इजराइल में अरब पार्टियां बनेगी सत्ता की धुरी
नेतन्याहू के 53 सीटों वाले गुट और विपक्ष के 48 सीटों वाले गुट को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में 19 सीटों वाली अरब पार्टियां पूरे राजनीतिक गणित में किंगमेकर की भूमिका में आ गई है।
इजराइल के हालिया आम चुनावों के अंतिम नतीजों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद में 53 सीटें हासिल हुई हैं। विपक्षी गठबंधन के गादी आइजेनकोट के नेतृत्व को 48 सीटें मिली हैं, जबकि अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने 19 सीटें हासिल की हैं। सरकार बनाने के लिए संसद में 61 सीटों का बहुमत आवश्यक है। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की 19 सीटें पिछले चुनावों की तुलना में लगभग दोगुनी है। अरब मतदाताओं ने नेतन्याहू सरकार और उसकी नीतियों के विरोध में एकजुट होकर मतदान किया, जिससे इजराइल का पारंपरिक दक्षिणपंथी राजनीतिक समीकरण बिगड़ गया।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों के बाद यह पहला चुनाव था। लंबे समय से चल रहे युद्ध, गहराते अंतरराष्ट्रीय अलगाव और सुरक्षा चूकों को लेकर जनता में उपजी थकान ने नेतन्याहू के खिलाफ माहौल को प्रभावित किया है। नेतन्याहू पर वर्षों से भ्रष्टाचार के आरोप चल रहे हैं। यदि वे सत्ता से बाहर होते हैं या बहुमत जुटाने में नाकाम रहते हैं, तो उनके खिलाफ चल रहे मामलों और 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलताओं की जांच का दायरा और कड़ा हो सकता है।
नेतन्याहू के 53 सीटों वाले गुट और विपक्ष के 48 सीटों वाले गुट को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में 19 सीटों वाली अरब पार्टियां पूरे राजनीतिक गणित में 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई है। हालांकि, यहूदी दक्षिणपंथी दलों और विपक्षी गुट के कुछ सदस्यों के बीच अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर तीखा वैचारिक विरोध है, जिससे सरकार बनाना बेहद पेचीदा हो गया है। सरकार गठन के लिए विभिन्न दलों के बीच मोलभाव और हफ्तों या महीनों तक राजनीतिक गतिरोध रहने की आशंका है। विकल्प के तौर पर अल्पमत सरकार बनाने या दलबदल के जरिए सांसदों को अपने पक्ष में करने की कोशिशें की जा सकती है।
चुनाव के आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर 2026 को राष्ट्रपति को सौंपे जाने हैं। यदि कोई औपचारिक गठबंधन नहीं बनता है, तो नेतन्याहू बाहरी समर्थन अथवा कुछ सांसदों के मतदान के दौरान सदन से बाहर रहने के भरोसे एक कमजोर अल्पमत सरकार बनाने का प्रयास कर सकते हैं। यदि सभी पक्ष कानूनी रूप से निर्धारित समय सीमा के भीतर सरकार बनाने के लिए किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाते हैं, तो इजराइल में नए चुनाव कराने पड़ सकते हैं। इसके चलते सभी राजनीतिक दलों को सरकार बनाने के लिए और अधिक सहयोगियों की तलाश करनी होगी। लेकिन राजनीति और विचारधारा को लेकर गहरे मतभेद गठबंधन समझौते तक पहुंचना आसान नहीं बनाते।
सैद्धांतिक रूप से प्रधानमंत्री नेतन्याहू को हटाने के लिए विपक्ष का सबसे व्यावहारिक विकल्प इजराइल में अरबों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के साथ गठबंधन बनाना है। लेकिन इसी बीच दो दक्षिणपंथी विपक्षी नेताओं, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और पूर्व रक्षा मंत्री एविग्डोर लिबरमैन ने इस योजना का कड़ा विरोध किया है। एक अन्य संभावना यह है कि दोनों मौजूदा राजनीतिक गुटों की पार्टियां आपसी टकराव जारी रखने के बजाय एकजुट होकर एकता सरकार का गठन करें। इस योजना के तहत नेतन्याहू की लिकुड पार्टी अपने मौजूदा सहयोगियों और कम से कम एक विपक्षी पार्टी के साथ गठबंधन सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जुटाने का प्रयास करेगी। इसकी सबसे बड़ी बाधा यह है कि आइजेनकोट ने घोषणा कर दी है कि वह नेतन्याहू के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। यदि वह अपना रुख बदलते हैं, तो उन्हें उन मतदाताओं का समर्थन खोने का खतरा है जो नेतन्याहू के शासन का अंत चाहते हैं।
गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट, एविग्डोर लिबरमैन और यायर गोलान सहित सभी चार विपक्षी दलों के नेताओं ने भी घोषणा की है कि वे नेतन्याहू के साथ सहयोग नहीं करेंगे। इस बीच, नेतन्याहू के गुट को संसद में बहुमत हासिल करने के लिए अभी भी आठ सीटों की कमी है। इसलिए विपक्ष के आठ सांसदों को पाला बदलने के लिए राजी करना एक बहुत बड़ी चुनौती मानी जा रही है। खबर है कि नेतन्याहू के सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल 7 सीटों वाली यूनाइटेड तोरा यहूदी (यूटीजे) पार्टी ने गादी आइजेनकोट के विपक्षी गठबंधन को समर्थन देने का और विश्वास मत से गैरहाजिर रहने का प्रस्ताव रखा है।
