भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चिंतन शिविर: आक्रमण नहीं, अभियान की अपेक्षा

सवाल आक्रमण और अभियान में अंतर को समझने का है। विपक्ष की रणनीति तो अभियान की ही होनी चाहिए, जिससे कि अधिक से अधिक लोग उनसे जुड़ सकें। आक्रमण में तो दो ही पक्ष होते हैं और वे भी आपसी संघर्ष में जुटे रहते हैं। कोई नया उनसे नहीं जुड़ता। जिसके पास पहले से संख्या ज्यादा होती है, वह संख्या बल को ढाल बनाता है, लेकिन अभिमान एक काफिला या कारवां है, जिनसे लोग जुड़ते चले जाते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भी एक अभियान था, जिसमें लोग जुड़ते गए और अंतत: उन्होंने वह पा लिया, जो वे चाहते थे।

Updated: May 02, 2022, 10:44 AM IST

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चिंतन शिविर: आक्रमण नहीं, अभियान की अपेक्षा

आजकल अजीब सा माहौल है। लोग-बाग जुकाम और राजनीति में फर्क करना भूल सा गए हैं। गौर करिएगा किसी सार्वजनिक स्थान पर छींक आते ही इससे निजात पाने के तमाम नुस्खे आपको गिना दिए जाते हैं। हर दूसरा व्यक्ति वैद्य हो जाता है। ठीक इसी तरह राजनीति का भी हाल हो गया है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति के पास कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की पुनर्वापसी का नुस्खा मौजूद है। सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि हम लोग राजनीति और चुनाव में फर्क करना ही भुला बैठे हैं। सारा दारोमदार अब चुनावी जीत हार पर है। एक राजनीतिक दल वर्षों से वर्तमान सरकार की खामियां और अदूरदर्शिता बता रहा है और जो उनके द्वारा कहा जा रहा है, वह लगातार सही भी सिद्ध हो रहा है, इसके बावजूद उसे हंसी या मजाक का पात्र बनाया जा रहा है। यह देश का सौभाग्य है या दुर्भाग्य? इतना ही नहीं कृत्रिम बुद्धिमता को एवं आंकड़ों को इतना ज्यादा महत्व दिया जा रहा है जैसे कि राजनीतिक सक्रियता अब अर्थहीन हो गई है।

एक पुराना किस्सा याद आ रहा है, बहुत पुरानी बात है। जैसे गर्मी अभी पड़ रही है, तब भी वैसी ही गर्मी का समय था। सुनसान रास्ता था। सूरज पूरे शबाब पर था। एक गरीब आदमी अपने मरियल से गधे को लिए चला जा रहा था। गधा और उसका मालिक दोनों गरमी से बेहाल थे।  इतने में एक शानदार सफेद घोड़े पर बुर्राक सफेद कपड़े पहने किसी गांव के ठाकुर साहब पास से गुजरे। गरीब आदमी भौंचक उन्हें देखता रहा। जब वे थोड़ा आगे निकल गए तो उसने आवाज लगाई, ठाकुर साहब! ठाकुर साहब! ठाकुर साहब ने सोचा कि शायद कोई मुसीबत में है। वे लौटे और उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा, कहो क्या बात है? उस आदमी ने उनकी ओर देखते हुए कहा, ठाकुर साहब, अपने घोड़े से मेरा गधा बदल लो। साहब हतप्रभ रह गए कि यह कैसा प्रस्ताव है। फिर उन्होंने उससे पूछा, क्या मैं बेवकूफ हूँ? वह व्यक्ति अपलक उनकी ओर देखता रहा और बोला, “मैंने सोचा, शायद हो।” यही नवीनतम राजनीतिक घटनाक्रम में हुआ है। एक शताब्दी से भी पुराने राजनीतिक दल को मीठी-मीठी बातों से हस्तगत कर लेने का मंसूबा।

