बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जांच, 600 शिक्षाविदों ने जारी किया संयुक्त पत्र

शिक्षाविदों ने कहा है कि बंगाल में हुई हिंसा का असर अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है, हिंसा के बाद बंगाल की बड़ी आबादी दूसरे राज्यों में जाने पर हुई मजबूर

Updated: Jun 03, 2021, 02:25 PM IST

बंगाल चुनाव के बाद हुई हिंसा की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जांच, 600 शिक्षाविदों ने जारी किया संयुक्त पत्र
Photo Courtesy: Economic Times

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे के बाद राज्य में भड़की हिंसा को लेकर देश भर के कुल 600 शिक्षाविदों ने एक संयुक्त पत्र जारी किया है। अपने पत्र में शिक्षाविदों ने बंगाल में हुई हिंसा की जांच किए जाने की मांग की है। शिक्षाविदों ने मांग की है कि बंगाल में हुई हिंसा की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए। 

अपने पत्र में शिक्षाविदों ने कहा है कि आज बंगाल की एक बड़ी आबादी भय के माहौल में जी रही है। जिन लोगों ने चुनावों में टीएमसी के खिलाफ वोट दिया उन्हें धमकाया जा रहा है। इनमें से ज़्यादातर लोगों पर टीएमसी के कार्यकर्ता हमला कर रहे हैं। उनकी संपत्तियों को जलाया जा रहा है, उनके जीवन यापन पर प्रहार किया जा रहा है। 

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पत्र में कहा गया है कि हमारे सामने कई ऐसी रिपोर्ट्स हैं, जिनसे पता चलता है कि चुनावों के नतीजों के बाद महिलाओं समेत दर्जनों लोगों की हत्याएं की गई। हज़ारों लोग बंगाल के पड़ोसी राज्यों असम, ओडिशा और झारखंड जाने पर मजबूर हो गए। पत्र में कहा गया है कि बंगाल की पुलिस, प्रशासन, मीडिया सब के सब सरकार के हाथों की या तो कठपुतलियां बन चुकी हैं या भय के कारण हर किसी ने चुप्पी साध रखी है। 

पत्र में कहा गया है कि बंगाल में हुई हिंसा की वजह से अन्य राज्यों में हिंसा की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार के पूर्णिया ज़िले में महादलित वर्ग से आने वाले मेवालाल की हत्या और घरों को जलाने वाली घटना को बंगाल में हुई हिंसा से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। शिक्षाविदों ने कहा है कि बंगाल में एक नागरिक के तौर पर लोगों पर हो रहे अत्याचार से वे बेहद चिंता में हैं।  

पत्र में कहा गया है कि हम शिक्षाविद बंगाल में हुई हिंसा की सामूहिक तौर पर निंदा करते हैं। और राज्य सरकार से मांग करते हैं कि वे लोगों के बीच भरोसा पनपने हेतु काम करे। शिक्षाविदों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं द्वारा इस पूरी हिंसा की जांच होनी चाहिए।