इजरायली राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग संसद में सीटें जीतने वाली पार्टियों के नेताओं के साथ सार्वजनिक परामर्श करेंगे। विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति एक सांसद का चयन करेंगे, जिन्हें नई सरकार बनाने का कार्य सौंपा जाएगा। चूंकि अरब दलों द्वारा आइजेनकोट का समर्थन किए जाने की संभावना है, इसलिए येशर पार्टी के नेता को यह अवसर सबसे पहले दिया जा सकता है। नियमों के अनुसार, सरकार बनाने के लिए नियुक्त व्यक्ति को 28 दिन का समय मिलेगा और उसे 14 दिनों तक का विस्तार दिया जा सकता है। यदि पहला उम्मीदवार असफल हो जाता है, तो राष्ट्रपति यह कार्य किसी अन्य सांसद को सौंप सकते हैं। इस व्यक्ति को संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाने के लिए 28 दिन का समय मिलेगा। यदि अन्य सभी विकल्प विफल हो जाते हैं, तो इजराइल को नए चुनाव कराने पड़ सकते हैं। इस चुनाव के परिणामों ने इजराइल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है। लंबे समय से देश की राजनीति में प्रभावशाली रहे दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी समीकरण को पहली बार इतनी गंभीर चुनौती मिली है।
अरब पार्टियों की बढ़ी हुई सीटें केवल चुनावी सफलता नहीं हैं, बल्कि यह इजराइल के भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकारों और सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष का भी संकेत देती हैं। आने वाले समय में इजराइल की राजनीति मुख्य रूप से तीन संभावनाओं के इर्द-गिर्द घूम सकती है। पहली संभावना यह है कि विपक्षी दल अरब पार्टियों के समर्थन से नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए साझा मोर्चा बनाएं। ऐसा होने पर इजराइल में पहली बार अरब राजनीतिक दलों की भूमिका सरकार गठन में निर्णायक स्तर तक पहुंच सकती है।
इससे देश की राजनीति में यहूदी और अरब नागरिकों के बीच राजनीतिक सहभागिता का नया अध्याय शुरू हो सकता है। दूसरी संभावना एक कमजोर गठबंधन अथवा राष्ट्रीय एकता सरकार की है। यदि नेतन्याहू के विरोधी और कुछ दक्षिणपंथी दल किसी साझा कार्यक्रम पर सहमत होते हैं, तो सरकार का गठन संभव हो सकता है। लेकिन ऐसी सरकार में विदेश नीति, फिलिस्तीन के सवाल, गाजा युद्ध, सुरक्षा नीति और न्यायिक सुधार जैसे मुद्दों पर गंभीर मतभेद बने रहेंगे। इसलिए उसका स्थायित्व भी एक बड़ी चुनौती होगा। तीसरी संभावना यह है कि कोई भी राजनीतिक गुट बहुमत हासिल नहीं कर पाए और इजराइल को फिर से चुनाव की ओर जाना पड़े। ऐसी स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है।
बार-बार चुनाव होने से न केवल शासन व्यवस्था प्रभावित होगी, बल्कि युद्ध, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले भी अनिश्चितता के घेरे में आ सकती है। इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू नेतन्याहू का व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य भी है। भ्रष्टाचार के मुकदमे, 7 अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलताओं की जवाबदेही और लंबे युद्ध को लेकर उठ रहे सवाल उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए चुनौती बने हुए हैं। सत्ता से बाहर होने की स्थिति में उनके खिलाफ जांच और राजनीतिक जवाबदेही की मांग और तेज हो सकती है।
दूसरी ओर, यदि वे किसी तरह सत्ता में वापसी करते हैं, तो उन्हें पहले की तुलना में अधिक सीमित राजनीतिक समर्थन के साथ सरकार चलानी पड़ सकती है। इजराइल की भावी राजनीति का प्रभाव केवल देश की आंतरिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। गाजा में युद्ध का भविष्य, फिलिस्तीन के साथ संबंध, लेबनान और ईरान के प्रति नीति तथा अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ संबंध भी नई सरकार की राजनीतिक दिशा से प्रभावित होगी। यदि नई सरकार युद्ध समाप्त करने, कूटनीतिक समाधान और फिलिस्तीन के राजनीतिक अधिकारों पर अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है, तो इजराइल के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को कम करने की संभावना बन सकती है।
इसके विपरीत, यदि दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी राजनीति का दबदबा बना रहता है, तो क्षेत्रीय तनाव और अंतरराष्ट्रीय आलोचना जारी रहने की आशंका है।इसलिए इजराइल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सरकार गठन का सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। यह देश की भावी लोकतांत्रिक दिशा, राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा, युद्ध नीति और अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा महत्वपूर्ण मोड़ है। नेतन्याहू के नेतृत्व को मिली चुनौती इस बात का संकेत है कि लंबे युद्ध, सुरक्षा विफलताओं और राजनीतिक जवाबदेही के सवालों को अनिश्चितकाल तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।अरब नागरिकों की बढ़ती राजनीतिक भूमिका और युद्ध से थकी जनता का बदलता जनादेश भविष्य में देश की सत्ता संरचना और पश्चिम एशिया की राजनीति दोनों को नई दिशा दे सकता है।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)