दरअसल, वर्तमान “शायद हो” अनायास नहीं हुआ। यह एक बेहद कुटिलता भरी रणनीति का सार्वजनिक प्रदर्शन है। यह विपक्ष मुक्त भारतीय लोकतंत्र की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होता। दरअसल, अति आत्मविश्वास सहज ही नहीं विकसित हो जाता। एक ऐसा राजनीतिक दल जिसके पास अपने सबसे बुरे दिनों में भी भारत को कुल करीब 90 करोड़ मतदाताओं में से 18 करोड़ से भी ज्यादा का समर्थन प्राप्त है, को कमतर आंकना ठीक नहीं। दूसरी ओर मीडिया का अधिकांश वर्ग देश की समस्याओं को सामने लाने की बजाय, विपक्ष की राजनीति पर पूरी तरह से केंद्रित है, जैसे कि कांग्रेस यदि उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप आचरण करने लगेगी तो देश की स्थिति ठीक हो जाएगी। देश की वर्तमान समस्याओं के लिए सत्ताधारी दल नहीं, बल्कि विपक्षी दल ही जिम्मेदार है। उनके नष्ट होते ही सबकुछ ठीक हो जाएगा। वैसे हम देख ही रहे हैं कि मीडिया का वैचारिक पतन देश को किस ओर धकेल रहा है। गौर गरिए जबकि देश जबरदस्त आर्थिक संकट की चपेट में हो तो हजारों करोड़ रुपये निवेश करके न्यूज चैनल कैसे खुल पा रहे हैं। वैसे “कैसे” से बड़ा सवाल है “क्यों खुल रहे हैं।” कौन है इन नए उद्यमों की पृष्ठभूमि में?

राहत इंदौरी लिखते हैं-

“टूट कर बिखरी हुई तलवार के टुकड़े समेट

और अपने हार जाने का सबब मालूम कर।”

आज भारत जिस तरह की सांप्रदायिक हिंसा और नफरत की चपेट में है, कुछ समय पूर्व तक यह अकल्पनीय लगता था। लग रहा था कि भारत लोकतांत्रिक परिपक्वता के अंतिम दौर में पहुंच रहा है। परंतु एकाएक स्थितियां बदलीं और स्याह बादल छा गए। यह सही है कि यह एकाएक नहीं हुआ, परंतु जिस तेजी से देश को सांप्रदायिक राजनीति ने अपने कब्जे में लिया वह वास्तव में भौंचक कर देने वाला ही था। हमें नहीं पता था कि हमारे अपने ही घर नफरत के डेरे बनते जा रहे हैं। गांधी कहते हैं, “अच्छा करनेवाले के मन में स्वार्थ नहीं रहता। वह जल्दी नहीं करेगा। वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है। बुरी बात ही तेजी से बढ़ सकती है। घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सरल है।” यही तो घटा है अभी-अभी। दशकों पुराने घर बुलडोजर की चोट से बिखर गए। सदियों का भाईचारा भी जैसे बिखरने के कगार पर पहुंच गया है। क्या इससे महज राजनीति और उसमें भी मात्र चुनावी राजनीति से निपटा जा सकता है? शायद नहीं? यदि स्पष्ट रूप से कहें तो कदापि नहीं! तो फिर रास्ता क्या है।

रास्ता तो एक ही है राजनीति का पुन: समाजोन्मुख होना। यह समझना होगा कि चिंतन शिविर किस तरह अंतत: चर्चा शिविरों में परिवर्तित हो, सामान्य जनता के बीच पहुंचे। लोग भले ही कम आएं लेकिन सामाजिक विमर्श की परंपरा जिसे महात्मा गांधी ने नए सिरे से शुरू किया था और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक जन-आंदोलन में बदल दिया था, को पुन: समझा जाए। एक महान कार्य जो अपना इष्ट सिद्ध कर चुका हो, उसकी पुनर्व्याख्या बेहद जटिल प्रक्रिया है। परंतु यह अब भी संभव है। रवींद्रनाथ टैगोर की इस बात पर गौर करना आवश्यक है कि, “ट्रेन की प्रगति अपने अंतिम स्टेशन की ओर बढ़ना है- यही उसकी गति है। लेकिन एक पूर्ण विकसित पेड़ की गति ट्रेन जैसी नहीं होती। उसकी प्रगति तो जीवन के आंतरिक विकास की ओर होती है। वह प्रकाश की ओर उन्मुख रहकर उसे अपने पत्तों में ग्रहण करता है और चुपके से उसे रस में परिवर्तित कर लेता है, यही उसका जीवन है।”

एक परिपक्व राजनीतिक दल भी वृक्ष की तरह ही तो है, जो समाज को प्राणवायु देता है। यह भी सच है कि बहुत सी चीजें समय के साथ बदलती हैं, लेकिन जीवन के मूलभूत मूल्य कभी नहीं बदलते। कार्बन कितना ही अच्छा हो, उससे प्राप्त दस्तावेज कार्बन कापी ही कहलाता है और हमेशा कहलाएगा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी भारत सांप्रदायिकता से निपटना आसान नहीं था। परंतु उससे निपटा गया। तब भी सत्ता, भले ही वह विदेशी हो, सांप्रदायिक तत्वों को ही बढ़ावा दे रही थी। परंतु आधे अल्पसंख्यक मुसलमानों का भारत में ही बसे रह जाना यह समझाता है कि तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में सामाजिक प्रतिबद्धता को लेकर कितनी अधिक जागरूकता थी। समाज आज भी वही है, जो उस समय था। 100 सालों में समाजों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं होते। दिशा थोड़ी-बहुत बदलती है और उसे पुन: ठीक राह पर लाया जा सकता है।

