़िम्मेदारी बता कर अपना पल्ला झाड़ ले रही है तो वहीं डीलर का कहना है कि यह करार किसानों और कंपनियों  के बीच है, उनके और किसानों के बीच नहीं। पिपरिया टाइम्स ने फॉर्च्यून कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर अजय बाल्टियां से जब इस पूरे प्रकरण पर स्पष्टीकरण मांगा तो कंपनी के डायरेक्टर का कहना था कि हम जो सैम्पल फेल करते हैं, उसकी रिपोर्ट डीलर को लिखित में देते हैं। वही कीटनाशक दवा विक्रेता आशीष सोडनी का कहना है कि किसान सीधे कम्पनी से सेम्पल की रिपोर्ट ले सकता है। लेकिन किसानों का कहना है की जब अनुबंध में डीलर का नाम लिखा है तो हम कम्पनी से कैसे बात कर सकते हैं? 

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दोबारा टेस्ट कराने के पैसे मांग रहा है डीलर
अब चूंकि किसानों की फसल में ज़हर का हवाला देकर कंपनी ने किसानों के साथ किए अनुबंध को निरस्त कर दिया है, ऐसे में अब किसानों और कंपनी के बीच अनुबंध कराने वाला डीलर ( मिडल मैन ) फसल की दोबारा सैंपल कराने के लिए आठ हजार रूपए मांग रहा है।ऐग़्रो सर्विस सेंटर के मालिक आशीष सोडनी का कहना है कि कम्पनी स्वयं के खर्चे पर सिर्फ एक बार ही सैंपल भेजती है। लेकिन सैंपल फेल होने के बाद दोबारा सैंपल भेजने के लिए पैसा लगता है। किसानों ने जब सोडनी से पूछा कि यह सारी शर्तें अनुबंध में नहीं लिखी गईं तो उनका कहना था की यह जवाब तो फॉर्च्यून कम्पनी देगी। किसान चाहें तो सीधे कंपनी से बात कर सकते हैं।यहां गौर करने वाली बात यह है कि किसानों के पास सिवाय डीलर के अलावा किसी ओर का नम्बर नहीं है।

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अनुबंध में नहीं लिखा है अनाज की खरीदी का दाम 

पिपरिया टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी और किसानों के बीच हुआ अनुबंध कीटनाशक दवा दुकानदार के माध्यम से ही किया गया था। अनुबंध में किसानों के दस्तखत हैं, दवा दुकानदार का नाम है लेकिन उसके हस्ताक्षर नहीं है।  कंपनी और किसानों के बीच हुए अनुबंध में धान की खरीदी का भाव भी नहीं लिखा गया है। गाड़ाघाट निवासी बृजेश पटेल ने एक हिंदी न्यूज़ चैनल को भी बताया कि जो एक पन्ने का अनुबंध मिला है, जिसमें कंपनी का कोई सील-हस्ताक्षर नहीं हैं, जिस दुकान से दवा-खाद लेते हैं उसका नाम है लेकिन हस्ताक्षर उसके भी नहीं हैं। 

हाल ही में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नए कृषि कानूनों का फायदा बताते हुए पिपरिया के ही एक मामले का उदाहरण देते हुए कहा था नये कृषि कानूनों का किसानों को लाभ मिल रहा है। दिल्ली की कंपनी ने पिपरिया के किसानों से 3 हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का अनुबंध किया था। कंपनी ने बाद में खरीदी में आनाकानी की, तो एसडीएम ने कार्रवाई की और किसानों को न्याय मिला।

 लेकिन एक आंकड़े के मुताबिक़ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत अधिकतर किसानों को या तो व्यापारी या फिर कंपनी की ठगी का शिकार होना पड़ रहा है। अधिकतर किसान अपनी फसल के भुगतान के लिए पिछले चार पांच महीनों से दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। पिपरिया के गाड़ाघाट गाँव का ताज़ा उदाहरण स्थिति स्पष्ट करता है कि आखिर नए कृषि कानूनों के तहत कितने किसानों को न्याय मिल पा रहा है? 

उधर जिस किसान को शिवराज सिंह चौहान न्याय दिलाने का श्रेय लेकर कृषि कानूनों का बखान कर रहे हैं, उस किसान का क्या कहना है यह भी जान लेना ज़रूरी है। पुष्पराज सिंह ने एक हिंदी न्यूज़ चैनल को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के मसले पर कहा है कि वो कभी किसी किसान को कोंट्राक्ट फार्मिंग की सलाह नहीं देंगे। पुष्पराज ने कहा कि सरकार कह रही है कि किसान कहीं भी माल ले जाकर बेच सकते हैं लेकिन जब 200 क्विंटल धान पैदावार हुई तो क्या हम उसे बेचने केरल जाएंगे? उन्होंने कहा कि छोटे किसान अनुंबध की खेती में बर्बाद हो जाएंगे, पंजाब में आंदोलन चल रहा है इसलिये घबराहट में शिवराज जी ट्वीट कर रहे हैं। पुष्पराज ने आगे कहा, हम पिछले 4 साल से खेती कर रहे हैं लेकिन अनुबंध पर कभी दिक्कत नहीं आई। इस साल करार था कि मंडी का जो भी रेट होगा, उससे 50 रु. अधिक पर लेंगे. जब रेट 2300-2400 रुपये था, तब दिक्कत नहीं थी। जैसे ही 2950 रेट निकला और 3000 पर खरीदी का सवाल आया, फॉर्चून के साथ-साथ सभी कंपनियों के प्रतिनिधियों ने फोन बंद कर लिए। 

ज़ाहिर है शिवराज सिंह चौहान जिस किसान को न्याय दिलाने का दावा कर रहे हैं वो खुद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सरकारों द्वारा लागू किए कानूनों से अपनी सहमति नहीं रखता। पुष्पराज सिंह ने साफ शब्दों में बताया है कि वो खुद इन कानूनों का विरोध करते हैं।