गांधी के गांव गणराज्य का सपना आज भी अधुरा
गांधी के सपने को पूरा करने की अगली लड़ाई केवल पंचायत चुनावों की नहीं, बल्कि ग्राम सभा को वास्तविक सत्ता, संसाधन और निर्णय का अधिकार देने की लड़ाई है। गांव को केवल प्रशासन की अंतिम इकाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पहली इकाई बनाना ही गांधी के गांव गणराज्य की दिशा में अगला कदम होगा।
अगस्त 1947 को देश की पहली स्वतंत्रता दिवस पर गांधीजी ने कहा था 'मेरे सपनों का भारत सात लाख गांव गणराज्यों का संघ' होगा। भारत के संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत से यह उम्मीद की गई थी कि राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्तता की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों। इस संवैधानिक निर्देश के पालन में केन्द्र और राज्य सरकार विफल रही।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1952 में आदिवासी व्यवस्था के लिए पंचशील निर्धारित किये। इनमें बिना बाहरी हस्तक्षेप के समाज द्वारा अपनी परम्परा के अनुसार अपनी व्यवस्था करने का अधिकार मुख्य बिन्दु था। 1956 में बलवंत राय समिति ने देश में तीन स्तरीय पंचायत व्यवस्था के लिये सिफारिश की थी। उसी के अनुसार जिला, विकास खंड और गांव स्तर पर पंचायतों का गठन हुआ। इस व्यवस्था में ग्राम सभा की भूमिका पर ध्यान नहीं दिया गया।इस समिति की यह मान्यता थी कि गांव समाज अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से ही अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है।
इसके लिए फिर से 1978 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति के समक्ष भारत सरकार की ओर से गृह मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव डाॅक्टर ब्रह्म देव शर्मा ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए ग्राम सभा के रूप में गांव समाज को अपनी पूरी व्यवस्था करने के लिए अधिकार देने का प्रस्ताव किया। परन्तु समिति ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसके अनुसार ग्राम सभा को कुछ जिम्मेदारियां दी जा सकती है, अधिकार नहीं। ग्राम सभा पंचायत राज व्यवस्था की आधारशिला होना चाहिए। इसके बिना प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण तो अर्थहीन रहेगा ही वरन् स्वयं लोकतंत्र कमजोर होकर टूट सकता है।
अनुसूचित क्षेत्रों के लिए सामान्य पंचायत व्यवस्था असंगत था। संविधान में पंचायत राज के लिए विशेष व्यवस्था करने के लिए 1988 में राजीव गाँधी के नेतृत्व में संविधान संशोधन प्रस्तावित हुआ। इस विधेयक में अनुसूचित क्षेत्रों को पंचायत राज की सामान्य व्यवस्था से बाहर रखा गया था। उसमें सबंधित राज्यपालों से उम्मीद की गई थी कि वे अपने-अपने राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था करेंगे। परन्तु इस विधेयक को संसद की मंजूरी नहीं मिल पाई। सन 1990 में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आयुक्त डाॅक्टर ब्रह्म देव शर्मा ने राष्ट्पति को 29 वीं रिपोर्ट दिया। इस रिपोर्ट को संसद में बहस के लिए भी रखा गया परन्तु रिपोर्ट पर चर्चा नहीं कराया गया।
संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत आयुक्त ने राष्ट्पति को अपनी रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा अंग्रेज़ी राज्य की उस कानून व्यवस्था को संविधान की भावना और नैसर्गिक न्याय के खिलाफ बताया, जिसके कारण वो वह जन्मजात अपराधी हो गया और उसके जिंदगी के बुनियादी अधिकार की कदम-कदम पर अवमानना होती रही है। इसमें शिफारिश की गई कि कम से कम आदिवासी इलाकों में पूरी तरह स्वशासी व्यवस्था की जाए जिसमें स्थानीय समाज को अपना जीवन चलाने और पूरे संसाधनों के रखरखाव और उपयोग का असंदिग्ध रूप से पूरा अधिकार हो। यही गांव गणराज्य का सार तत्व है।
सन 1993 में पंचायत व्यवस्था की स्थापना के लिए भारत के संविधान में 73 वां संशोधन कर भाग 9 को जोड़ा गया। इस संशोधन के अनुसार संविधान में 'ग्राम सभा' की प्रतिष्ठा तो हुई परन्तु उसके कर्तव्य और शक्तियों को राज्य विधान मंडलों द्वारा तय करने के लिए छोड़ दिया गया। अनुच्छेद 243 (ङ) उपभाग(1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों को इस व्यवस्था से अलग रखा गया। परन्तु उसी अनुच्छेद के उपभाग(4) में संसद को यह अधिकार सौंपा गया कि उस भाग के प्रावधानों में जरुरी फेरबदल कर अनुसूचित क्षेत्रों लागू कर सकता है। यह देश का पहला कानून है जो आदिवासी इलाकों में नेमी तौर पर सीधे लागू नहीं हुआ।