पं. नेहरू ने तो सन् 1930 में जब आपसी विवाद बढ़ते जा रहे थे, तब कहा था-

“संसार का अंत इसी ढंग से होता है, धमाके के साथ नहीं बल्कि मंद रुदन के साथ।”

परंतु उन्होंने और तत्कालीन राजनीतिज्ञों ने नैराश्य को अपने पर हावी नहीं होने दिया और अंतत: उस मंद रुदन को आजादी के गीत में बदल दिया। आज परिस्थितियां थोड़ी अलग जरूर हैं, लेकिन लक्ष्य तो वही है। भारतीय संघवाद पर संकट के नए बादल छा रहे हैं। उच्चतम स्तर पर इससे पहले कभी राज्यों की इस तरह से गलत तस्वीर प्रस्तुत की गई हो, ऐसा नहीं हुआ। पेट्रोल पर लगे करों को लेकर जो कुछ कहा गया, वह वास्तव में लोकतंत्र में आस्था रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति की आँख खोल देने को पर्याप्त है। पंजाब में पुन: विवादित स्थिति का बनना भी हमें समझा रहा है कि परिस्थितियों को कितनी तीव्रता से बदला जा रहा है। जगदीश मेवाणी की पहली गिरफ्तारी तो विवाद का विषय है ही, लेकिन उनकी दूसरी गिरफ्तारी के बाद न्यायालय का यह कहना कि, “हम पुलिस स्टेट की ओर बढ़ रहे हैं,” सबकुछ समझा गया है। अतएव यह आवश्यक है कि विपक्षी दलों द्वारा संचालित राज्य सरकारें किसी भी परिस्थिति में देशद्रोह जैसी धाराएं न लगाएं और कानून व संविधान में निहित मूल्यों के आधार पर ही अपना शासन चलाएं। जैसे को तैसा में तो अंतत: हार का ही सामना करना पड़ सकता है।

हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि आज भारत में जिस तरह की विपरीत परिस्थितियां सिर उठाए हैं, उसमें ही तो विपक्ष के लिए भी अवसर छिपे हुए हैं। सवाल आक्रमण और अभियान में अंतर को समझने का है। विपक्ष की रणनीति तो अभियान की ही होनी चाहिए, जिससे कि अधिक से अधिक लोग उनसे जुड़ सकें। आक्रमण में तो दो ही पक्ष होते हैं और वे भी आपसी संघर्ष में जुटे रहते हैं। कोई नया उनसे नहीं जुड़ता। जिसके पास पहले से संख्या ज्यादा होती है, वह संख्या बल को ढाल बनाता है, लेकिन अभिमान एक काफिला या कारवां है।, जिनसे लोग जुड़ते चले जाते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भी एक अभियान था, जिसमें लोग जुड़ते गए और अंतत: उन्होंने वह पा लिया, जो वे चाहते थे।

गौर करिए महात्मा गांधी ने कहा था, “मुझे धर्म प्यारा है, इसलिए पहला दुख मुझे यह है कि हिंदुस्तान पथभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहां हिंदू-मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता, लेकिन इन सब धर्मों के अंदर जो धर्म है वह हिंदुस्तान से जा रहा है, हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं।” हम साफ देख रहे हैं कि धर्म में निहित धर्म का विलुप्ति की ओर जाना और इसी के समानांतर राजनीति में निहित राजनीति का टकराव या संघर्ष में परिवर्तित हो जाना। दोनों ही परिस्थितियां वर्तमान सत्ता के अनुकूल बैठती हैं। परंतु इसके इतर जो गुंजाइश बचती है, उसी से देश बचेगा। राजनीतिक दल अंतत: राजनीतिक इच्छाशक्ति के संवाहक ही तो हैं। यदि वे अपनी इच्छाशक्ति को त्यागेंगे, तो राजनीति स्वत: ही उन्हें त्याग देगी। राहत इंदौरी बड़े मजेदार ढंग से इस बात को समझाते हैं-

“जिंदगी तेरी आस रखती है, ये निंबोली मिठास रखती है,

जिंदगी आग की सलीबों पर, कागजों के गिलास रखती है।”

ईद मुबारक

(यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)