मनोकामना पूरी करने वाला रावण, राजगढ़ के भाटखेड़ी गांव में 150 साल से हो रही रावण और कुंभकर्ण की पूजा

गांव में दशहरे पर नहीं होता रावण दहन, ग्रामीण करते हैं रावण और कुम्भकर्ण की आराधना, दशानन पर है गहरी आस्था, मुराद पूरी होने पर लोग चढ़ाते हैं प्रसाद

Updated: Oct 14, 2021, 02:39 PM IST

मनोकामना पूरी करने वाला रावण, राजगढ़ के भाटखेड़ी गांव में 150 साल से हो रही रावण और कुंभकर्ण की पूजा
Photo courtesy: haribhoomi

 बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व दशहरा शुक्रवार 15 अक्टूबर को मनाया जाएगा। विजय दशमी के मौके पर देश दुनिया में दशानन रावण का दहन किया जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश के राजगढ़ स्थित भाटखेड़ी गांव में रावण की पूजा की जाती है। यहां रावण और उसका भाई कुंभकर्ण आस्था का प्रतीक हैं। माना जाता है कि इनके सामने जो मुराद सच्चे मन से मांगी जाए वह जरूर पूरी होती है। इस सड़क को रावण वाली गली कहा जाता है। यहां सड़क किनारे विशालकाय मूर्तियां विराजमान हैं। यहां रावण आस्था का प्रतीक बना हुआ है। रावण और कुंभकर्ण की प्रतिमा के पास से गुजरने वाले लोग इनके सामने शीश झुकाते हैं। ये मूर्तियां आने-जाने वालों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं।

इस गांव के लोगों का मानना है कि रावण ग्रामीणों की दुआ कबूल करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर गांव के लोग रावण और कुम्भकर्ण की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यहां के रावण की प्रसिद्धि आसपास के इलाकों में फैली हुई है, अक्सर लोग यहां पर रावण से मन्नतें मांगते हैं। यही वजह है कि भाटखेड़ी गांव में रावण दहन नहीं किया जाता।

दशहरे के मौके पर इन प्रतिमाओं की साफ सफाई और रंग रोगन होता है। नवरात्र पर यहां रामलीला का आयोजन किया जाता है। दशहरे पर राम और लक्ष्मण केवल इनमें भाला छुआते है। फिर ग्रामीण रावण की पूजाकर गांव की खुशहाली की मन्नत मांगते हैं। यहां विराजी ये दोनों मूर्तियां 150 साल पुरानी बताई जाती हैं।

गांव में बारिश नहीं होने की स्थिति में पहली बार यहां मन्नत मांगी गई थी, ग्रामीणों का कहना है कि उसके बाद बारिश होने लगी। तभी से लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। कई राजनेताओं को यहां से विजय का आशीर्वाद मिला है। जिसके बाद से वे सत्ता में आए और कुछ लोगों को मंत्री बनने का मौका भी मिला। कई घरों में किलकारी गूंजी तो कई बेरोजगारों को नौकरी मिली। मनोकामना पूरी होने के बाद लोग यहां पर अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं, भंडारे का आयोजन किया जाता है। करीब 150 साल से यह परंपरा जारी है।