पेसा कानून की धारा 4(घ) के तहत ग्राम सरकार एवं स्वशासी जिला सरकार का गठन करते हुए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार उन्हें हस्तांतरित किया जायेगा तथा संविधान के अनुच्छेद 243 (छ), 243 (ज) एवं 275(1) के अंतर्गत उन्हें समस्त निधि के प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण हेतु सक्षम बनाया जाय ताकि स्वायत्त शासन की संवैधानिक भावना चरितार्थ हो।परन्तु राज्य की सत्ता पूर्ण नियंत्रण चाहती है। गांधी के गांव गणराज्य का सपना केवल ग्राम पंचायतों के चुनाव कराने से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए सत्ता, संसाधन और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति गांव समाज तक पहुंचानी होगी। ग्राम सभा को केवल योजनाओं पर चर्चा करने वाली संस्था के बजाय स्थानीय शासन की मूल इकाई के रूप में स्थापित करना होगा।
विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा की मूल भावना के अनुरूप ग्राम सभा को भूमि, जंगल, जल, खनिज, लघु वनोपज और स्थानीय संसाधनों से जुड़े निर्णयों में वास्तविक अधिकार देना आवश्यक है। विकास की कोई भी योजना स्थानीय समुदाय की सहमति, भागीदारी और सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभावों की पारदर्शी समीक्षा के बिना आगे नहीं बढ़नी चाहिए। भविष्य की दिशा यह भी होनी चाहिए कि ग्राम सभाओं को उनके अधिकारों के साथ पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक क्षमता मिले। केवल अधिकारों की घोषणा पर्याप्त नहीं है।
ग्राम सभा के निर्णयों को लागू करने के लिए वित्त, कर्मचारी और संस्थागत व्यवस्था भी उसी के अनुरूप विकसित करनी होगी। राज्य सरकारों को पेसा कानून के अनुरूप अपने कानूनों और नियमों की समीक्षा करनी चाहिए। जहां राज्य के कानून और ग्राम सभा के अधिकारों के बीच टकराव है, वहां ग्राम स्वशासन की संवैधानिक भावना को प्राथमिकता देने की जरूरत है। ग्राम सभा के निर्णयों में प्रशासनिक हस्तक्षेप कम करने के साथ-साथ उसके निर्णयों की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की व्यवस्था भी विकसित की जानी चाहिए।
साथ ही, ग्राम सभाओं को केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय विकास की प्राथमिकताएं तय करने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जल संरक्षण, कृषि, वन संरक्षण और आजीविका से जुड़े स्थानीय कार्यक्रमों की योजना गांव समाज की जरूरतों के आधार पर बनाई जाए। इससे विकास ऊपर से थोपे जाने वाली प्रक्रिया के बजाय नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली प्रक्रिया बन सकेगा।
इसके लिए जरूरी है कि ग्राम सभा के अधिकारों के बारे में ग्रामीणों में व्यापक जागरूकता हो। आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्थाओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक निर्णय प्रक्रिया को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के साथ जोड़ा जाए। तभी पंचायती राज व्यवस्था और आदिवासी स्वशासन के बीच वास्तविक संबंध स्थापित हो सकेगा। आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी गांधी का गांव गणराज्य पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है।
संविधान ने पंचायतों को स्थान दिया, 73वें संशोधन ने ग्राम सभा को संवैधानिक पहचान दी और अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पेसा कानून बनाया, लेकिन कानून और जमीन पर उसकी वास्तविक शक्ति के बीच अभी भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। गांधी के सपने का भारत ऐसा भारत था जिसमें गांव अपने जीवन, संसाधनों और विकास से जुड़े फैसले स्वयं लेने में सक्षम हों। इसका अर्थ राज्य की भूमिका समाप्त करना नहीं, बल्कि राज्य की भूमिका को ऐसी व्यवस्था में बदलना है जिसमें स्थानीय समाज की स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहें।
यदि ग्राम सभा को अधिकार देने के बजाय केवल जिम्मेदारियां दी जाती रहेंगी, यदि संसाधनों पर निर्णय लेने की शक्ति ऊपर के स्तर पर केंद्रित रहेगी और यदि विकास के नाम पर स्थानीय समाज की सहमति को औपचारिकता बना दिया जाएगा, तो गांव गणराज्य का सपना अधूरा ही रहेगा। इसलिए गांधी के सपने को पूरा करने की अगली लड़ाई केवल पंचायत चुनावों की नहीं, बल्कि ग्राम सभा को वास्तविक सत्ता, संसाधन और निर्णय का अधिकार देने की लड़ाई है। लोकतंत्र की मजबूती का रास्ता संसद और विधानसभाओं से होकर गांव तक आता है, लेकिन उसकी वास्तविक बुनियाद गांव के लोगों की सामूहिक निर्णय शक्ति में ही है। गांव को केवल प्रशासन की अंतिम इकाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पहली इकाई बनाना ही गांधी के गांव गणराज्य की दिशा में अगला कदम होगा।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)




