सांप्रदायिक हिंसा के मामले में शिवराज सरकार को HC का नोटिस, 6 हफ्ते में मांगा जवाब

राम मंदिर न्यास के लिए चंदा जुटाते वक़्त इंदौर, उज्जैन व मंदसौर के मुस्लिम मोहल्लों में हुई हिंसा, हाईकोर्ट ने राज्य की सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार से पूछा क्या हुई कार्रवाई

Updated: Jun 07, 2021, 09:20 PM IST

सांप्रदायिक हिंसा के मामले में शिवराज सरकार को HC का नोटिस, 6 हफ्ते में मांगा जवाब

इंदौर। मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन और मंदसौर जिलों में पिछले साल हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले पर शिवराज सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। उच्च न्यायालय ने पूछा है कि दिसंबर के महीने में जब प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हो रही थीं, तब राज्य सरकार द्वारा इन्हें रोकने के लिए या अपराधियों को दंडित करने के लिए क्या कदम उठाए गए?

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि उज्जैन, इंदौर और मंदसौर में जिलाधिकारियों द्वारा हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी। यदि जिलाधिकारियों ने लापरवाही बरती तो राज्य सरकार की ओर से उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई या नहीं? न्यायालय ने आगे पूछा है कि क्या सरकार की ओर से डीएम और एसपी को कोई दिशानिर्देश जारी किए गए थे? 

दरअसल, बीते साल 25 दिसंबर से लेकर 29 दिसंबर तक उज्जैन, इंदौर और मंदसौर में सांप्रदायिकता तनाव का माहौल था। इसी दौरान देशभर में राम मंदिर न्यास के लिए बड़े स्तर पर चंदा जुटाने का कार्य किया जा रहा था। उज्जैन में 25 दिसंबर को हुई हिंसा के दौरान कथित रूप से अल्पसंख्यक मोहल्लों में तोड़फोड़ की गई। उपद्रवियों द्वारा अल्पसंख्यक मोहल्लों में भड़काऊ नारेबाजी के बाद दो समुदायों में मारपीट हुई। 

ऐसी ही घटना 29 दिसंबर को इंदौर और मंदसौर में भी हुई जब कथित रूप से चंदा जुटाने निकले लोगों ने खास मोहल्लों में जाकर भड़काऊ नारेबाजी की। इस दौरान भी हिंसा हुई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हिंसा के दौरान धारदार हथियारों और अवैध बंदूकों का भी इस्तेमाल हुआ। हिंसा के दौरान मस्जिदों में तोड़फोड़ के वीडियो भी वायरल हुए। राज्य के तीनों जिलों में 4 दिनों के भीतर हुई हिंसा का पैटर्न एक जैसा था।

पुलिस पर आरोप है कि इस मामले में पक्षपाती रवैया अपनाते हुए अपराधियों को गिरफ्तार करने की बजाय पीड़ितों के खिलाफ एनएसए लगा दिया गया। आरोप यह भी है कि इंदौर में खुद पुलिसकर्मी अल्पसंख्यक मोहल्लों में करीब 13 घरों के तोड़े जाने के मामले में लिप्त थे। इनमें सभी घर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के थे।

हिंसा पीड़ितों ने राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह के पास आकर सबूत के साथ पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। कांग्रेस नेता ने पुलिस महानिदेशक से लेकर अन्य अधिकारियों को इस बाबत पत्र लिखा, लेकिन प्रशासन की ओर से संज्ञान नहीं लिया गया। दिग्विजय सिंह ने इस मामले में दो महीने पहले उपलब्ध सबूत के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इसे संज्ञान में लेते हुए अब मध्यप्रदेश सरकार समेत, संबंधित जिलाधिकारियों व अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। 

हाईकोर्ट के इस फैसले का दिग्विजय सिंह ने स्वागत किया है। कांग्रेस सांसद ने कहा है कि, 'देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए उच्चतम न्यायालय ने प्रदेश सरकारों को काफ़ी प्रभावी निर्देश दिए थे। यदि उनका पालन होने लगे तो साम्प्रदायिक दंगों पर प्रभावशाली तरीक़े से रोक लग सकती है। इसी उद्देश्य के साथ मैंने इंदौर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि उच्च न्यायालय ने उसकी गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए मध्यप्रदेश शासन को नोटिस जारी किया है। हम इसके लिए आभारी हैं।'